शनिवार, 6 मार्च 2021

संबंध विच्छेद क्यों..

 बेमेल वैवाहिक सम्बन्ध.... क्यों हो जाते हैं सम्बन्ध विच्छेद ....

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            अपने ब्लॉग व वेब साइट की जरिये प्राप्त होने वाले प्रश्नो में सर्वाधिक प्रश्न आजकल वैवाहिक  सम्बंधित प्राप्त हो रहे हैं मुझे … सगाई होकर टूट गई है,,, ,विवाह होने के बाद सम्बन्ध ठीक नहीं चल रहे हैं ,,,विचार नहीं मिल पा रहे ,,,तलाक की नौबत आ पहुंची है आदि आदि....  हमारे पंडित जी ने तो कुंडली बहुत अच्छी जुड़ाई  थी ,,,गुण  भी काफी मिल रहे थे,,फिर अचानक ऐसा क्यों हो रहा है /....क्या कुंडली मिलान उचित प्रकार से नहीं हुआ ???  चारों ओर से इसी प्रकार के प्रश्नो की बौछार कभी कभी हो जाती है... विश्वास कीजिये प्रतिदिन कम से कम  २५ प्रश्न इसी विषय पर हो जाते हैं....

     आइये आज बताने का प्रयास करता हूँ कि आखिर इसकी जड़ में क्या समस्या है ?? ?किन कारणों से ऐसा हो रहा है ??? 

                            वास्तव में पारम्परिक ज्योतिष व सामान्य कर्म काण्ड को आपस में घाल- मेल कर देना ब्राह्मण व यजमान दोनों के लिए असुविधा का कारण बन रहा है..... वैदिक साहित्य ,,,कर्म काण्ड व ज्योतिष स्पष्ट रूप से भिन्न विषय हैं....चन्द्रमा के  एक नक्षत्र मात्र पर  दृष्टि डालकर ,,,,तुरंत पंचांग से वर - वधु गुण मेलापक सारिणी खोल देना,, व २५ गुण मिल गए ,,,२८ गुण मिल गए ये ,,,,शोर मचाकर तुरंत विवाह तय कर देना इसका मूल कारण है...... जानकार ज्योतिषी जानते हैं कि ,इस प्रक्रिया द्वारा कुंडली मिलान में डेढ़ से दो मिनट  का समय मात्र ही लगता है...

कितनी हैरानी का विषय है कि शर्ट का रंग पसंद करने में आपको आधा घंटा लग जाता है,, ,एक साड़ी पसंद करने में एक स्त्री चालीस दुकानो की ख़ाक छान कर आने के बाद भी,,, पसंदीदा साड़ी को एक  घंटे उलट पलट  देखती है,,  ,तब जाकर निर्णय पर पहुंचती है ,,,,,,,और विडम्बना देखिये कि विवाह का निर्णय मात्र डेढ़ मिनट में हो रहा है....भला पूछा जाय उन पंडित जी से कि दो  मिनट में आपने लग्न कुंडली देखकर ,,संतान सम्बन्धी विषय पर विचार कर लिया है, ,इसके लिए उपलब्ध सप्तमांश कुंडली पर (दोनों की)दृष्टि डाल दी है… , विवाह के लिए लग्न कुंडली से कई गुणा अधिक महत्वपूर्ण  नवमांश कुंडली पर भी विचार कर  लिया है ?? .. आजकल की परिपाटी में अमूमन देखने में आ रहा है कि षोढशवर्ग कुंडलियों का निर्माण नहीं हो रहा है,, ,ऐसे में ज्योतिषी के पास मात्र लग्न व  चन्द्र कुंडली ही उपलब्ध होती है....ज्योतिषी अगर नए जमाने के उपकरणों से लैस है तो भी नवमांश व सप्तमांश बनाने में दस मिनट लगने ही वाले हैं ,व अगर वह मात्र पंचांग लेकर बैठा है तो ये घंटों का काम तो है ही....अतः ऐसे में बिना पूर्ण विचार किये ,,,किया गया मिलान कितना प्रमाणिक है ये विचार  का प्रश्न है....

                                कहना व्यर्थ है कि आजकल के नौशिखिया पंडितों की जमात में आधे  ऎसे भी हैं कि जिन्हे योनि (जिससे कि चार गुणों का मिलान किया जाता है ) के विषय में सोचने का ख्याल तक मन में नहीं आता,,,, ,जबकि दो अनजान प्राणियों के एक छत के नीचे आने के लिए,,, ,एक दूसरे के निकट आने के लिए,,, ,स्वयं को एक दूसरे की मौजूदगी में सहज पाने के लिए,,,,सर्वाधिक रूप से महत्वपूर्ण यही गुण होता है......१२ राशियों के २७ नक्षत्रों को ऋषियों द्वारा उनके स्वभाव के आधार पर क्रमशः गरुड़, ,मार्जार, ,सिंह ,,स्वान ,,सर्प ,,मूषक ,,मृग व मेढ़ा,, इन आठ वर्गों में विभाजित किया गया है......जहाँ से स्वयं से पंचम को शत्रु व चतुर्थ को मित्र माना जाता है....

     .मृग की नैसर्गिक प्रवृत्ति होती है कि सिंह को देखते ही वह स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है... गिद्ध के साथ सांप की  मित्रता चल पाए, ये असंभव है....          

                   ऐसे ही जातक सर्वाधिक आकर्षण सदा स्वयं के विपरीत व्यक्तित्व या कहें शत्रु राशि के लिए अनुभव करता है.... स्वयं की मित्र राशि अथवा स्व राशि  के लिए उसका पहला  रिएक्शन नेगेटिव ही होता है....किन्तु बाद में धीरे धीरे उसके प्रति आश्वस्त होता जाता है,,,जो स्थायी समीकरण होता है......आपने बकरे को,,कुत्ते को,,शेर को,,पंछी को सबसे पहले अपनी ही जाति पे भौंकते,,,चीखते,,,चिल्लाते,,,डराते देखा होगा.....ये अपनी पोजीशन को लेकर असुरक्षा की भावना होती है ,,,जो अपने ही समकक्षी से होती है.. ...आप चाह कर भी शेर व बकरी को एक छत के नीचे नहीं रख सकते,,सांप और नेवले को एक थाली में भोजन नहीं दे सकते,,किन्तु थोड़ी देर की अनमनी के बाद दो अनजान बैलों को आराम से एक ही हल में जोत सकते हैं.....जबकि आपने देखा होगा कि बाड़े में बाहर से लाया गया नया बैल ,,,बाड़े के भीतर खड़े अन्य जानवरों की अपेक्षा अपने ही जाति के बैल को देखकर सबसे पहले फुन्कारा होगा,,मारने गया होगा...बकरी मुर्गी,कुत्ता बिल्ली से उसे कोई परहेज नहीं होता..किन्तु दो दिन बाद यही बैल ,,पहले वाले बैल के साथ ही घास चरता मिलेगा..और ये मित्रता स्थायी होती है..  अमूमन पहली  नजर में प्यार अथवा किसी के प्रति आकर्षण  सदा आपसे  विपरीत व्यक्तित्व   के लिए ही महसूस होता है किन्तु यकीन मानिए ये क्षणिक होता है...चंद मुलाकातों के पश्चात ही सारा खुमार उतरने लगता है.... आखिर आप आकर्षित ही इसलिए हुए थे क्योंकि आपने अपने से इतर कुछ नया देखा था,, ,वो देखा था जो आपके  व्यक्तित्व में नहीं था...

     अतः आकर्षण लाजिमी था.... किन्तु आखिर  वो आपके व्यक्तित्व के  विपरीत था,,, तो आप  उसके साथ सहज नहीं  रह पाये,,, ,परिणामस्वरूप अलगाव होता है... योनियों का यही दोष कई संबंधों को खिलने से पूर्व ही मुरझा देता है.... 

                                               यहीं से एक अन्य  महत्वपूर्ण सूत्र ये होता है कि भले ही कितने गुणों का मिलान पाया जाय,,, किन्तु अपने से २३ वें नक्षत्र को वैनाशिक नक्षत्र माना जाता है.... इसमें मिलान नहीं करना चाहिए.... ये सूत्र कई नए नए सिर मुंडवाए पंडितों के सिर के ऊपर से निकलता हुआ देखा है मैंने... 

                    ग्रह मैत्री को भी इसी प्रकार अष्टकूट मिलान में  एक  महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है....किन्तु भ्रमवश  अधिकतर पंडितों को मैंने राशि के स्वामियों द्वारा मैत्री चक्र का मिलान करते पाया है ,,,,जो क़ि पूर्णरूपेण अवैज्ञानिक है....हम जानते हैं कि ३० कोण की एक राशि 3 अंश और 20 कला के नौ चरणों अर्थात सवा दो नक्षत्रों  के (एक सम्पूर्ण नक्षत्र 13 अंश व 20 कला के तारामंडल के पथ के  माप का अधिकारी है)मिलन  का परिणाम  है.... ऐसे में कई बार हमें एक ही राशि विशेष को आपरेट करवाने वाले चार- चार ग्रह मिलने लगते हैं.....ऐसे में राशि स्वामी मात्र को ही मुख्य ग्रह मान लेना भला कहाँ की समझदारी है ,,,,जबकि अष्टकूट मिलान में तुम स्वयं नक्षत्र को आधार मान कर चल रहे हो भैय्या  ?   

            उदाहरण  के लिए आप रोहिणी नक्षत्र की कन्या व आद्रा नक्षत्र के वर का कुंडली मिलान करें तो लगभग २३ गुणों का मिलान होता है। परम्परागत रूप से वृष के स्वामी शुक्र व मिथुन के बुध नैसर्गिक मैत्री चक्र में परम मित्रता को प्राप्त होते हैं व इसी कारण मैत्री सूत्र के आधार पर मित्र द्विदाशक माने जाते हैं व भकूट दोष का निवारण स्वतः ही कर देते हैं.... बाकी गण व नाड़ी यहाँ उचित प्रकार से मिलती है। किन्तु हम भूल जाते हैं कि नक्षत्र स्वामियों में रोहिणी को भोगने का अधिकार चन्द्रमा के पास है वहीँ दूसरी ओर आद्रा का स्वामित्व राहु के पास है ,अब अपने मिलन मात्र से ग्रहण का निर्माण कर देने वाले ये दोनों ग्रह ,कुंडली मिलान में पास होने के बावजूद कैसे जीवन में अपने विचारों के मध्य सामंजस्य लाएंगे ,ये विचारणीय है     ,(आशा है प्रबुद्ध पाठक सहमत होंगे )   

                                          दोनों कुंडलियों में गुरु इस विषय में मुख्य किरदार होता है …ऐसे  में दोनों ही कुंडलियों में गुरु का प्रभावित होना शुभ रिज़ल्ट नहीं देता। शुक्र मंगल की युति जातक को शौक़ीन मिजाज बना देती है ,ऐसे में किसी एक कुंडली में ये समस्या हो व लग्नादि को गुरु आदि शुभ ग्रह का सपोर्ट न मिल रहा हो तो नेगेटिव परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके अलावा बहुत से पहलु हैं जो कुंडली मिलान में ध्यान दिए जाने आवश्यक हैं..

... दो मिनट में मैगी तैयार हो सकती है पाठको किन्तु जीवन के निर्णय नहीं...(मुझे स्वयं कुंडली मिलान में एक घंटा लग जाता है ) अतः अगली बार आप अपने अथवा अपने किसी प्रिय के वैवाहिक जीवन का निर्णय ले रहे हैं तो कृपया योग्य ज्योतिषी की सलाह लेकर आगे बढ़ें.....पाठ के विषय में आपकी अमूल्य राय के इन्तजार में. .... …

सोमवार, 13 जनवरी 2020

किस देव् की उपासना करूँ

कई बार पाठकों ने प्रश्न किया है कि गुरुजी कौन से भगवान अधिक पावरफुल हैं,,मुझे किस देवता को अपना आराध्य मानना चाहिए,,,,,शास्त्र किसकी उपासना करता है...अब मेरे जैसे सनातनी वैदिक ब्राह्मण से इसका उत्तर पाने की उम्मीद करना यह पूछना हो गया कि जीने के लिए क्या जरूरी है...या राजमा अच्छी दाल है या मलका,,,,सेब अच्छा फल है कि केला...आप ही बताइए कि ये तुलनाएं कैसे संभव हैं,,,ऐसे ही भला देवताओं की तुलना कैसे संभव है,,,एक ही शक्ति है जो भिन्न भिन्न रूपों में पूजी जाती हैं,,,सब का स्त्रोत एक ही है..जिसका कोई आकार नही,,कोई रंग नही,,कोई व्याख्या नही..
          बात जब वेदों की आती है तो हम देखते हैं कि ऋग्वेद अधिकतर इंद्र की स्तुति से भरा हुआ है,,,तीन चौथाई से अधिक मंत्र इंद्र को समर्पित हैं,,,बाकी में अग्नि वरुण व सूर्य का जिक्र है.…यजुर्वेद में भी कमोबेश यही स्थिति देखने को मिलती है.…व बाकी के अन्य वेद भी इसी स्थिति से गुजरते दिखाई देते हैं..फिर समय आता है पुराणों का...जहां शक्तियों को रूप में देखा गया है,,,पुराण में शिव,,विष्णु,,,कृष्ण,,आदि साकार रूप उपस्थित हैं,,तो एनेर्जी के रूप में सूर्य व अग्नि उपस्थित हैं...बड़ी हैरानी है कि वेदों में अग्रपूजनीय होने वाले इंद्र पुराणों में उपेक्षित हो चले हैं.... बाद के पुराणों में तो उनकी छवि भी कुछ दोषपूर्ण होती चली गयी है..ऐसा क्यों हुआ मेरे पास जवाब नही.….आज के पूजा पद्धति में  हम कह सकते हैं कि लगभग इंद्र को भुला ही दिया गया है,,उनका जिक्र नही के बराबर ही होता है..किन्तु एक शक्ति ऐसी है जो जितना प्रभाव वेदकालीन दौर में रखती थी,,उतनी ही महत्ता उसे पुराणों में भी प्राप्त है,,व आज के कर्मकांडों में भी उन्होंने अपना महत्व बनाये रखा है,,,वो हैं अग्नि व सूर्य....इनमे भी प्रत्यक्ष दिखाई देने के कारण सूर्य का अपना महत्व है..वे बड़ी प्रतिष्ठा के साथ आकाश पटल पर कायम हैं,,,व ज्योतिष व संसार संबंधी बहुत से नियमो को संचालित करते हैं....ऐसे के सूर्य की उपासना बेहतर रिजल्ट देने में सक्षम है ऐसा मेरा मानना है....तो कहिये जय हो सूर्य महाराज की....आप सभी को नवरात्रे की शुभकामनाएं...भगवती आप सभी के परिवारों की रक्षक रहें..(आजकल बद्रीनाथ जी मे पाठ में व्यस्त हूँ अतः आप लोगों से संवाद नही बना पा रहा हूँ,,क्षमा करेंगे)

दशम का सूर्य

..******  दशम का सूर्य****..
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    पहले स्वास्थ्य ,,पश्चात कार्यालय की व्यस्तता के कारण बहुत समय से आप लोगों की सेवा में उपस्थित नहीं हो पाया ,,जिस हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ .ज्योतिष निरंतर शोध का विषय है,,,आप पुराने सूत्रों पर कुंडली मारकर ,वर्तमान में उन सूत्रों को किसी कुंडली से फलित करने की कोशिश करेंगे ,तो गच्चा खाने की संभावनाएं अधिक प्रबल हो जाती हैं ..अतः सूत्रों को नए वातावरण में ,नए नजरिये से परिभाषित करना बेहद आवश्यक हो जाता है..... 
         ग्रहों के राजा सूर्य को लेकर अमूमन बहुत सी किवदंतियां व भ्रांतियां चलन में हैं ......कालपुरुष में ये लग्न में उच्च व पंचम में स्वराषि होकर बेहद सम्मान पाकर प्रभावी माना जाता है ,और अमूमन इसी सूत्र को लेकर फलित किया जाता है .......थोड़ा पीछे जाने का प्रयास कीजिये ,,,ज्योतिष का आरम्भ वैदिक राजतंत्र काल में हुआ है ..ये वो कालखंड था जब राजा का बेटा राजा होता था व सामान्यतः  जातक का जन्म ही उसके कुल को तय करता था .....बृहस्पति के रूप में ब्राह्मणो को सम्मान तो बहुत प्राप्त था ,किन्तु  परोक्ष रूप से सत्ता में उनका दखल नहीं था ...सीधे सीधे कहें तो अपने पालन पोषण के लिए गुरु स्वयं सूर्य पर निर्भर था  ...ऐसे में लग्न का सूर्य ये निर्धारित करने में सक्षम था कि जातक अपने पूर्वजों के सम्मान से पोषित होकर राजकुल में जन्म ले रहा है ,,,तथा पंचम का सूर्य आपकी कुल परंपरा को आगे ले जाने वाला है ....यहाँ शिक्षा ,,नेतृत्व ,,ज्ञान आदि के बहुत मायने नहीं थे ....किसी सामान्य कुल के सस्दस्य द्वारा बहुत बड़ा आंदोलन कर ,,राजतंत्र को पलटने के किस्से सामान्यतः नहीं मिलते हैं ...अतः सूर्य निर्विध्न रूप से अपनी पितृसत्तामक सत्ता को कायम करके चलता था ....कालान्तर में [द्वापर बीत जाने के बाद ]  हम बृहस्पति चाणक्य द्वारा नन्द सूर्य को सत्ताहीन करने का एक बड़ा उदाहरण पेश कर सकते हैं ,,ऐसे कई और उदाहरण मिल सकते हैं ...ये सूर्य के प्रभावहीन होने का समय काल था ..सूर्य स्वाभाविक रूप से पूर्व दिशा का स्वामी है ..सूर्य के कमजोर होते ही पूरब पर अन्य दिशाओं से आक्रमण बढ़ने लगे ...विशेष रूप से सूर्य के नैसर्गिक शत्रु शनि की पश्चिम दिशा से ऐसे आक्रमणों की अधिकता देखन में आती है ,,,वह यूनान से सिकंदर हो अथवा ब्रिटिश सेनाएं ...देश के विभाजन के बाद पश्चिम से किंचित राहत सूर्य को प्राप्त हुई तथा पूर्व तथा उत्तर के सपोर्ट से पुनः सूर्य को अपना सामार्ज्य स्थापित करने में सहायता प्राप्त हुईं .उत्तर से आये नेहरू व पूर्व से आये राजेंद्र प्रसाद जी के रूप में पूर्व स्थापित इस राष्ट्र को अपना संविधान प्राप्त हुआ ... किन्तु पश्चिम के इतने वर्षों के आक्रमण का फल ये हुआ की सूर्य अपना नैसर्गिक बल अथवा कहें कार्यप्रणाली भूल गया ..वह पश्चिम के क़दमों पर चलने लगा .....आज भी भारत की राजनीति को आप यूरोप ,,अमेरिका के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास करते देखेंगे अथवा पश्चिमी दिशा में बसे  पाकिस्तान के इर्द गिर्द ही इसे घूमता पाएंगे ...यहीं से सूर्य के कार्य करने के तरीके के अंतर आने लगा..धीरे धीरे भारत मे प्रजातंत्र मजबूत होने लगा व राजशाही का लगभग अंत हो गया,,,अब सूर्य तो राजा है,,राजशाही का अंत हुआ तो भला सूर्य स्वयं का वजूद कैसे स्थापित करता...अतः सूर्य राजतंत्र को त्याग राजनीति की ओर अग्रसर हुआ,,किन्तु एक राजा के रूप में नही,अपितु एक सेवक के रूप में..शनि का प्रभाव अभी तक सूर्य पर स्पष्ट देखा जा सकता है..जैसा कि ज्योतिष के जानकार जानते हैं कि शनि भृत्य(नौकर )का स्थान रखता है...ऐसे में जनसेवक कहलाने वाले नेता ही प्रजातंत्र के राजतंत्र में वास्तविक अधिकारी बन बैठे..सत्ता का केंद्र भी दिल्ली (पश्चिम) बन बैठा...ऐसे में सूर्य जो कि मेष में उच्च होते थे,,वे मेष के बदले मकर में बल पाने लगे..पाठकों को भली भांति ज्ञात है कि जो सम्मान मकर की संक्रांत को प्राप्त है वह मेष की संक्रांत को नही है..अतः लग्न व पंचम के सूर्य के मुकाबले दशम का सूर्य अधिक प्रभावी होने लगा...कुंडली विवेचन के दौरान नए अभ्यासी ज्योतिषियों बंधुओं को देखने मे आएगा कि दशम का सूर्य परोक्ष व अपरोक्ष रूप से सरकार से जातक को जोड़ता आया है..अगर इसी सूर्य को शनि का बल भी प्राप्त हो रहा हो,,तो छत्रभंग का निर्माण करते हुए यह तय करता है कि यदि जातक परिवार अथवा  पिता से दूर रह पाएगा तो सत्ता में सीधे पैठ बना पाने के सक्षम होगा,,जितना जातक अपने भीतर भृत्य(सेवक) होने की भावना प्रबल करेगा,,उतनी तीव्रता से वह सत्ता की शक्ति प्राप्त करेगा...जितना अधिक वह अपने नैसर्गिक राजा होने के भाव को प्रदर्शित करेगा,,सत्ता व राजतंत्र से दूर होता जाएगा....इसी अनुपात में  हम देखें तो पंचम पिता की हानि है..यह दशम से अष्ठम पड़ने वाला भाव है..पिता के लिए दुर्योग उत्पन करने वाला...ऐसे में पंचम का सूर्य पिता के साथ कोई बड़ी दुर्घटना तय कर देता है,,किन्तु स्वयं का भाव होने से ये भी देखने मे आता है कि जातक पिता के विभागों में पिता के बाद जुड़ जाता है..इस सूर्य पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव हो तो पिता के साथ कई बार बड़ी दुर्घटनाएं भी होती देखी गयी हैं..
           दशम से किसी भी प्रकार सूर्य का संबंध बन रहा हो तो सूर्य का रत्न माणिक धारण करने से बचना चाहिए..इसका प्रभाव शनि को प्रभावित करता है,,परिणास्वरूप जो लाभ शनि के भाव दशम में बैठा सूर्य दे रहा होता है वह गड़बड़ाने लगता है....पंचम में सूर्य हो तो माणिक धारण करना शुभ फलदायी होता है..
        लेख के प्रति आपकी अमूल्य राय से अवश्य अवगत कराएं..शीघ्र नए लेख के साथ प्रस्तुत होने के वचन के साथ विदा लेते हुए आप सभी सुधि पाठकों के श्री चरणों मे मेरा प्रणाम पहुंचे..

क्यों प्रभावित है रोजगार

*** ---क्यों प्रभावित है रोजगार..**
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       कर्म भाव से संबंधित सिद्धांत बहुत  से नियमों के अधीन होकर कार्य करते हैं..विवाह हेतु कुंडली मिलान करते समय ,जिम्मेदार गणक के लिए यह भी एक विशेष पहलू है,जिसे ध्यान में रखना अति आवश्यक है..सामामयतः देखा गया है कि जातक अपने कर्मेश(दशम भाव अधिपति),अथवा उसे प्रभावित कर रहे ग्रह के सहयोग से ही अपने कार्य व्यवसाय में सफलता पाता है..किन्तु यहां ध्यान दिए जाने वाला सूत्र यह है कि  जातक के जीवनसाथी का भाव अर्थात सप्तमेश अमूमन उसके नवमेश का शत्रु होता है..कितना अचंभा है कि विवाह हेतु सप्तम भाव को पुष्ट करने हेतु षोडशवर्ग के जिस भाव ,नवांश को इतना अधिक महत्व दिया जाता है,,जन्म लग्न चक्र में ये दोनों (सप्तमेश व नवमेश) सामान्यतः एक दूसरे के सहयोगी नही होते हैं...वहीं दूसरी ओर सप्तमेश व दशमेश(कर्म भाव का अधिपति) सामान्यतः एक दूजे को सहयोग करने को तैयार होते हैं...क्या यही कारण होता होगा कि जिन जातकों ने अपने जीवन साथी को अपने कार्यालय अथवा कार्य व्यवसाय में अधिक इन्वॉल्व कराया,,उन्होंने सफलता की सीढ़ियां सहजता से लांघी..और जिन्होंने जीवन साथी को भाग्य का पूरक मानकर ,,घर मे बैठाया,,,उन्हें किंचित संघर्ष अधिक सहना पड़ा...
             सामान्यतः मेरे देखने मे आया है कि जातक के विवाह के बाद जातक की दशमांश कुंडली के आपरेट करने के तरीक़े में आश्चर्यजनक बदलाव आने लगते हैं...ऐसे में कई बार प्रश्न आता है कि मेरा कार्य व्यवसाय ठीक से नही चल रहा,, अथवा मेरे धंधे में बरकत रुक गयी है,,,जबकि जातक की ग्रह दशा उसके अनुकूल चल रही होती है,,फौरी तौर पर देखने मे किसी प्रकार की कोई समस्या कुंडली मे नही दिखाई दे रही होती...ऐसे में जातक के जीवन साथी की कुंडली देखना आवश्यक हो जाता है...बहुत बार देखने मे आता है कि धर्मपत्नी जी के सप्तमेश को नेगेटिव रूप से प्रभावित कर रहे ग्रह की दशा अंतर्दशा में ,जातक के अपने धंधे प्रभावित होने लगते हैं,, जबकि उसकी अपनी दशाएं बहुत अधिक विपरीत संकेत नही दे रही होती हैं...ऐसे में अगर ज्योतिषी जातक के जीवन साथी की कुंडली प्राप्त नही कर पाता,, तो उसका संशय स्वयं की गणनाओं पर होने लगता है... वह अपने सूत्रों को बार बार खंगालता है,,,बार बार अपने क्लाइंट के लिए किए जा रहे उपायों में बदलाव करता है,,किन्तु मनमाफिक रिजल्ट नही पाता...परिणामस्वरूप क्लाइंट व ज्योतिषी,,दोनो का विश्वास ज्योतिष से डगमगाने लगता है..
     पुरुष व स्त्री विवाह के पश्चात अर्धनारेश्वर का रूप माने गए हैं...ऐसा संभव नही कि यदि स्त्री की कुंडली मे सप्तमेश गोचरवश पीड़ित हो रहा हो तो पुरूष का जीवन सहजता से चल रहा हो..ऐसा होना कतई संभव नही ...अतः ज्योतिष बंधुओं को चाहिए कि जातक के कर्म भाव को फलित करने से पूर्व ,,एक दृष्टि जातक के जीवनसाथी की कुंडली पर भी डाल लें..तब ये प्रश्न करने की आवश्यकता नही होगी कि जातक की कुंडली मे कोई समस्या पकड़ में नही आ रही,,तब भी उसका व्यवसाय क्यों चौपट हुआ जा रहा है...

कुम्भ लग्न में कौन सा रत्न धारण करें

**** -- कुम्भ लग्न में कौन सा रत्न --**
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                कल मुझे एक अनजान ज्योतिषी (?) का फोन आया,,वो जानना चाहता था कि कुछ समय पूर्व मैंने कुम्भ लग्न की एक कुंडली की विवेचना के दौरान एक क्लाइंट को कोई भी रत्न न पहनने की सलाह दी थी...संयोग से वह क्लाइंट इन ज्योतिष महोदय का भी परिचित है तो कभी कहीं किसी बैठक में दोनों की चर्चा चल पड़ी...क्लाइंट ने बताया कि उसे कोई भी रत्न न पहनने की सलाह मेरे द्वारा मिली है,,तो ज्योतिष महोदय का प्रश्न था कि कौन ऐसा मूर्ख पंडित है जो ऐसी सलाह दे रहा है,,और बाकायदा वो ये बात फोन पर मुझे कह रहे थे....दो मिनट की चर्चा के दौरान ही मेरे लिए ये भांपना काफी था कि ये फ़ेसबुक विश्वविद्यालय व व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से पढ़े हुए वो शौकिया सज्जन हैं ,,जिनके पुस्तकालय में 50 रुपये की आओ ज्योतिष सीखें ,नामक पुस्तक रखी होगी,,और उसी बूते पर ये महाशय इतना फड़फड़ा रहे हैं...नित्य ही ऐसे कई शौकिया ज्योतिषी देखता ही रहता हूँ...पर आश्चर्य होता है  जब वो अपनी उटपटांग थिओरी उस इंसान पर लादते हैं जो ज्योतिष का विधिवत आचार्य होकर पिछले पंद्रह सत्रह वर्षों से पचासों विद्यार्थियों को ज्योतिष की शिक्षा दे चुका है,,,अनगिनत लेख दे चुका है....जिसकी सलाह से लाभान्वित होकर अनेकों क्लाइंट देश विदेश से समय समय पर आभार व्यक्त करते रहे हैं..अब समय का अभाव कहें या हिम्मत हारना,,किन्तु ऐसे लोगों से बहस की मेरी कोई इच्छा नही होती..क्यों समय खपाया जाय..खैर जाने दीजिए....
           कुम्भ लग्न पर अपने ब्लॉग में पूर्व में भी चर्चा कर चुका हूं...ये शुक्र को मास्टर प्लेनेट के रूप में आपरेट करने वाला लग्न है..अब शुक्र जैसा कि आप सुधि पाठक जानते हैं भौतिक सुख सुविधा प्रदान करने वाला ग्रह है तथा भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति के लिए धनः की आवश्यकता होती है..धनः ,,जैसा कि ज्योतिष के जिज्ञासु जानते हैं,,कुम्भ लग्न में ये गुरु के अधीन का विषय होता है..और सामान्य मैत्री चक्र में गुरु व शुक्र नितांत शत्रु ग्रह माने गए हैं..अब भला अपने भावों से प्राप्त धनः(?) को गुरु क्योंकर शुक्र के हवाले करने लगा..
             वास्तव में धनः का अभिप्राय जो लोग करेंसी से लगाते हैं,,उनके गच्चा खाने का चांस अधिक होता है..धनः एक विस्तृत विषय है जिसके अधीन बहुत से कारक होते हैं..हर ग्रह के लिए धनः का अभिप्राय भिन्न होता है...मंगल के लिए धनः का अर्थ भूमि है,,,बुध के लिए इसे पैसे के रूप में देखा जाता है,,,गुरु के लिए ये मानसिक शांति को अभिरूपित करने वाला विषय है..सूर्य के लिए ये सत्ता की प्राप्ति है व शनि के लिए विषय विशेष में दक्षता हासिल करना ही धनवान होना है..
                  जिन सज्जन का जिक्र ऊपर किया था मैंने,,वे नगर निगम में इंस्पेक्टर हैं,,,जिनके पास एक  सुंदर धर्मपत्नी जी व पुत्रियों का भरा पूरा संसार है..शानदार मकान व वाहन की प्राप्ति है...कुम्भ लग्न की कुंडली मे ,,योगकारक शुक्र पंचम त्रिकोण में बैठकर पूर्ण बली है ,,व नवांश में भी बेहद सकारात्मक है...इस सकारात्मकता का परिणाम हम जातक के सुखी जीवन के रूप में देख सकते हैं.....अब ज्योतिष महोदय उन्हें डायमंड पहनाना चाहते हैं....मैंने पूछा मित्रवर,,इससे क्या हासिल होगा...डायमंड से आप क्या बदलाव लाना चाहते हैं..तो महाशय बोलते हैं कि इससे इनकी लक्सरी में बढ़ोतरी होगी....अरे भाई,,लक्सरी में बढ़ोतरी के लिए स्वाभाविक रूप से धनः चाहिए....जो जातक सरकारी नौकरी में है,,उसे अचानक धनः कैसे प्राप्त होने वाला है भला??उसे तो सालाना आधार पर फिक्स इंक्रीमेंट आदि प्राप्त होने हैं...हाँ वो कोई व्यापारी होता,,अम्बानी अडानी जैसा,,तो हम उसके व्यापार में अभूतपूर्व उछाल की कामना कर सकते थे...किन्तु एक सरकारी नौकर जो महीने की पगार पर निर्भर है,,वो भला कहाँ से अधिक धनः प्राप्त करेगा...स्वाभाविक रूप से आप उसे ऊपरी कमाई के लिए उकसाना चाहते हैं...शानदार बीवी के अलावा आप उसे विवाहोत्तर संबंधों की ओर धकेलना चाहते हैं....एक जातक जो समाज मे मान सम्मान के साथ जी रहा है,,आप उसे अधिक भोगी प्रवृति की ओर धकेलना चाहते हैं...एक मिठाई जो हलवाई द्वारा पहले ही एक संतुलित आकार व स्वाद प्राप्त कर चुकी है,,आप उसमें और मीठा डालकर उसका बेड़ा गर्क करना चाह रहे हैं..
         कुम्भ एक ऐसा लग्न है,,जिसमे रत्न धारण हेतु बहुत से समीकरणों को ध्यान में रखना पड़ता है..इसमें गलती की कतई गुंजाइश नही हो सकती...यहां धनः को मजबूत करने के लिए यदि आप जातक को पुखराज धारण करा रहे हैं,,तो वास्तव में आप उसे वैराग्य के लिए उकसा रहे हैं,,,पारिवार की ओर से लापरवाह कर रहे हैं..सामान्यतः आप कुम्भ लग्न के जातकों को धीर गंभीर,,,सेल्फ ओरिएंटेड ,,रिज़र्व नेचर का,,, कम बोलने बतियाने वाला,,एक शांत आचार व्यवहार का जातक देखते हैं....कारण वही है,,आय व धनः दोनो  का गुरु से प्रभावित होना...और गुरु के लिए धनः का अर्थ मानसिक शांति है..यही कारण है कि गुरु की मीन राशि मे शत्रु होकर भी शुक्र उचत्व को प्राप्त होते हैं...भोग विलास को लगाम लगती है व वह सात्विकता पाता है,,वहीं मित्र बुध की राशि कन्या में शुक्र नीच का प्रभाव देने लगता है..शुक्र सबसे काइयां ग्रह है,,सबसे शातिर.... इसी कारण एक आंख वाला ग्रह है...सामान्य व्यवहार में एक आंख बंद करना,,शातिरपने की निशानी माना गया है...देखिए न जिस गुरु से खुलेआम दुश्मनी निभाता है,,उसके घर (मीन) में आते ही चोला बदल संत बन जाता है...इससे अधिक शातिरपन भला और कहां देखने को मिल सकता है...
          रत्नों में बहुत शक्ति होती है मित्रों....ये जातक को अर्श व फर्श दोनो पर ले जा सकते हैं....अतः मात्र सुनी सुनाई बातों कि केंद्र त्रिकोण का रत्न धारण करना शुभ होता है,,इन बातों से परहेज करना चाहिए..ये बहुत बेसिक बातें हैं जो समझाने के लिए पुस्तकों में लिखी होती हैं..किन्तु इसका अर्थ गूढ़ होता है...बुखार में पैरासिटामोल खाया जाता है,,ये अमूमन हर कोई जानता है,,किन्तु मरीज की आयु देखकर इसकी मियाद घटाई बढ़ाई जाती है,,,,कई रोगों में पैरासिटामोल से परहेज किया जाता है,,इसकी अधिकता लिवर को खराब कर सकती है..ये बात एक चिकित्सक बेहतर तरीके से जानता है,,इसी कारण बिना मरीज देखे,,दवा नही लिखता..इसी प्रकार फर्जी पुस्तकें पढ़कर ,,रत्न संबधी सलाह देने से बचना चाहिए...ज्योतिष आपके लिए शौक का विषय हो सकता है किंतु जातक का जीवन आपकी एक गलत सलाह से बर्बाद हो सकता है..अतः बेशक इसका शौकिया अध्ययन कीजिये,,किन्तु यदि आप ज्योतिष के विधिवत विद्यार्थी नही हैं तो आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि औरों को सलाह देने से बाज आइये..
         अपने विचारों से अवश्य अवगत कराइये...नववर्ष आपके लिए भगवती के आशीर्वाद से नई सौगातों से भरपूर हो,,ऐसी कामना के साथ आप सभी पाठकों के श्री चरणों मे मेरा प्रणाम पहुंचे.... सादर प्रणाम..

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

कृष्ण

...(पूर्व में यह लेख दो भागों में प्रकाशित हुआ था,,पाठकों का आग्रह था कि इसे एक ही जगह उपलब्ध कराएं ,जिसे लय बनी रहे...अतः दोनो भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ)

******  कृष्ण का वचन*****
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    घोड़ों की रास स्वयं मधुसूधन के हाथों में थी.....मुंह से सफेद फेंन गिराती अश्व टोली इस बात से भलीभांति वाकिफ थी कि ब्रह्मांड के सर्वोत्तम सारथी के हाथ जब भी रथ की रास आती है,,तो समुद्र को भी अपना स्थान त्यागना होता है.......सूर्य की किरणें भी केशव के रथ की गति के आगे नतमस्तक होती हैं....वायु के दूत भी उस रथ की गति से पराजित हो,,स्वयं को लाचार पाते हैं,,,..
             सामान्यतः तीव्र गति से रथ भगाने के अभ्यस्त कृष्ण के अश्व आज पहली बार कॄष्ण के शब्दों की ललकार को  अपनी पीठ पर चाबुक के स्पर्श के समान महसूस कर रहे हैं... पशु मूक सही,,अपनी भावनाओं को बता पाने में असमर्थ सही,,, किन्तु स्वामी के नेत्रों की भाषा को सहज समझता है....उसके हाथों के स्पर्श के स्पंदन की कहानी जानता है....कृष्ण के हृदय की धौंकनी मानो नगाड़े की गूंज बन अश्वों को संकेत दे रही थी कि आज दौड़ निर्णायक है....आज स्वामी का सम्मान दांव पर है...आज द्रौपदी को दिए वचन को निभाने की घड़ी है....आज कृष्ण के वचन की कीमत तय   होनी है....और कृष्ण को निकट से जानने वाले सभी जानते हैं कि कालांतर में अर्जुन को दिए अपने वचन के निर्वाह हेतु,,,प्रकृति के सिद्धान्त के विपरीत जाकर भी वासुदेव ने सूर्य पर ग्रहण तक लगाया है...और आज प्रश्न एक स्त्री की अस्मिता का है....उसके अभिमान का है...
       द्रौपदी के भेजे दूत से कल रात्रि ही कृष्ण को कुरु सभा मे होने वाले चौसर के खेल का संकेत मिल चुका है....और संदेश प्राप्त होते ही कृष्ण का मन अनहोनियों की आशंका से उन्हें चौकन्ना कर चुका है....बिना एक पल गंवाएं तब से कृष्ण कुरु सभा पहुंचने को छटपटा उठे हैं,,रात्रि में ही उन्होंने रथ को हस्तिनापुर के मार्ग पर डाल दिया है...
           कृष्ण के होठों की ललकार ने जैसे पीठ पर पुनः चाबुक की चोट की हो....जानवर ने स्वामी के हृदय की वेदना को महसूस किया,और अपना सर्वस्व देकर भी आज ऋणमुक्त होने का संकल्प लिया...घोड़ों के पैरों में ज्यों बिजली कौंधती हो....पदचापों की गड़गड़ाहट कुरु साम्राज्य के समाप्ति की घोषणा में मानो ,,विजयी ढोल नाद की भांति तांडव करती हो....
            इंद्रप्रस्थ में पांडवों के समारोह में अपमानित दुर्योधन के नेत्रों की ज्वाला ,भविष्य में क्या परिणाम प्रस्तुत कर सकती है,,ये अंदाजा लगाना कृष्ण के लिए कोई बड़ा भेद नही था.....राजा युधिष्ठर चौसर के जुए के लिए हामी भर देंगे,, ये विश्वास कर पाना कठिन था.....किन्तु कहते हैं न कि "प्रभु जाको दारुण दुख दीना,,,ताकि मति पहले हर लीना".......युधिष्ठर तो अपना विवेक यह प्रस्ताव स्वीकार करते ही त्याग चुके हैं......किन्तु दुर्योधन के पास तो कभी विवेक रहा ही नही है...और  अपमान की आग में झुलसता हुआ विवेकहीन दुर्योधन ,,,,अपने बल के अहंकार व पांडवों को लज्जित करने की अपनी जिद में मानवता के समस्त नियम  बिसरा सकता है ,,इसमे कृष्ण को कोई संदेह नही...
                  रोहिणी नक्षत्र के अधिपति चंद्रदेव ने ,,मनुष्य लीला करते अपने स्वामी का पथ प्रदर्शन करने हेतु स्वयं आगे बढ़कर आज अपनी निशा यात्रा का संचालन किया...अचानक से जंगल की शांति को भंग करते हुए ,,मयूरों ने शोर मचाना आरम्भ कर दिया...अपने मार्ग से गुजरने वाले कृष्ण के घोड़ों की पदचाप ,कोसों दूर राह मे रात्री विश्राम करते नीले नागान्तकों के लिए,,, माथे पर मोर मुकुट के रूप में ब्रह्मांड का ताज धारण करने वाले चक्रवर्ती के आगमन की घोषणा है....ऐसा चक्रधारी जिसके मोरमुकुट के आगे इन्द्र का सिंहासन तुच्छ जान पड़ता है...जिसके गले मे पड़ी मोती की माला का एक एकलौता मोती ही,,कुबेर के खजाने को लज्जित करने में सक्षम है....और जिसके पीताम्बर की आभा स्वर्ग की अप्सराओं के वैभव तक को क्षीण कर देती है......
       कृष्ण के ललाट पर तनाव विद्युत तरंगों के समान रह रह कर  चिंगारियां में परिवर्तित हो रहा है...प्रकृति इस तनाव का भार झेलने की अभ्यस्त नही है....तनाव की रेखा तो केशव के ललाट पर तब नही उभरी,,जब कालिया नाग का मानमर्दन उन्होंने किया...इन्द्र की सत्ता को चुनौती देते हुए गोवर्धन उठा लेने वाले कृष्ण के अधरों पर तब भी स्मित ही था..फिर आज ये अनहोनी क्यों?? इस तनाव  का भार वहन करने के लिए शेषनाग ने  अपने फन पर टिकी वसुंधरा को व्यवस्थित किया....वाराह ने अपने नुकीले खुरों पर अपना आधिपत्य पुनः जांचा....निकट भविष्य में ब्रह्मांड को अचंभित कर देने  वाली कोई घटना अपनी रूपरेखा रच रही है,,इसका आभास धरती के इन दोनो भारवाहकों को सहज ही हो गया है...
   अश्वों के खुरों के कोने लगातार दौड़ते रहने से अब रक्ताभ होने लगे हैं,,किन्तु उनकी गति में कोई स्थिलता नही दिखाई पड़ती....कृष्ण के हृदय की ज्वाला,, स्वयं अश्वों के नेत्रों से रक्तपुंज के रूप में टपकने को आतुर है...नीले वन पक्षी कृष्ण की देह के ताप से विचलित हो रहे हैं... उनके फड़फड़ाते पंख रात्रि के घने वन में अजीब सा भयभीत कर देने वाला शोर उत्पन कर रहे हैं....नीले मयूरों का रात्रि में जागना शुभ संकेत नही है...अष्ठम कालरात्रि के अधीष्ट ,,,नीले रंग की आभा वाले सांवले कृष्ण और नीले नागान्तकों का समवेत कोप मानो आज कुरुवंश पर लगने वाले ग्रहण का संकेत है...
                        प्रातः की पहली किरण के साथ ही कृष्ण ने हस्तिनापुर की सीमा का स्पर्श कर लिया....
                 कुरु सभा मे लगती एक एक बाजी ,,सभ्य समाज के मुंह पर एक एक करारे तमाचे के समान थी....ईर्ष्या जब जब अपनी सीमाओं का अतिक्रमण  करती है ,,तब तब मनुष्य के भीतर बसा जानवर बाहर आने लगता है....गिरने की कोई सीमा नही होती...आप महानता का ,,,सहृदय होने का,,सभ्य होने का एक पैमाना तय कर सकते हैं,,किन्तु मनुष्य की नीचता को मापने के कोई पैमाना नही होता....इसकी कोई सीमा नही होती....बड़े भाई की जिस स्त्री से अपनी माता के समान व्यवहार रखना चाहिए,,उस पांचाली को भरी सभा मे निर्वस्त्र करने का आदेश देने में दुर्योधन को किंचित संकोच नही हुआ...
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अपने भवन में कृष्ण की राह देखती द्रौपदी को ज्योंही  प्रतिहारी द्वारा उसे चौसर में हार जाने की सूचना प्राप्त हुई,,उसका हृदय एक अनहोनी आशंका से ग्रसित हो गया...कृष्ण की अभी कोई सूचना नही पहुंची,, पता नही कृष्ण तक द्रौपदी का संदेश ही पहुंचा या नही....और द्वारका से यहां पहुंचने में कितना समय लगता है,,,इन प्रश्नों के उत्तर द्रौपदी के पास नही थे..
             बेबसी ने अश्रुओं का रूप ले लिया...किन्तु पलकों के कोनों पर जमा पानी,,,आत्मसमान का रूप ले,,स्वयं से विद्रोह कर उठा...इतिहास साक्षी है कि किसी  स्त्री के नेत्रों से जब भी बेबसी के अश्रु बहे हैं,, बड़े बड़े साम्राज्य इसकी भेंट चढ़े हैं..अजेय रावण अपनी लंका सहित इस ज्वाला में होम हुआ है...सती के देह त्याग का परिणाम सम्पूर्ण विश्व को नाश के कगार पर ले गया था...देवकी के नेत्रों की गंगा में डूबकर मथुरा का कंस साम्राज्य खंड खंड बिखर चुका है,.. अहिल्या के अपमान का परिणाम इंद्र को चुकाना पड़ा....नियति क्या रचे बैठी है ये कृष्ण के सिवा कोई नही जानता...अपने अनुजों सहित अपनी स्त्री को जुए के दांव में हार जाने वाले युधिष्ठिर को इतिहास भले ही धर्मराज के रूप में याद रखे,,किन्तु द्रौपदी की दृष्टि में आज युधिष्ठिर का स्थान बहुत निम्न हो गया है..
                  दुर्योधन के आदेश पर दुशासन पांचाली को केशों से घसीटकर ,,कुरु सभा को अपनी बलिष्ट भुजाओं का परिचय दे चुका है..अपमान से छटपटाई निरीह स्त्री के वस्त्रों का एक छोर अपने पैरों से दबाए ,एक वीर अपनी वीरता का प्रदर्शन कर रहा है.... संसार मे वीरता के नया अध्याय लिखा जा रहा है,,,इतिहास पौरुषत्व की नवीन व्याख्या देख रहा है..
         आरंभ से ही स्त्री को सांवन्तवादी दृष्टि से देखने की मनोवृत्ति रही है...संसार अनेकों ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है...स्त्री उपभोग की वस्तु है ,,इस कुविचार से बड़े से बड़े चरित्र भी अछूते नही रहे...संसार का ये अटल सिद्धांत है कि भले ही पुरुष कितनी ही स्त्रियों का भोग करे,,किन्तु स्त्री एक से अधिक पुरुष को नही वर सकती...द्रौपदी ने पुरुषों की इस वर्चस्वता को चुनौती दी है..वह पांच वरों को धारण करने वाली पांचाली है..और पुरुष प्रधान समाज मे ऐसा दुस्साहस करने का दंड स्त्री को अपना सम्मान देकर चुकाना चाहिए,,,जाने अनजाने इस विचार के पक्षधर इस सभा मे बैठे सभी वीर हैं...आदर्शवाद की व्याख्या करते अपने अनेक नायकों को इतिहास ने हजारों बार मुंह के बल गिरते देखा है.....सभा मे गंगापुत्र भीष्म,,आचार्य द्रोण,,,महाबली कर्ण,,, नीतिपुरुष विदुर,,कृपाचार्य सहित उस कालखंड के उत्तम पुरुष विद्यमान है...सबकी अपनी अपनी विवशताएँ हो सकना संभव हैं,,सबके संस्कार भिन्न होना संभव हैं,,,.किन्तु सबके भीतर एक विचार समान रूप से विद्यमान है,,,जो सभी को एक सूत्र से बांधता है,,वो है मिथ्या पुरुषवाद..सभी के हृदय में एक टीस सदा से उन्हें सालती आयी है कि द्रौपदी ने पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देने का साहस किया है,,और उसे इसका दंड मिलना चाहिए..
          जिस क्षण भर में आपकी महानता का पैमाना तय होता है,,जो क्षण आपको मिथ्या पुरुषवाद के अहंकार की भावना से काटकर पुरुषों में उत्तम स्थान प्रदान करता है,,,जिस क्षण आप ब्रह्मांड में एक नया आदर्श प्रस्तुत कर ,स्वयं को एक वास्तविक नायक घोषित करते  हैं,, वह यही एक क्षण मात्र होता है....जब जबर के जुल्म के विरोध में कोई दर्शक दीर्घा से आगे निकल अधर्म को अधर्म कहने का साहस करता है..जब कोई सबल का विरोध कर निर्बल का सहायक बनता है,,,और वास्तविक नायक कहलाता है..और इसी एक क्षण में संसार के श्रेष्ठ नायक किरदार अपना कर्तव्य निभाने में चूक गए..वे दुर्योधन का विरोध करने से चूक गए...एक स्त्री  की मर्यादा की लक्ष्मणरेखा को लांघने का दुस्साहस कर बैठे..आदर्शवाद की मर्यादा को तार तार करने हेतु दुशासन के हाथ द्रौपदी के वस्त्रों की ओर बड़े... सभा द्रौपदी को उस अवस्था मे देखने का मोह नही त्याग सकी,, जिस रूप में स्त्री को उसका पुत्र व स्वामी ही देख पाए हैं..राजाओं में श्रेष्ठ स्थान रखने वाले राजा द्रुपद की राजकन्या,,,,संसार के श्रेष्ठ महारथियों की अर्धांगिनी,,,आज अपनी अस्मिता की रक्षा में असमर्थ है.... जिस पुरुषप्रधान समाज ने स्त्री के लिए अस्मिता के मापदंड तय किया हैं,,,उसी अस्मिता के पहरुए आज उसके सम्मान को निर्वस्त्र करने पर आमादा हैं....द्रौपदी को आज ज्ञात हुआ कि संसार मे स्त्रियों का एक ही स्थान है,,,एक ही गति है.....भले ही उसका जन्म किसी राजपरिवार में हो अथवा किसी निम्न कुल में .....किन्तु स्त्री की सदा से एक ही जाति होती आयी है,,वह जाति स्त्री होना है,,और इससे मुक्ति नही पाई जा सकती,,,चाहे उसका जन्म वैदेही के रूप में हो अथवा द्रौपदी के रूप में....
         किन्तु अनहोनियों होती हैं....असंभव संभव होता है,,,,कश्ती उस भंवर से भी निकलती है,,जिस भंवर से निकलने की आशा स्वयं मल्लाह को भी नही होती....ईश्वर ऐसी रचनाएं करता है....देवता ऐसा संभव करते हैं..हर ओर से निराश होकर भी अंत मे हृदय में एक दीपक आशा की एक क्षीण सी किरण जलाए रखता है,,,वह है कृष्ण का नाम....इस नाम का आधार द्रौपदी ने कभी नही त्यागा....नही,, कृष्ण हैं तो द्रौपदी का सम्मान जीवित है...भक्त है तो भगवान है....भक्त सदा भक्त  है.....स्वयं को प्रत्यक्ष भगवान को करना होता है...अपनी शक्ति का परिचय देना होता है....आज द्रौपदी की नही,,एक भक्त की अस्मिता दांव पर है मधुसूदन.....आज तुम्हारा अस्तित्व दांव पर है गोवर्धन....आज तुम्हारे भक्त प्रेम की परीक्षा है केशव......
                 श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी,, जय नाथ नारायन वासुदेव.....इस मंत्र का जाप सदा पांचाली ने किया है....कृष्ण पर उसकी अटूट श्रद्धा रही है....छद्म वीरों के इस संसार मे केशव का नाम ही एक अबला का सहारा बनता रहा है,,बनता रहेगा..हे नाथ,,रक्षा...रक्षा....
                 द्रौपदी के वस्त्र का एक सिरा अपने पैरों से दबाए,दुशाशन के हाथ उसके शरीर से वस्त्र खींचने को बढ़े...वस्त्र का दूसरा सिरा थामे पांचाली,,अपने नेत्रों को भींचे,,हृदय में गोविंद गोविंद पुकार रही है..यह भक्त की वह करुणामयी पुकार है,,जिस पर शेषनाग की शैय्या करते ईश्वर की तंद्रा भी टूटती है...समाधि में बैठे शिव भी जिस करुण पुकार के कारण विचलित हो उठते हैं.....हृदय से उठी यह उस अखंड विश्वास की पुकार है,,जिसका आधार लेकर सृष्टि कायम है..जिस विश्वास पर ब्रह्मांड की गतियां कायम हैं..जो विश्वास मनुष्य को अपने आराध्य के साक्षात दर्शन कराता है...
                        दुःशाशन ने आगे बढ़कर द्रौपदी के वस्त्रों को उसके शरीर से खींचना आरम्भ किया....पांडव लज्जा से सिर झुकाए बैठे हैं...बाकी सभा नीचता से अपनी गिद्ध दृष्टि पांचाली की देह पर लगाए बैठी है..दुर्योधन ने उत्तेजित होकर अपनी जंघा पर हाथ मारा....दुशासन ने द्रौपदी के बाहरी वस्त्र को खींचकर उसके शरीर से अलग निकाल फेंका...सभा सीत्कार से भर उठी..वीर दुशाशन के हाथ अधोवस्त्रों की ओर बढ़े....द्रौपदी का मन परमहंसों की उस अवस्था तक पहुंच गया है,,जहां उसके हृदय में कृष्ण के सिवा कुछ दृश्य नही,,,कानो में केशव केशव के सिवा कोई ध्वनि नही,,जिव्हा पर हे गोविंद हे गोविंद के सिवा कोई पुकार नही.....वस्त्रों से द्रौपदी का ध्यान हट चुका है,,दोनो हाथ जोड़े भक्त बस प्रभु का आह्वान कर रहा है..
                          दुशासन ने द्रौपदी के अंगवस्त्र पर हाथ बढ़ाया ही था कि उसी क्षण सम्पूर्ण कुरुसभा एक प्रचंड ध्वनि से गूंज उठी..सम्पूर्ण ब्रह्मांड को बींधती इस ध्वनि की तीव्रता ने मानो सब कुछ शून्य कर दिया हो..कुरुमहल की धरती प्रलय के कंपन से थरथरा उठी...सभा मे उपस्थित वीरों का तेज बुझ गया...दुशाशन सहित अनेकों महारथी अपने  कर्णों पर हाथ धरे चेतनाशून्य हो उठे..धरती डगमगा उठी....शेषनाग ने अपने फन को झटक कर होने वाली घटना के लिए स्वयं को सचेत किया,,,शिव ने डगमगाते कैलाश को पुनः अपने प्रभाव से स्थिर किया,....सर्वप्रथम कुन्तीनन्दन अर्जुन ने इस ध्वनि को पहचाना....उस ध्वनि को ,जिससे  संसार का हर महारथी परिचित है ....जिस ध्वनि के आगे ब्रह्मांड शीश नवाता है..वो ध्वनि जो संसार मे विरलतम है...जिस ध्वनि की गूंज वीरों का तेज हर उन्हें नपुंसक बनाने का सामर्थ्य रखती है....ये कृष्ण के पांचजन्य की गूंज है....इस शंख को वासुदेव धारण करते हैं..ये द्वारिकाधीश के रूप में ब्रह्मांड के स्वामी के आगमन की घोषणा है.....ये उस चक्रपाणी के आगमन का संदेश है,,जिसकी वीरता के आगे संसार नतमस्तक है...
                                 वासुदेव महल प्रांगण में प्रवेश कर चुके हैं....प्रचंड ज्वाला में धधकते कृष्ण ने अपने आगमन की हुंकार करी...पांचजन्य संसार का सर्वश्रेष्ठ ध्वनि शंख है,,जिसे संसार का सर्वोत्तम महारथी धारण करता है..चलते रथ से कूद कर कृष्ण द्युत सभा की ओर भागे...जब तक कुरुसभा पांचजन्य के प्रभाव से स्थिर होती,,सम्पूर्ण कुरुमहल कृष्ण के तेज से स्तम्भित हो उठा..क्षण भर में पासा पलट गया....भगवान ने धरती की गति को मानो स्थिर कर दिया हो....कृष्ण ने अपना पीतांबर द्रौपदी के कांधे पर फैला दिया...ये वो पीताम्बर है जो समूर्ण आकाश को ढकने का सामर्थ्य रखता है..आग्नेय दृष्टि से कृष्ण ने कुरुसभा को मानो चुनौती दी हो...द्रौपदी के ओढे पीताम्बर को स्पर्श करने की चुनौती..
                कुरुसभा के समस्त वीर योद्धा जानते हैं कि द्रौपदी के शरीर पर पड़े पीताम्बर को स्पर्श करने का अर्थ  कृष्ण के सुदर्शन चक्र को ललकारना है..वे यादवों के अधिपति हैं....इस सुदर्शन के पीछे संसार का नाश करने में सक्षम मृत देहों का अंबार खड़ा करने के बलराम के हल की फाल से सब परिचित हैं..यादव श्रेष्ठ सात्यकि की बाणों की गति संसार जरासंध युद्ध मे देख चुका है,,,उद्दव के धनुष की टंकार किसी भी साम्राज्य का विध्वसंश करने में सक्षम है....ये पीताम्बर नही,,यादवों का आत्मसम्मान है...यह कृष्ण का धर्म है...और संसार मे किस महारथी का सामर्थ्य है जो कृष्ण के धर्म को चुनौती दे सके..
             सभा निर्वीर्य देखती रह गयी,,,भगवान भक्त का हाथ थामे धीमे से वहां से प्रस्थान कर गए....

क्या है आपके लिए निषेध

--*** क्या है आपके लिए निषेध.***
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        कारक व अकारक के संबंध में बहुत सी भ्रांतियां व जिज्ञासाएं देखने मे आती रहती हैं..कई पाठकों का प्रश्न होता है कि हमारे लिए क्या कारक है व क्या अकारक है....ऐसे में अपने सुधि पाठकों को आज इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करता हूँ....कारक अकारक के कंफ्यूज़न में एक शब्द सदा उपेक्षित हो जाता है,,,और वह है निषेध.... निषेध अर्थात आउट ऑफ बाउंड...आपके समीकरण के विपरीत कोई सिद्धान्त,,नियम,,वस्तु...
          पेट्रोल कितना भी ताकतवर सही,किन्तु डीजल इंजन में निषेध है,,,,,डीजल कितना भी बेहतर सही,,पेट्रोल इंजन में निषेध है....जल से उत्पन्न होकर भी विधुत उपकरणों के लिए जल निषेध है..दूध कितना भी बेहतर सही,,खट्टे के साथ निषेध है....ऐसे में जातक के जीवन मे कई साधन निषेध हैं,,किन्तु हम ज्ञान के अभाव में उन्ही निषेध पदार्थों को अपने जीवन मे उपयोग करते रहते हैं,,व अपने लिए समस्याएं उत्पन करते हैं...
                  अष्टम भाव अंतिम भाव है जीवन का.…नवम प्रथम भाव है,,प्राण है..आठवां अंतिम ग्रह है,,,आठ ग्रह हैं....ग्रहों का प्रमाण आठ है,,,केतु राहु से ही निकला हुआ ग्रह है.…अतः आठवें का रंग मनुष्य के लिए कफन का रंग है.…..इससे परहेज करना बेहतर होता है..अष्ठम मृत्यु के बाद नवम प्रथम जीवन का आभास है,,धर्म है,,मंदिर है,,देवता का स्थान है...बचपन है.....ध्यान दीजिए,,भोजन का सबसे अधिक परहेज बालक के लिए ही होता है...बहुत से भोज्य पदार्थ उसका शरीर पचाने में सक्षम नही होता...दूसरा यह कि मंदिर होने के कारण ये देवताओं को अर्पित होने वाला स्थान है,,यहाँ की हर वस्तु पर देवताओं का अधिकार है...अतः भोज्य पदार्थ के रूप में आपके लिए त्याज्य है.…..नवम में बैठे ग्रह व नवमेश से संबंधित भोजन का परहेज करिये....यहां गुरु विराजमान है तो केले से परहेज कीजिये..चंद्र की राशि है तो रात्रि में दूध से परहेज कीजिये.. आठवें का संबंध मंगल से है तो पहनने के लिए लाल रंग से परहेज कीजिये...,गुरु का संबंध है तो पीले रंग के वस्त्रों से परहेज कीजिये...चंद्र संबंधी है तो सफेद त्याज्य है....इसी प्रकार अन्य ग्रहों का संबंध देखा जाना ,,बहुत सी जटिलताओं को सुलझाने में सहायक होता है....
        आशा है पाठकों तक अपनी बात पहुंचा पाया हूँ...कृपया अपनी अमूल्य राय रखिये....रविवार के अवकाश का आप पूर्ण आनंद लें,,,,इसी दुआ के साथ आप सभी को सादर प्रणाम..

राहु देता है छप्पर फाड़ कर

***--  राहु देता है छप्पड़ फाड़ कर..***
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         प्रबुद्ध पाठकों ने एक कहावत सुनी होगी,,,छप्पड़ फाड़ कर देना....कहावतें भी कई बार ज्योतिष के आम सूत्रों की ओर संकेत करती हैं..राहु धड़ विहीन एक ग्रह है...एक ऐसा ग्रह जब अपनी नकारात्मकता पर उतर आए,,तो सूर्य व चंद्र तक को खा जाता है...राहु को नकारात्मक अथवा सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करने को बाध्य करने का सामर्थ्य स्वयं जातक के पास होता है,,या कह लें स्वयं जातक ही अपने राहु को सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव देता है..
                   उत्पादन के हिसाब से देखा जाय तो पंचम व एकादश,,ये दो भाव उत्पादन करने वाले कहे गए हैं..ऐसे में पंचम व एकादश को प्रभावित करने वाला राहु प्रारम्भिक रूप से इन दोनों भावों का उत्पादन खा जाता है...शिक्षा भाव मे आधिपत्य जमाया राहु प्रारम्भिक शिक्षा का नाश करता है..एकादश भाव मे बैठा राहु ,,आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया की कहावत को चरितार्थ करता है..ये जातक की आरंभिक आय को कई तरीके से खाने के रूप में जाना जाता है...
            किन्तु पाठक जानते हैं राहु के पास पेट नही है ,,खाया हुआ पचाने को...अतः स्वाभाविक रूप से इसे ये सब खाया हुआ उगलना पड़ता है एक  दिन...इसे ही ज्योतिष की दृष्टि में छप्पड़ फाड़ कर देने वाला कहा गया है..पंचम में राहु के प्रभाव ने थॉमस अल्वा एडिसन को प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रखा...उसे स्कूल तक से निकम्मा कह कर निकाल दिया गया...किन्तु तुला लग्न में लग्नस्थ राहु के शुभ प्रभाव से वही बालक बिजली के बल्ब अविष्कारक बन नोबल पुरस्कार विजेता बन कर कालांतर में सामने आया..महान भरतीय वैज्ञानिक श्री अब्दुल कलाम के नवमस्थ राहु ने पंचम भाव को बांधा,,,उनकी आरम्भिक शिक्षा बहुत कठिनाई के माहौल में हुई,,किन्तु नवम शिक्षा की भी शिक्षा है,,पंचम से पंचम... उच्च शिक्षा के भाव में राहु के प्रभाव  ने उन्हें श्रेष्ट अविष्कारक बना कर प्रस्तुत किया....एकादश राहु के बहुत प्रमाण देखने मे आते हैं....भारतीय कप्तान धोनी के नाम से सभी परिचित है ....देवानंद एक मामूली इंसान थे,,एकादश राहु जब देने पर आया तो छप्पड़ फाड़ कर दे गया..अल्मोड़ा के एक गरीब परिवार से निकले महान राजनीतिज्ञ स्वर्गीय नारायण दत्त तिवाड़ी जी का प्रारम्भिक जीवन बेहद विषमताओं में गुजरा....एकादश राहु के शुभ प्रभाव में आते ही उनका वर्चस्व इंदिरा गांधी तक को चुनौती दे गया....इसी एकादश राहु का चमत्कार आजकल और एक उदाहरण में दिखाई दिया है...जरा अंदाजा लगाइये कहाँ.....
     सोचिये,,,
           दिमाग पर जोर डालिये...….

      .... . . ..  .. ...   ... ...रानू मंडल का नाम तो सुना ही होगा.......

बुध सबसे महत्वपूर्ण है

--*****संसार को संचालित कर रहा है बुध..**
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       ज्योतिष में सबसे कम विवेचित किये जाने वाला कोई ग्रह है तो वह बुध है...संसार भर के ज्योतिषी राहु शनि व मंगल की पूंछ उमेठने में ही सामान्यतः  लगे रहते हैं....किन्तु मेरी व्यक्तिगत राय में मैं बुध से अधिक पावरफुल इस युग में किसी ग्रह को नही मानता...जातक का बुध मजबूत है तो बहुत सी बाधाओं पर वो सहजता से विजय पा लेता है...
          जन्म में साथ बुध का प्रथम प्रभाव जातक की त्वचा पर होता है,,,,अर्थात स्किन बुध का विभाग है..आप जानते ही हैं कि गोरा(अंग्रेज)पैदा होते ही आप अपने आप श्रेष्ट कहलाये जाने योग्य होते हैं...मेरे जैसे काले इंडियन समाज मे दूसरे स्तर पर गिनती होते हैं...आप अंग्रेज हैं तो आपके मल में से भी खुशबू आती है...मेरे जैसे काले हैं तो आपका इत्र भी बास मारता है....अतः समाज मे श्रेष्ठता का प्रथम सोपान आपकी त्वचा के रंग से तय होता है....द्वितीय पायदान आपके स्नायु तंत्र हैं....विवेकहीन की भला क्या बिसात...हालात को नियंत्रित रखने के लिए आपका स्वयं के स्नायु पर नियंत्रण होना आवश्यक है....बुध का तीसरा अधिकार क्षेत्र आपकी वाणी पर है....भाषा पर आपका नियंत्रण है तो आप गंजे को भी कंघी बेच आते हैं..संसार की प्रत्येक मुश्किल को आप अपने भाषा कौशल से सहज ही निपटाने में सक्षम होते हैं.....शिक्षा में मैथ्स अर्थात गणित का डंका संसार भर में बजता है....यह गणित बुध द्वारा ही नियंत्रित होती है...
              दुनिया को चलाने के लिए अथवा कहें संसार में जीने के लिए अगर आज के युग मे कोई वस्तु प्राणवायु से भी अधिक कीमती हो चली है तो वह पैसा है....बुध पैसे का अधिकारी है....बिना बुध कोई बैंक नही,,कोई फाइनेंस सेक्टर नही,,कोई कम्युनिकेशन नही.....दिशाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिशा उत्तर का अधिकारी बुध ही है..वनस्पतियों में सबसे कीमती तुलसी को बुध का पौधा ही माना गया है..हरी भरी खेती का मालिक ही असली जमींदार है.....हर प्रकार का व्यापार बुध ही तो है...देवताओं में अग्रपूजनीय गणेश जी इसके अधिष्ठात्री देवता हैं....
           आप जानते हैं बुध का धरती पर सबसे बड़ा स्रोत क्या है??..जिसे आप बुध का ट्रांसफार्मर कह सकते हैं....वो बुआ होती है,,,आपके पिता की बहन,,,आपकी फूफू.....विश्वास कीजिये यदि आपका बुआ से मतभेद है तो स्वयं के व्यापार में बरकत की कहानी भूल जाओ भैय्या….ये संभव नही है....बुध का दूसरा जेनरेटर किन्नर होता है...यदि आपके मन मे किन्नरों के लिए सम्मान नही तो बुध आपके सम्मान की धज्जियां कभी भी उड़ा सकता है.....तुलसी का पौधा आपके लिए कल्पवृक्ष के समान है,,इसे घर मे लगाइये व इसका सेवन किसी भी रूप में कीजिये,,,बहुत सी समस्याएं स्वतः ही आपका पीछा छोड़ देंगी....ज्योतिष को समझने के लिए बहुत से वेद पढ़ने की आवश्यकता नही ,,,ज्योतिष आपके चारों तरफ बिखरा पड़ा है...बस समग्र दृष्टि रखिये...देखने से अधिक समझिये..तोते की भांति रटने की बजाय महसूस कीजिये.....समस्त प्रश्नों के उत्तर ब्रह्मांड में बिखरे पड़े हैं...स्वयं खोजिये...…..तो बोलिये बुध महाराज की जय......

छत में बंधा कुत्ता..राहु

***--  राहु ..छत में बंधा कुत्ता...आ बैल मुझे मार..
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              ज्योतिष संबंधी भविष्यवाणियों के साथ समस्या यह होती है कि जातक व पाठक को सबकुछ कहीं लिखा हुआ ही चाहिए होता है....स्वयं अनुभूत तथ्यों पर उसकी आस्था नही होती,,,व दूसरे के अनुभवों पर कुतर्क करने के लिए फ़ेसबुक यूनिवर्सिटी व व्हाट्सअप विश्वविद्यालय से डिग्री किया हुआ ज्योतिषी सबसे पहले फांद कर आगे आता है......यही कारण रहा कि मैं पिछले 15 वर्षों के अपने अनुभव को सूत्रों के रूप में शेयर करने में कंजूसी दिखाता हूँ.... जानता हूं कि उन सूत्रों का इस मायाजाल में कोई महत्व नही होने वाला...किन्तु स्वयं की प्रैक्टिस में निस्संकोच उन सूत्रों को अमल में लाता हूँ,, व कहते हुए कोई संकोच नही कि उन्ही सूत्रों के दम पर मेरी रोजी रोटी बहुत इत्मीनान व सम्मान से चल रही है...मेरे इन्ही सूत्रों ने मुझे कैनाडा,, अमेरिका आदि तक मे परमानैंट जजमान दिलवाए हैं....
              मेरे पड़ोस में एक परिवार आकर बसा है,,,वैसे मैं खुद अधिकतर अपने ऑफिस के दबड़े में दुबका रहने वाला इंसान हूँ,,किसी अन्य को क्या दोष दूँ,,,किन्तु पड़ोस में बसे परिवार के बालकों तक ने भी कभी दुआ सलाम,,पंडित जी प्रणाम कहने की जहमत नही उठाई है..खैर किस्सा यह है उनकी छत में अधिकतर दो तीन कुत्ते बंधे रहते हैं,,जो लगातार भौंकते व रोते रहते हैं...मुझे शिद्दत से पता है कि यदि किसी जातक की कुंडली मे राहु अष्ठम भाव अथवा भावेश को किसी भी रूप में प्रभावित कर रहा हो,,,संबंध बना रहा हो,,तो घर की छत में कुत्ता बांधना,,व कुत्ते का वहां रोना बहुत घातक दुष्परिणाम उत्पन करने में सक्षम होता है...ये राहु को बिगाड़ने का काम करता है,,,,आ बैल मुझे मार की कहावत चरितार्थ करता है..घर का मुखिया अथवा कोई सदस्य ऐसा होने के 120 दिनों के भीतर दुर्घटना अथवा किसी घातक रोग का शिकार होता ही होता है....ये वर्षों से अनुभूत तथ्य है मेरा...लिखा हुआ दिखाने को कहेंगे तो मैं नमस्ते बोलकर आगे बढ़ लूंगा...
            हां तो हुआ यह कि मेरी बहुत इच्छा हुई पड़ोस में बसे परिवार को इस बाबत सूचित करूँ.. किन्तु उन लोगों के आचरण व्यवहार से लगा नही कि धर्म के किसी भी रूप में उनकी किसी प्रकार की आस्था होगी,,,अतः मन मसोज कर रह गया.. कुछ समय पश्चात एक दिन अचानक उनके घर से बहुत शोर सुनने को मिला...मालूम हुआ एम्बुलेंस आयी हुई है,,उनकी माताजी छत से गिर कर बेहद खतरनाक तरीक़े से घायल हो गयी हैं..मेरी दृष्टि तुरंत उनकी छत पर गयी,,,तीन तीन राहु देव् मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे...मैं जानता था राहु अपना काम कर गया....हृदय को दुख हुआ...मैं रोक सकता था,,कम से कम सचेत तो कर ही सकता था उन्हें...नही कर पाया,,,कारण कुछ भी रहा हो....किन्तु अब उस भूल को सुधारता हूँ,, सुधारना चाहता हूं....अतः अपने प्रिय पाठकों को सूचित कर रहा हूँ,,,घर मे किसी भी सदस्य के अष्ठम भाव,, भावेश से कैसा भी संबंध राहु का बनता हो तो कृपया अपनी छत में कुत्ता न बांधे.....छत में चिड़ियाओं के लिए दाना बिखेरें.….वे राहु की नकारात्मक ऊर्जा का क्षय  करती हैं....कुत्ता उन्हें डराता है,,वे उड़ जाती हैं...
       इस विषय पर आप लोगों का कोई अनुभूत अनुभव हो तो कृपया बताएं...लेख के बारे के आपकी अमूल्य राय से भी अवगत कराएं...आप सुधि पाठकों का प्रोत्साहन मुझे आपके साथ अपने अनुभव बांटने के लिए प्रोत्साहित करेगा....सादर प्रणाम..

शुक्र से कैसे बने राजयोग

***** (मात्र उन्ही  प्रश्नों के उत्तर दे पाऊंगा जो,,स्पष्ट भाषा मे,,पूर्ण डाटा द्वारा पूछे  गए हों,,यथासंभव प्रयास के बाद भी यदि किसी का प्रश्न नही ले सका,, तो रुष्ट न होइएगा,,ये प्रार्थना है)******
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            ज्योतिष के विद्यार्थी सामान्यतः जानते हैं कि शुक्र को द्वादश भाव में ,तथा द्वादश राशि मे उच्च माना जाता है....अधिकतर ज्योतिषीय ग्रंथों में इस योग का बड़ा गुणगान होता आया है...विवेचना के स्तर पर नए ज्योतिष विद्यार्थियों को कई बार इसी भ्रम में ,इसका परिणाम तय करते हुए देख कर पीड़ा होती है ...........संभवतः पाठकों को ज्ञात हो कि शुक्र सामान्यतः अन्य ग्रहों की अपेक्षा अपने लैप में उल्टी दिशा में घूमता है....ऐसे में वो एक प्रकार से वापस आता हुआ ग्रह है......अपने सिद्धान्त के विपरीत शुक्र मीन में अपने स्वभाव के अपोजिट  सात्विक प्रभाव देने वाला हो जाता है.........
            कारण वास्तव में बहुत गूढ़ है....द्वादश भाव में मोक्ष का भाव है..महानिर्वाण का भाव है..ऐसे में कालपुरुष में ये भाव देवगुरु के आधीन है...सामान्य मित्र चक्र में देवगुरु के नितांत शत्रु होते हुए भी इस भाव में शुक्र उच्च पद पा जाते हैं.....क्योंकि भोगी अपना स्वरुप बदलकर योगी बन जाता है...शुक्र जो भी क्रिया देते हैं,,जो भी कर्म करवाते है ,वो मोक्ष के लिए होता है...ये भाग्य को सुख देने का भाव है...सामान्यतः शुक्र भोग विलास के कारक हैं...यहाँ ये भोग विलास सात्विक हो जाता है..अतः पूजनीय हो जाता है..कालपुरुष में षष्ठम भाव रिपु भाव माना गया है...अतः भोग विलास जब सांसारिकता का भाव ग्रहण कर लेता है तो यही भोग विलास के कारक शुक्र मित्र बुध की कन्या राशि होते हुए भी नीच मान लिए जाते हैं.............
           भोग विलास के कारक का उच्च होना वास्तव में भोग की प्रवृत्ति को लगाम लगाना है......राम की,,, गौतम बुद्ध की कुंडली मे शुक्र उच्च हो सकते हैं,,,,किन्तु एक रईस शेख की कुंडली मे इन्हें नीच में आना ही होता है ,,,अपना वास्तविक प्रभाव देने के लिए.....इतिहास गवाह है कि जातक को सांसारिक सुख का जितना लाभ कन्या के शुक्र ने प्रदान किया है,, वो मीन का शुक्र नही दे पाया..........ये बारहवें मोक्ष (जीवन के पश्चात सुख) का कारण बन सकता है,,,,किन्तु जब तक मनुष्य पृथ्वी पर ,सांसारिकता से बंधा है,,तब तक नीच शुक्र ही एकलौती आशा की किरण है भैया.....मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात का पक्षधर हूँ कि यदि जातक मरने के बाद मोक्ष की आस नही रखकर,,जीते जी भोग विलास का अनुयायी है,,,तो ऐसी अवस्था मे कन्या का शुक्र आपके लिए अधिक सौभाग्य का कारक है...
            प्रोफेशनल ज्योतिषी कई बार शुक्र को उच्च का पाकर भी जातक की स्थिती डांवाडोल देखेंगे,,,,और नीच का शुक्र होते हुए भी जातक को मौज में देखेंगे..............कारण वही है,,,शुक्र का सामान्य से विपरीत दिशा को भ्रमण........अब कृपया कोई पाठक ऐसा बोल कर कुतर्क न करे ,कि हमने तो ऐसा कहीं लिखा नही देखा..............(जैसा एक सज्जन मेरे पिछले लेख में बोल रहे थे) ,,,मित्रवर हर बात लिखी हुई ही मिल जाती ,तो शौकिया ज्योतिषी और विधिवत आचार्य में भला क्या अंतर रह जाता........ ये सूत्र निरंतर कुंडली अध्ययन ,,,,,,पेशे के प्रति आपकी आस्था,,,स्वयं को प्रयासों की भट्टी में झोंककर ,,तपाकर प्राप्त हुआ कुंदन है... आपके द्वारा स्वयं को  ज्योतिष सागर में डुबोकर  प्राप्त होने वाले मोती हैं,,,,इनके लिए समुंदर के तल में उतरना होता है....किनारे बैठ कर अपने पैरों को पानी मे भिगो कर ,,समुद्र का गोता मारने का भ्रम रखने वाला गणक इन बातों को समझने में सक्षम हो पायेगा,,ऐसा मानना ज्योतिष शास्त्र के साथ अन्याय है....और इन्ही सूत्रों की जानकारी ,एक प्रोफेशनल ज्योतिषी व एक शौकिया ज्योतिषी के मध्य का भेद तय करती है.......अतः यहां बेकार तर्क करने से बेहतर है कि भविष्य में कुंडली अवलोकन करते समय,,इसे  संज्ञान में रखकर प्रक्टिकली समझें.............हर बात के लिए पुस्तकों के भरोसे मत रहिये,,,,,,,,,अन्यथा हाल उस छात्र की तरह हो जाता है जो निबंध गाय पर रटकर गया था और परीक्षा में बैल का आ गया...........बंदे ने उपाय ये किया,,कि निबंध वही रखा,,,,, बस गाय के बदले बैल लिखता गया.......आशा है पाठक सहमत होंगे...आज किंचित फुरसत में हूं,,, अतः पाठक चाहें तो अपना प्रश्न  करें,,,,,,,जितनी इजाजत समय देगा,मात्र उतने ही प्रश्नों के उत्तर दे पाऊंगा,,एक मेहरबानी कीजियेगा,,कृपया प्रश्न स्पष्ट रखियेगा.....
       इनबॉक्स में प्रश्न न करें,,चाहे गरिया लें,चाहे अपशब्द कहे लें किन्तु हर बार की भांति स्पष्ट बता दूं ,मैं प्रोफेशनल ज्योतिषी हूँ,, फीस लेता हूँ ,क्योंकि इसी कार्य से मेरे परिवार का भरण पोषण होता है..........प्रणाम
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मृत्यु की काट,,सप्तम भाव

--**रोग व मृत्यु के बीच खड़ी दीवार..आपकी अर्धांगनी --**
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"लेकर कर में पत्रिका
 हिय से लियो विचारी
 मृत्यु और शत्रु के
 बीच खड़ी है नारी.."
     सप्तम भाव पर बहुत कुछ कहा गया है...यह रोग भाव व मृत्यु भाव के मध्य खड़ी दीवार है....पुराणों में सत्यवान व सावित्री की कथा आपने सुनी होंगी....सत्यवान की अखंड मृत्यु को अपने सतीत्व के बल पर सावित्री ने परास्त किया,,ऐसा प्रमाण है.....कालिदास की सफलता के पीछे उसकी स्त्री ही खड़ी दिखाई देती हैं..इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने युद्ध लड़े गए,,उस सबके पीछे जऱ जोरू व जमीन ही रही है,,,इसी कारण सप्तम व द्वितीय मारक कहे गए हैं,,व कालपुरुष का आरम्भ करता मंगल,,चतुर्थ में नीच फल देने लगता है...कितनी हैरानी है कि भूमि का कारक होकर भौम अर्थात मंगल,,भूमि के भाव मे ही नीच हो जाता है,,,,कभी सोचा है आपने क्यों??...सोचिये...इसी कारण ये भाव झगड़े की जड़ है,,,
                  सैकड़ों प्रमाण हैं कि किसी जातक की स्त्री ने अपनी सेवा द्वारा अपने जीवन साथी के बड़े बड़े रोगों को ठीक किया है..कालपुरुष में देखें तो यह आय का नवम भाव है,,अर्थात पुरुष की आय को भाग्य देने का स्थान...इसलिए पुराने लोग विवाह के बाद घर पर लक्ष्मी का आगमन होना कहा करते थे.. जिस पुरुष ने अपने जीवनसाथी का महत्व पहचान लिया,,संसार मे उससे अधिक शक्तिशाली कोई नही...यह भाग्य की आय का भाव है..अर्थात भाग्य को बरकत तभी है जब सप्तम बलवान है..यह देवताओं के लिए तक पुण्य स्थान रहा है..कितना रोचक संयोग है कि सप्तम सदा लग्नेश का शत्रु ग्रह होता है,,व अपनी मूल त्रिकोण अथवा उच्च की राशि मे यदि ग्रह लग्न में विराजमान होता है तो सप्तम में स्वतः ही उसकी नीच राशि आ जाती है...हालांकि ये क्रम सभी भावों से बनता है,,किन्तु ध्यान रखने वाली बात है कि लग्न से ही अर्धनारीश्वर  का निर्माण माना गया है.…लग्न यदि संसार को विसध्वंश करने में सक्षम शिव का त्रिनेत्र है,,तो सप्तम संसार को प्राण देने वाली योनि है,गर्भ है..यह प्राणों की रक्षा का भाव है....अतः पाठकों को चाहिए कि यदि अकाल मृत्यु से बचना है,,,रोगों की काट करनी है,,तो अपने जीवन साथी के आगे नतमस्तक होना सीखिए..... लेख के बारे में आपकी अमूल्य राय से अवश्य अवगत कराइये..

नवम में राहु गुरु

......**...नवम भाव मे राहु गुरु युति..****
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       नवम भाव के गुरु पर जैमिनी,,वशिष्ट,,गर्ग व नारद आदि कई ऋषियों द्वारा बहुत कुछ कहा गया है....यह मृत्यु के बाद का भाव है,,अतः बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है ....यह मृत्यु के बाद की यात्रा भी है,,,व देवलोक की यात्रा में देवगुरु से बेहतर सारथी भला और कौन हो सकता है..
      नवम के गुरु को ज्योतिष में बहुत बड़ा स्थान प्राप्त है...वैसे भी नवम,दशम व एकादश का गुरु बुलंदियां देने वाला कहा गया है..यहां से मेरे पाठकों द्वारा कई बार मुझसे यह प्रश्न किया गया है कि नवम के गुरु की यदि राहु से युति हो जाय तो क्या परिणाम आते हैं...
             सामान्य दृष्टि से ये युति गुरु चांडाल दोष का सृजन कर देती है...किन्तु मेरे विद्वान पाठक जानते हैं कि नवम भाव मंदिर भी कहलाता है,,क्योंकि धर्म का स्थान है,,धर्म का भाव है...ऐसे में कभी आपने मंदिर में धातु के बने हुए नागों की मूर्ति को देखा है..किंतने पूज्य हैं वे....कई बार शिवलिंग के ऊपर भी स्थापित किया जाता है,,,कई मूर्तियों में विष्णु के साथ स्थापित हैं....बड़ी श्रद्धा से इनकी उपासना की जाती है....बस यही स्थान नवम में सिंहिका के पुत्र राहु को प्राप्त हो जाता है..राहु देवता ग्रह है..ये अमरत्व को प्राप्त है...यह मर नही सकता,,अतः अस्त नही होता...आप ध्यान दें कि इसे देवगुरु की ही दृष्टि प्राप्त है...अमरत्व की दृष्टि..अतः नवम का राहु बिना प्रयास ,अकारण ही मोक्ष प्राप्त करा देता है..यहां से लग्न ,,तृतीय व पंचम पर संयुक्त दृष्टि इन तीनो भावों को अतिशय बलदायी कर देती है,,इसमे संदेह नही....अतः नवम को गुरु चांडाल दोष नही लगता है,,ऐसा प्रमाणित है...शेष फिर कभी...प्रणाम....

सोमवार, 24 सितंबर 2018

जटायु...

******* जटायु******
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              आंखों के किनारों पर सिमटते अंधेरे ने आभास दिया,,कि ये जीवन की अंतिम सांझ बेला है,,,अब संभवतः  अपने पित्रों के सम्मुख जाने का समय नजदीक है....किन्तु एक कसक रह जायेगी,,,अपनी अंतिम यात्रा वो उस सम्मान के साथ पूर्ण नही कर सका,,जिस सम्मान का वाहक सदा से उसका कुल रहा है..निरंतर मंद होती स्वास की गति अब मानो निर्वाण यात्रा को कूच करने का स्मरण बार बार करा रही है..अपने कुल को कलंक लगा गया मैं,, अपना कर्तव्य नही निभा सका...क्या अब कभी इतिहास में उसका वंश  सम्मान का भागी नही रहेगा,,पूर्वजों की ख्याति क्या उसके इस असफल प्रयास से धूमिल हो जाएगी.....
              भाग्य की विडंबना रही है कि अपनी मुख्य उड़ानों में वो हर बार असफल ही रहा है...वर्षों पहले सूर्य तक पहुंचने की उसकी जिद का हश्र ,,अंत मे उसके ज्येष्ठ भ्राता सम्पाती के पंख जलकर पूर्ण हुआ..अपने अनुज के प्राणों की रक्षा के लिए ,,सम्पाती ने उसे सूर्य के प्रचंड ताप से बचाने हेतु अपने पंखों में छिपा लिया...उसके प्राण तो बच गए,,पर भाई पंख विहीन हो गया..अनुज को पश्चाताप करते देख सम्पाती ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कितने स्नेह से कहा था कि ,,,अब तू ही मेरी उड़ान है,,,कालांतर में तेरा ही प्रयास मुझे विष्णु के कार्य का भागी बना मोक्ष प्रदान करेगा....
                     बड़ा भाई अभी भी समुद्र के किनारे कंदराओं में मोक्ष की राह ताकता होगा,,,अपने छोटे भ्राता पर उसका अखंड विश्वास रहा है...जाते समय राम भी किंतने विश्वास से सीता का चौकसी करने का भार उसके ऊपर डाल गए थे,,,,नही,,नही,,,वो यूं सबके विश्वास का हनन कदापि नही कर सकता....वो अपने ज्येष्ठ के बलिदान को यूं निरर्थक नही बना सकता....अभी भाई जीवित है,,इसका सीधा अर्थ है कि अभी अंतिम उड़ान बाकी है...नही अभी मेरे प्राण नही निकल सकते...अभी कर्तव्य का निर्वाह  होना शेष है ..अपने कुल के मान को अपने बूढे पंखों पर अपनी अंतिम सांस तक ढोना है..और अभी प्राण शेष हैं....गिद्ध ने प्राण देना सीखा है,,सम्मान देना नही..
               कर्तव्य के भान ने मानो जटायु के शरीर मे चेतना का संचार किया...कालांतर में जितना बल दसग्रीव के बाहुबलियों ने अंगद के पैर को डिगाने के प्रयास में लगाया होगा,,,,उससे सहस्त्र कोटि अधिक बल जटायु को अपने नेत्र खोलने में लगाना पड़ा...पलकों के कोने से आते प्रकाश ने ,,,विचारों को अधिक जागृत किया....हे प्रभु.....पता नही अभी कितने पल बीत गए जटायु को चेतनाहीन हुए..किस दिशा में वो असुर भगवती सीता को ले गया,,कुछ ज्ञात नही....दाहिने पंख में हुए घातक वार ने जटायु को क्षण भर के लिए चेतना शून्य किया ही था कि सीने के ठीक मध्य में रावण की कटार का गहरा वार मानो प्राणों का अंत ही कर गया था....
                   सीता भय से चीखती होंगी....जटायु को धरती पर गिरते गिरते भगवती सीता की अंतिम चीख मानो पुनः स्मरण हो आई..सीता के श्वसुर दशरथ जटायु के परम मित्रों में रहे हैं..इसी कारण सीता सदा उन्हें पिता तुल्य सम्मान देती आई हैं...आज पुत्री विपदा में है और जटायु को प्राणों का मोह हो रहा है,,,,धिक्कार है इस जीवन पर....आत्मसम्मान ने आगे बढ़कर मानो प्राणों पर थूका हो.......
       नही नही,,प्राणों का मोह नही,,,,जटायु की आत्मा त्राहि कर उठी,,प्राणों का मोह जटायु को कभी नही रहा.. ये यम की फांस है जो निरंतर उसे जकड़ती जा रही है.....किन्तु अभी बहुत से दायित्वों का निर्वाह बाकी है....नही ,,,,,यम के रथ को रुकना ही होगा....गिद्ध ने अपनी समस्त इच्छाशक्ति को अपने पंखों पर हस्तांतरित किया.....अभी अंतिम उड़ान शेष थी,,,,,,,वो उड़ान शेष थी,, जो इतिहास में जटायु का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित करने वाली थी.......वो उड़ान शेष थी जो भाई सम्पाती को राम कार्य का भागीदार बना,, मोक्ष का अधिकारी बनाने वाली थी...अभी कुल का सम्मान शेष था,,.....................अभी जटायु शेष था....
                            एक झटके के साथ गिद्ध ने अपने घायल वृद्ध शरीर को हरकत में पाया..पंखों ने मानो फड़फड़ाकर अपने अस्तित्व के अंतिम युद्ध हेतु हुंकार भरी..जटायु ने धरती का स्पर्श कर प्रण लिया,,"हे वसुन्धरे,,,,अब यदि तुम्हारी पुत्री को साथ ला पाया तो ही जीवित अवस्था मे तुम्हारा स्पर्श करूँ,, अन्यथा मेरी देह सदा तुम्हारी ऋणी रहेगी.."
          किस ओर गया होगा पापी..गिद्ध की उड़ान में एक कमी सदा रही है कि काग की भांति वो तीव्रता से नही उड़ सकता..किन्तु उड़ान में ऊंचाइयों को प्राप्त करने में गिद्ध दक्ष है...ब्रह्मांड में कोई भी जटायु के समान आकाश का स्पर्श नही कर सकता.... वृद्ध व घायल देह से यह कठिन अवश्य प्रतीत होता है,,किन्तु ऊंचाइयों का कोई भी लक्ष्य गिद्ध के लिए असंभव नही..बचपन मे वो सूर्य की परिधि को छूने हेतु सूर्य की कक्षा में तक प्रवेश कर चुका है,,वो सूर्य देव के सारथी अरुण का पुत्र है..वह विष्णु के वाहन,,,महान गरुड़ देव् की कुल परंपरा का ध्वजवाहक है...
                अपने समस्त कौशल,,अपने बल ,,अपने स्वाभिमान का परिचय संसार को देने का आज अंतिम अवसर है...जटायु ने उर्ध्वगामी उड़ान के लिए पंखों को शरीर के निकट खींचा....गिद्ध ने अपने  सर्वोत्तम हुनर का परिचय दिया......हां यहां इतनी ऊंचाई से अब चारों दिशाओं पर दृष्टि पहुंचती है......गिद्ध को दूरदृष्टि हासिल है.....बहुत दूर की वस्तु भी गिद्ध बड़ी आसानी से सहज देख सकता है....नही ,,,,,दूर दूर तक कुछ नही है.......क्या मुझे आने में विलंब हो गया,,,,रावण मेरी पहुंच से दूर चला गया...
              अचानक दृष्टि दक्षिण की ओर टिकती है......दक्षिण में पचास योजन की दूरी पर आकाश में एक बिंदु दिखाई देता है....हां वो रहा कुकर्मी......वो रही सीता.....गिद्ध ने अपने समस्त बल को अपने पंखों पर नियंत्रित किया,,और दक्षिण में गोता खाया...
                तेजी से जटायु रावण की दिशा में बढ़ा... गिद्ध लंबी उड़ान के पक्षी हैं..सहस्त्रों योजन की यात्रा वो बेहिचक कर सकते हैं,,,,किंतु  अन्य पक्षियों की भांति अचानक से गति बढ़ाना ,,गिद्ध के लिए कठिन है..  ..मुख से सफेद फेन निकलने लगा वृद्ध जटायु के....गला सूखने से कंठ भी अवरुद्ध हुआ जाता है....किन्तु तेज,,,, और तेज.....
                          दृष्टि धुँधलने सी लगी है...नही नही आयु दोष के कारण नही...गिद्ध दृष्टि कभी आयु की मोहताज नही रही....अपनी असफलता के भय से निरीह पक्षी की आंखें ,,आंसुओं से लबरेज हैं..जगहंसाई का भय ,,आंसुओं के रूप में जटायु की दृष्टि को बाधित कर रहा है....हालात जब भी नियंत्रण से बाहर जाने लगते हैं,,आंखें सदैव से इसकी सर्वप्रथम सूचक होती हैं..
                               अचानक रावण को अपने सिर पर किसी परछाई का आभास हुआ....जटायु के रूप में लंकेश ने यम को साक्षात अपने निकट पाया....विस्मय से रावण की आंखें फटी रह गईं.....जिसे मृत समझ पीछे छोड़ आया था वो यूं काल का दूत बना सिर पर कैसे खड़ा है,, ये विश्वास से परे है......
                           तीन नाखूनों को अपनी आंख के निकट भीतर  तक धंसता हुआ रावण ने स्पष्ट महसूस किया......सीता यान में बेसुध पड़ी हैं...जटायु अब किसी कीमत पर रावण को आगे बढ़ने नही देगा......यान के बाहरी पंख पर जटायु ने वज्र प्रहार किया.....यान बायीं ओर झुका......जटायु का शरीर निरंतर बहते रक्त के कारण अब कमजोर पड़ने लगा था.....रावण भी निरंतर हो रहे प्रहारों से अब निढाल सा होने लगा था,,,,,शरीर के कई हिस्से मानो गहरे तीरों से बिंधे हों..जटायु यदि अधिक देर तक यूं प्रहार करता रहा,,, तो रावण अथवा यान किसी को भी वह भूमि पर पटकने ही वाला है....ये आभास होते ही रावण ने जटायु को अपने से दूर रखने हेतु निरंतर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी.....एक के बाद एक तीर जटायु के शरीर को बींधते चले गए....अंतिम प्रहार के रूप में जटायु ने अपने गिरते शरीर को यान से टकराने का प्रयास किया........रावण इस वार के लिए तैयार था..तुरंत अपनी तलवार से उसने जटायु के दाहिने पंख को उसके शरीर से अलग कर दिया......जटायु कटे वृक्ष की भांति जमीन पर गिरा.....पृथ्वी को दी अपनी सौगंध की लाज उसने रखी......यान नजरों से ओझल हो गया....... इतिहास में जटायु सदा के लिए अमर हो गया..
                  रामायण में वर्णित पात्रों में जटायु की अंतिम क्रिया हम स्वयं चक्रपाणी के अवतार राम के हाथों होता देखते हैं...जो सौभाग्य पिता होकर भी दशरथ को प्राप्त न हुआ,,,वह सौभाग्य भक्त होकर जटायु महाराज ने सहज ही हासिल किया...बैकुंठ की प्राप्ति जटायु को हुई......भक्तवत्सल प्रभु राम की जय......

शिव....

****** ......  शिव .....*****
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             शिव को समझना उतना ही सरल है,,,जितना मनुष्य का स्वतः ये ज्ञात कर लेना कि जल ही प्यास बुझाने का एकमात्र साधन हैं..जल बिना जीवन नही है..ठीक उसी प्रकार शिव के बिना परिवार व संसार का सुख नही है..
      और अगर आप शिव को रहस्यमयी बनाने पर विश्वास रखते हैं तो शिव को समझना उतना ही दुष्कर है जितना ब्रह्मांड को समझना...
      हजारों लेख इस सावन के पवित्र माह में आपको शिव संबंधी देखने को मिल जाते हैं....अनगिनत श्रद्धालु,,अनगिनत शिवलिंगों में जल अर्पित करते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाने को ही सावन का महात्म्य समझ बैठते हैं... शिव की तस्वीरों से लोगों की प्रोफाइल्स जगमगाने लगती हैं....फिर भी एक रीतापन सा बिखरा हुआ रह जाता है... क्यों...क्योंकि हम शिव से परिचित नही हो पाते...हम उनमे आत्मसात नही हो पाते.....भक्तों की चेष्ठा मात्र ये ज्ञात करने तक सीमित रहती है कि शिव को क्या पसंद है...शिव को क्या चढ़ाना,, अर्पित करना चाहिए,,,,शिव कैसा श्रृंगार करते हैं..कौन से मंत्र शिव को प्रसन्न कर सकते हैं....शिव की इच्छा ,,अनिच्छा तक मनुष्य सीमित कर देता है स्वयं को.....किन्तु शिव का साक्षात्कार नही करता....शिव को नही खोजता,,, शिव को नही तलाशता,,,,ताकि स्वयं उनकी वाणी से ही उनकी वास्तविक इच्छा अनिच्छा ज्ञात कर पाता...जिस दिन ऐसा कर पाए ,,तब देखिये,, हर मास श्रावण मास है,प्रत्येक दिन सोमवार है,,,,प्रत्येक रात्रि शिव रात्रि है...प्रत्येक बूंद गंगाजल है...
            शिव को मानिए मत,,शिव मानने की प्रक्रिया नही हैं....मानेंगे तो सदा उस भाव मे देख पाएंगे ,,जिसमे दूसरे ने देखा...,जो भाव  पुस्तकों में लिखा पाएंगे...दूसरे की दृष्टि है ,, दूसरे का विजन है..... दूसरे के विचारों के शिव,,,दूसरे के शिव..आपके अपने नही...अतः शिव को मानिए मत.....अपितु शिव को जानिये...आपके शिव को जानिये...मानने न मानने का प्रश्न स्वयं लोप हो जाएगा...
                   शव ही प्राण का विलोम है....प्राण शिव है,,,प्राण नही तो शव है,,,स्पंदन हीन है,,उद्देश्यहीन है..निर्रथक है..उत्तरदायित्व की एक मात्रा "इ" को लगा लेने से शव ,,शिव का रूप ले लेता है..शिव उत्तरदायित्व की परिभाषा हैं...शिव जिम्मेदारी का एहसास हैं...शिव अपनी आकांक्षाओं,, इच्छाओं का हनन कर ,,,,परिवार हेतु,,समाज हेतु ,,मानवता हेतु ,,,,विषपान करने का नाम है....शिव नीलकंठ हैं...शिव हैं तो योगी हैं,,,अन्यथा भोगी हैं....शिव स्वयं को होम कर परिवार का पालन करने का नाम है,,,,
          शिव वो संबल है जो आपके बुरे वक्त में आपका सारा बोझ, बिना किसी लालसा के,,बग़ैर किसी उलाहना के,,,बिना अपने स्थान-आयु-सामर्थ्य का भान किये ,,अपने कांधे पर लेकर आपको भार मुक्त कर देते हैं...वे स्वयं विषपान कर ,,आपको अमृत का प्याला थमा देते हैं...वे स्वयं वाघाम्बर ओढ़ कर ,,,राख का लेपन करके ही संतुष्ट हैं,,,,संसार की संपदा का भोग आप कीजिये,,,ये शिव आपके लिए त्याग दिए हैं..आप अपने गले मे स्वर्णजड़ित आभूषण धारण कीजिये...वे जिम्मेदारियों के बासुकी को अलंकार स्वेच्छा से बनाए बैठे हैं......
                       कभी पिता के गले के नीले रंग पर ध्यान गया है आपका.....नही ना....कभी उनमे अपने शिव तलाशने का प्रयास किया है आपने.....नहीं ना........कभी याद है कि आपकी नई कमीज खरीदने के लिए ,,स्वयं फटे पुराने वस्त्र वो पहनते रहे हैं.... आपको ताजी रोटी खाने को मिले ये सोचकर बिना किसी शिकायत के रात की बासी रोटी खाते देखा है आपने....नही न......
               कभी आपकी असफलता पर उनके रौद्र रूप के पीछे छिपे उनके डर को देखा है आपने....आपके असुरक्षित भविष्य का डर,,,,आपकी जगहंसाई का डर,,,आपके संघर्ष का डर...नही ना...
                कभी तुलना कीजिये शिव की अपने पिता से....आप देखेंगे कि जिस रूप को,,जिस आकृति को पाने के लिए आप बड़े बड़े स्वांग रचाये फिर रहे हैं,,,वो आपके ही सामने कदम कदम पर आपके साथ चल रहा है.. ,,,,प्रत्येक पल विष का पान आपके व अपने परिवार के रक्षार्थ कर रहा है....वो अपना सर्वस्व आपके हेतु त्याग कर चुका है....निराशा के पश्चात आशा ही जीवन का आधार है,,,पतझड़ के बाद बसंत ही नवजीवन का संदेश है,,,मृत्यु मिथ्या है ,,,मृत्यु के भय को काट जो जीवन के प्रति आस्था प्रज्वलित करे ,,वो शिव है...अगर अंधकार ही व्याप्त हो,,तो प्रकाश का क्या महत्व रह गया....कीमती तो प्रकाश है....मृत्यु पाखंड है ,,,,मात्र वस्त्र का बदलना है,,आत्मा शाश्वत है,,एकमात्र सत्य है,,,,जीवन ही ईश्वर के होने का प्रमाण है.....मुझे अपने जीवन से बहुत प्यार है ,,,ये जीवन न होता,,,तो मुझे माता -पिता,,भाई बहन,,मित्रों ,,पाठकों का स्नेह न मिलता.....जीवन न होता तो मैं भगवती की स्तुति नही कर पाता...जीवन न होता तो मैं प्रकृति की रचनाओं,,सुंदर पंछियों,, पहाड़ों ,,मंदिरों के दर्शन न कर पाता,,,,जीवन न होता तो युवावस्था के प्रथम प्रेम की याद में जो अनार मेरे मन मे फूटते हैं,,उनके अग्निप्रभाव में जो जलन रूपी शांति मुझे मिलती है,,वो कहाँ से आती....जीवन न होता तो मेरी जीवन संगिनी और भगवती का अवतार दो पुत्रियां मुझे कहाँ से मिलती...ये मनुष्य जीवन पाने के लिए देवता भी तरसते हैं ....मृत्यु मुझे परास्त नही कर  सकती...क्योंकि मैं जानता हूँ उसके बाद पुनर्जन्म है...उस अंधकार के बाद वापस शिव रूपी प्रकाश है जीवन के रूप में...तभी कहा गया है,,भला मृत्यु से क्या भय,,,,क्योंकि वो तो क्षणिक है...जीवन निरंतर बहता जल है...निरंतर यात्रा है....अब ये हमारे ऊपर है कि मिथ्या मृत्यु को ध्यान में रखकर हम घुट घुट कर जियें,,या ये सत्य जान लें कि मृत्यु एक क्षणिक आभास है...जीवन पुनः हमे अपने आगोश में लेने को तत्पर है...जीवन ही शिव है,,,अतः शिव ही सत्य है..जीवन देने वाला पिता ही शिव है,,तभी महामृत्युंजय  हैं..मुझे अपने जीवन से बहुत स्नेह है बन्धु,,,मैं जानता हूँ शिव बार बार अपना अंश देकर मुझे हर बार नए क्लेवर में उत्पन करेंगे ,,इस संसार की सुंदरता देखने के लिए,,इसका रसास्वादन करने के लिए,,,,इसी कारण मेरे मन ने सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में भी मुझे निराश नही होने दिया कभी....क्योंकि जानता हूँ हर अंधकार के आगे प्रकाश है,,,हर असफलता के आगे सफलता है आलिंगन के लिए....हर मृत्यु के पश्चात शिव हैं नया जीवन देने के लिए....मैं हारता नही,,क्योंकि मैं जीवन हूँ...मैं ही शिव हूँ ,,,,,शिवोह्म.. शिवोह्म..
                       ये पिता को उसका आसन,,उसका मान देने का उपयुक्त समय है.....ये पिता को महसूस कराने का पर्व है कि आप ही मेरे शिव हैं ,,,आप ही की रचना हूँ मैं,,,आप ही पालक हैं मेरे.....आप ही रचियता हैं मेरे........मुझे भी शिव बनना है.....आपके बाद आपके रचनाक्रम का निर्वाह करना है.....आपकी ही भांति परिवार का पोषण करना है......आपके ही अंश की प्रकृति हूँ मैं......आप ही  शिव हैं,,और मैं शिव बनने की प्रक्रिया में हूँ,,आपके पश्चात मैं स्वयं शिव हूँ.........शिवोह्म.....शिवोह्म ....

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

Eklavya....The great warrior

"Eklavya – ‘The Great Warrior’ and the Story of Greatest Betrayal in Indian history"
(मेरे प्रस्तुत लेख को अंग्रेजी में ट्रांसलेट करने का श्रेय मेरे मित्र व क्लाइंट अमेरिका निवासी डॉक्टर संदीप कॉल जी को जाता है)
      Written some 5000 years ago, Mahabharata, has time and again proved to be the greatest epic, not only of India, but of the whole world. Its impact has been felt in over the ages and in all parts of the world. ‘Gita’, the ocean of knowledge, emanates from it as well. During the time of Mahabharata, a very important background information is overlooked while revisiting it during the present times. Arjuna, considered to be the ‘Greatest Warrior (Archer)’ during that period, was groomed to such greatness by two Gurus. It did not happen by accident. The first person directly responsible for this was Kripacharya, the royal teacher of the Kauravas and Pandavas appointed by Bheeshma and the second was Dronacharya, which weapon master of Hastinapur court. Dronacharya had trained under the great Parashurāma himself, thus ensuring the divine greatness of his expertise having trained in all weaponry, conventional and divine. Kripacharya by recommending the latter, ensured Arjuna became the ‘Greatest Warrior (Archer)’. To his credit, Arjuna, through his hard work and dedication, pleased Dronacharya to such an extent that it exceeded the love of his own son, Ashwatthama. Out of this love, he taught him not only to become master archer but also gave him the power to invoke the divine super-weapons such as ‘The Brahmastra’. Such deep was his love for Arjuna that even Ashwatthama was not taught the complete procedure of invoking ‘The Brahmastra’ (He could not recall this divine weapon once it left his bow).
During the present times, such stories do crop up in modern culture such as films and dramas. One such example is the Hollywood movie Star Wars – New Hope (1977), which happened to be the first installment of hugely successful movie series. In it the main protagonist and hero, Luke Skywalker, rose from a very humble beginnings to become the ‘Greatest Jedi Warrior’ the galaxy had ever known. His gurus (mentors), Obi-Wan Kenobi, and Grand Master, Yoda, ensured that this tag ‘Greatest Warrior’ was bestowed on Luke Skywalker through rigorous training. At first sight, it might look as an unnecessary comparison to Vedic Epic like Mahabharata here but such stories strike at the heart of people’s psyche where heroes are celebrated down the ages, where subsequent generation remember them. And if such explanation does not satisfy the critics of this unnecessary comparison, consider the fact Luke Skywalker’s father, Darth Vader, went down the evil path to become a main villain in this film series. It explains the power of a ‘Guru’ (or his absence) as a person guiding and nurturing the future of his disciple.
But then Mahabharata is an unusual epic. Perhaps this is where the comparison with contemporary folklore or similar other epics end. There is a dark secret associated with Arjuna being bestowed the title of ‘Greatest Warrior’. If one digs deep enough, innumerable characters, innumerable faces, countless seasons and innumerable stories can be had from Mahabharata. As an avid reader, a person could be exposed to and remember each and every character from different sources and documents. But today I am not willing to talk about ‘Yogashwar’ Krishna or shower praises on ‘Mahabali’ Bheem, neither the aim is to put ‘Gāṇḍīvadhārī’ Arjuna as the object of this article nor am I willing to talk about ‘Suryaputra’ Karna. I am interested in talking about that person who is a forgotten hero, possibly faced the greatest betrayal of history, whose place in history was treated like a stone that need to be kicked around. His painful tears and the pain emanating from his heart was overlooked because of his ‘low caste’ birth. Even the savior of the religion, Chakrapāṇi Vasudeva (Lord Krishna), did not oppress this injustice and nature, for good or for worse, has hidden this betrayal from plain sight of everyone. Yes friends, today the pen is to sing praises about the story of the same legendary person, who without any blessing, without being the son of a God and without the help of any divine weapon, was indeed the best archer of the world, the best disciple there was, and the performer of greatest sacrifice that anyone could ask for. Yes, today the pen is interested in singing great praises for Veer Eklavya, praises for his knowledge, praises for his immense capability that was stinging like a thorn in the eyes of his contemporaries.
During one of his training sessions he put twelve arrows in the mouth of a dog to stop it from barking which was creating distraction for him during those practice sessions. He dealt it with such a precision that not a single drop of blood came out of that dog’s mouth. In the science of archery, this was a perfect example of ‘stopping a living being from having a preoccupation with empty talk’. In the entire universe at that time, there were a lot of people who had the ability to perform such a feat, but only Eklavya’s ability far out shone that of others. In fact it was such an impossible feat that no ordinary human with all the knowledge of archery could achieve it. This is based, as we shall see, on the subsequent testimony of Dronacharya himself, as he witnessed Eklavya’s remarkable feat, which lead him to believe that such a person was no ordinary person.
News reached the royal palace and curiosity among the Pandava princes took center stage. “Who is this person who is a master of archery?”, “Who is this near perfect archer?” These were the sort of questions that were coming in their mind. Led by their Guru Dronacharya, the Pandava princes reached the forest where Eklavya was residing and practicing archery. To their surprise they found an ordinary ‘Bhil’ (low caste) boy was practicing with a very ordinary wooden bow. In front of him was a bunch of arrows and barking dog’s mouth full of arrows bore testimony of his finesse in the art of archery. Dronacharya could not believe his own eyes. This could not have been some kind of deceptive magic as that deception in the boy’s capabilities could be instantly recognized by him. Perhaps it could be his own guru, the great Parashurāma himself, or some divine person/Devata in the garb of human being. But deep in his heart Dronacharya knew that he could instantly recognize his own guru, the great Parashurāma. That was not a possibility. The option of this boy being a divine person could easily be ruled out because Dronacharya knew the caliber of all the contemporary divine gurus, as he himself was one of the masters of divine weaponry. So the question remained: “Who is this boy?”
He asked “Who is your Guru? (Nasataṁ Pratijagrāha Naiṣādiriti Chintayan…..Shiṣhyaṁ Dhānuṣadhārmajña)”. “Who is it that has made you such a versatile person in archery?” To this Eklavya replied, “I am your disciple, Gurudev, and you are my adorable lord”. Bowing his head in great adulation, he pointed towards the nearby stone statue of Dronacharya. Finding his Guru in front of him made Eklavya ecstatic and he could not help the feeling of being at the feet of Rudra (Lord Shiva) himself. What could be a greater luck or honor for him to have impressed his Guru with his knowledge. For him he had accomplished the ‘honor of a disciple’ in the eyes of the world. He had indeed proved worthy of being the disciple of the great Guru. His mind was crisscrossed with a lot of these thoughts while paying obeisance to Dronacharya.
As opposed to this, Dronacharya was thinking that for Arjuna to reach such a finesse and an advanced level in the art of archery would take time and a lot of practice. But this ‘Bhil’ (low caste) boy had achieved such a rare feat that Dronacharya was amazed to a point that it became a wakeup call for him. His efforts were directed in making Arjuna the ‘Greatest Warrior (Archer)’ but the way this ‘Bhil’ boy was handling the bow, let alone shooting the arrows with such precision, bore testimony to the fact that he was miles ahead of his ‘chosen one’ disciple. He had indeed poured water on all his efforts in making Arjuna the master Archer. “Tamabravīt Tvayāṅguṣṭhō Dakṣiṇō Dīyatāmiti (I want my Dakshina)”. With these insulting words Dronacharya addressed Eklavya, shrewdness in his words being quite perceptible. It is true that he had learned the art of archery by installing the statue of Dronacharya in front of him, but there is no doubt he had a natural, inborn talent which propelled him to such heights that he could achieve such superlative finesse in archery with a simple bow. A master archer would require a whole set of sophisticated weaponry to accomplish this feat. For the Kuru princes, apart from their extraordinary archery facilities, there was a constant roving presence of the master teacher, Dronacharya. It was amply clear that the entire pride of son of Pāṇḍū, Arjuna being greatest archer, was going to go down in veritable drain of tears. Out of the corner of his eye Arjuna was looking suspiciously at Dronacharya as if asking him what happened to the promise Dronacharya had made that would ensure he, Arjuna, would be the greastest living archer in the Aryavrata (country). Here is a ‘jungle boy’ who is directly challenging that stand. Furious with jealousy and anger Arjuna appeared as though he would be consumed in those flames and Dronacharya very well knew his future lay waste as a result of this jealousy. Nobody would take his word, the word of divine Guru, as unshakable truth.
But then the world favors the strong. Or so the saying goes. The weak and coward get obliterated just as a strong draft of air extinguishes a flickering flame of a candle. What can a small ‘Bhil’ jungle boy do in presence of people with illustrious lineage, eminent caste, well respected royalty? His claim to fame was in jeopardy as soon as the Kuru princes took notice of his extraordinary talent. It was quite clear that Eklavya had no right to be extraordinary even though truth suggested otherwise. If one compares Eklavya as that candle then Dronacharya’s subsequent actions were like the strong draft of air (in fact Dronacharya ensured continuation of the tradition of his own guru, great Parashurāma) which blew hard enough to extinguish the flame. It seemed as though the deity of the jungle, Vanadevi, cried out in despair. In the heavens, Lord Shiva, also let out a drop of tear seeing such great injustice, such great wrongdoing. At the spur of that moment, the lord forebode the demise of ‘House of Kurus’ in the near future. History bears testament to the fact that the entire royal lineages, dynasties and entire nations have been wiped out when righteous and capable people have been sidestepped by a few favored persons.
Jyōtiṣhaśāṣtra is witness to the fact that the natives born in the constellation of ‘Uttarafalguni’ have always succeeded in fulfilling their wishes with their ‘feminine’ stubbornness. Arjuna, who himself was born in the constellation of ‘Uttarafalguni’, has proved this over once again. The jist is that with one’s ego and stubbornness, a person can retain the tag of ‘Greatest Warrior (Archer)’.
“Give me your thumb of your right hand as Guru Dakshina”. This statement has forever remained as a blemish on Dronacharya’s character. He was bound by his own pledge that he would only teach princes of Kuru lineage. He had once broken a pledge to King Dhrupada. As a result of that he had to feed his own son, Ashwatthama, soup of rice flour labelling it as milk. The mere thought of breaking another pledge would send shiver down his spine. He knew he could not displease Bheeshma at any cost. Destiny was literally sealed for Eklavya at that moment. He had to be pushed back and brought down. The dakshina of right thumb would ensure this. “Tamabravīt Tvayāṅguṣṭhō Dakṣiṇō Dīyatāmiti (I want the thumb of your right hand as my Dakshina, i.e charity)”. It was impossible to comply with such charity without the thought of the consequence gleaming in one’s eyes. Eklavya’s future was pegged on it. But it is said that Eklavya acted without a hitch, which was even faster than what the master philanthropist, Daanveer Karna, achieved when he donated his Kavachha and Kundalas to Devraja Indra. Within minutes the thumb of right hand was at the feet of Dronacharya. A feat that needed a new definition here because there is no other glaring example in the history of mankind at the speed of its compliance. The entire universe cried at this injustice. Even Ashwatthama, who was old enough to understand the greatness of the act, felt ashamed in his heart. He knew his own father, Dronacharya, loved Arjuna more than he himself. That fact had not escaped anyone but that love had transcended to a new level. It made him cringe and detest Arjuna, as he himself was the son of the illustrious guru. He was well aware of the grueling process that ensured the making of the great warrior, that too without any help or without any suitable facility available in Eklavya’s case. There was no divine boon, only self-practice of the individual that had ensured Eklavya mastery at the art of archery. But when the time came to admit who was his guru, he with all his simplicity, put his entire talent and natural ability at the feet of his father, Dronacharya. This selfless act even surprised the gods and forever etched Eklavya’s name into annals of history. But then the world favors the strong every time. This, without a doubt, will be repeated in the future as well and people like Eklavya will find no value in this world for their inborn talents. The weak will always be brought down. It has happened now and will keep happening in the future as well.
History only remembers the winners. There is only a scant mention of Eklavya in other works. Legend has it, that one day Arjuna and couple of his friends surreptitiously went to the forest where he saw Eklavya practicing the art of archery with only four fingers of his hand. Like a kid who is learning to use the bow for the first time, the arrows which shot out of his bow dropped only a few yards in front of him. Arjuna smirked and felt very satisfied with what he saw and returned to the palace subsequently. Indeed, what he saw that day were the tears in the eyes of Eklavya, but what he unable to see was the yearning to excel in adverse of the circumstances.
Eklavya does get mentioned in Vishnu Purana and Harivansh Purana. He is supposed to the king of Nishad lineage, the jungle people. He had supposedly led an attack on the Kingdom of Mathura, ruled by Jarasandha, and ensured complete rout of his Yadava army. During the course of the battle, when there was utter confusion in the battlefield, Lord Krishna himself was from Yadava lineage, saw that the part of the battlefield which was at the center of the rout had a ‘Great Warrior’ riding a chariot. But the person just had four fingers on his right hand. Such great was his finesse that even a divine being as Lord Krishna himself was dumbfounded. With his archery talent he was able to hold back his rivals generals and with each pull of the bow, numerous arrows would fly off to pierce their targets without fail. Lord Krishna could have easily mistake this person to be Kunti Putra, Arjuna, since he wielded his bow with such deftness. But four fingers probably gave up his identity and spelt doom for this person who eventually was killed in the battlefield by Lord Krishna himself. This gives the clearest proof that even though Eklavya donated his right thumb, he still attained his former mastery at the art of archery. It could be debated, subsequent to his thumb donation, he might not have attained the level of mastery in the art but the way he wiped out his rival Yadava generals in the battlefield leaves no room for his grip at the art of archery.
After the end of the great war of Mahabharata, all the great surviving people started to relate their valorous stories. It was then Lord Krishna revealed the truth to Arjuna. It was his love for him that ensured the tag of ‘Greatest Warrior’ forever was stuck to his name. With his divine powers he ensured the ultimate death of his guru, Dronacharya, weakened Karna and without Arjuna’s knowledge killed Eklavya. This is the ultimate tribute to this great warrior. Even today the ‘Bhil’ tribal people in Madhya Pradesh and Chattisgarh continue to fight for their right with bow and arrows.
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The Original Hindi version of this article appears here:
www.astrologerindehradun.com
Rightsunshineforu.blogspot.com
Eklavya – ‘The Great Warrior’ and the Story of Greatest Betrayal in Indian History
(This is my favorite article and is presented again here)
Written some 5000 years ago, Mahabharata, has time and again proved to be the greatest epic, not only of India, but of the whole world. Its impact has been felt in over the ages and in all parts of the world. ‘Gita’, the ocean of knowledge, emanates from it as well. During the time of Mahabharata, a very important background information is overlooked while revisiting it during the present times. Arjuna, considered to be the ‘Greatest Warrior (Archer)’ during that period, was groomed to such greatness by two Gurus. It did not happen by accident. The first person directly responsible for this was Kripacharya, the royal teacher of the Kauravas and Pandavas appointed by Bheeshma and the second was Dronacharya, which weapon master of Hastinapur court. Dronacharya had trained under the great Parashurāma himself, thus ensuring the divine greatness of his expertise having trained in all weaponry, conventional and divine. Kripacharya by recommending the latter, ensured Arjuna became the ‘Greatest Warrior (Archer)’. To his credit, Arjuna, through his hard work and dedication, pleased Dronacharya to such an extent that it exceeded the love of his own son, Ashwatthama. Out of this love, he taught him not only to become master archer but also gave him the power to invoke the divine super-weapons such as ‘The Brahmastra’. Such deep was his love for Arjuna that even Ashwatthama was not taught the complete procedure of invoking ‘The Brahmastra’ (He could not recall this divine weapon once it left his bow).
During the present times, such stories do crop up in modern culture such as films and dramas. One such example is the Hollywood movie Star Wars – New Hope (1977), which happened to be the first installment of hugely successful movie series. In it the main protagonist and hero, Luke Skywalker, rose from a very humble beginnings to become the ‘Greatest Jedi Warrior’ the galaxy had ever known. His gurus (mentors), Obi-Wan Kenobi, and Grand Master, Yoda, ensured that this tag ‘Greatest Warrior’ was bestowed on Luke Skywalker through rigorous training. At first sight, it might look as an unnecessary comparison to Vedic Epic like Mahabharata here but such stories strike at the heart of people’s psyche where heroes are celebrated down the ages, where subsequent generation remember them. And if such explanation does not satisfy the critics of this unnecessary comparison, consider the fact Luke Skywalker’s father, Darth Vader, went down the evil path to become a main villain in this film series. It explains the power of a ‘Guru’ (or his absence) as a person guiding and nurturing the future of his disciple.
But then Mahabharata is an unusual epic. Perhaps this is where the comparison with contemporary folklore or similar other epics end. There is a dark secret associated with Arjuna being bestowed the title of ‘Greatest Warrior’. If one digs deep enough, innumerable characters, innumerable faces, countless seasons and innumerable stories can be had from Mahabharata. As an avid reader, a person could be exposed to and remember each and every character from different sources and documents. But today I am not willing to talk about ‘Yogashwar’ Krishna or shower praises on ‘Mahabali’ Bheem, neither the aim is to put ‘Gāṇḍīvadhārī’ Arjuna as the object of this article nor am I willing to talk about ‘Suryaputra’ Karna. I am interested in talking about that person who is a forgotten hero, possibly faced the greatest betrayal of history, whose place in history was treated like a stone that need to be kicked around. His painful tears and the pain emanating from his heart was overlooked because of his ‘low caste’ birth. Even the savior of the religion, Chakrapāṇi Vasudeva (Lord Krishna), did not oppress this injustice and nature, for good or for worse, has hidden this betrayal from plain sight of everyone. Yes friends, today the pen is to sing praises about the story of the same legendary person, who without any blessing, without being the son of a God and without the help of any divine weapon, was indeed the best archer of the world, the best disciple there was, and the performer of greatest sacrifice that anyone could ask for. Yes, today the pen is interested in singing great praises for Veer Eklavya, praises for his knowledge, praises for his immense capability that was stinging like a thorn in the eyes of his contemporaries.
During one of his training sessions he put twelve arrows in the mouth of a dog to stop it from barking which was creating distraction for him during those practice sessions. He dealt it with such a precision that not a single drop of blood came out of that dog’s mouth. In the science of archery, this was a perfect example of ‘stopping a living being from having a preoccupation with empty talk’. In the entire universe at that time, there were a lot of people who had the ability to perform such a feat, but only Eklavya’s ability far out shone that of others. In fact it was such an impossible feat that no ordinary human with all the knowledge of archery could achieve it. This is based, as we shall see, on the subsequent testimony of Dronacharya himself, as he witnessed Eklavya’s remarkable feat, which lead him to believe that such a person was no ordinary person.
News reached the royal palace and curiosity among the Pandava princes took center stage. “Who is this person who is a master of archery?”, “Who is this near perfect archer?” These were the sort of questions that were coming in their mind. Led by their Guru Dronacharya, the Pandava princes reached the forest where Eklavya was residing and practicing archery. To their surprise they found an ordinary ‘Bhil’ (low caste) boy was practicing with a very ordinary wooden bow. In front of him was a bunch of arrows and barking dog’s mouth full of arrows bore testimony of his finesse in the art of archery. Dronacharya could not believe his own eyes. This could not have been some kind of deceptive magic as that deception in the boy’s capabilities could be instantly recognized by him. Perhaps it could be his own guru, the great Parashurāma himself, or some divine person/Devata in the garb of human being. But deep in his heart Dronacharya knew that he could instantly recognize his own guru, the great Parashurāma. That was not a possibility. The option of this boy being a divine person could easily be ruled out because Dronacharya knew the caliber of all the contemporary divine gurus, as he himself was one of the masters of divine weaponry. So the question remained: “Who is this boy?”
He asked “Who is your Guru? (Nasataṁ Pratijagrāha Naiṣādiriti Chintayan…..Shiṣhyaṁ Dhānuṣadhārmajña)”. “Who is it that has made you such a versatile person in archery?” To this Eklavya replied, “I am your disciple, Gurudev, and you are my adorable lord”. Bowing his head in great adulation, he pointed towards the nearby stone statue of Dronacharya. Finding his Guru in front of him made Eklavya ecstatic and he could not help the feeling of being at the feet of Rudra (Lord Shiva) himself. What could be a greater luck or honor for him to have impressed his Guru with his knowledge. For him he had accomplished the ‘honor of a disciple’ in the eyes of the world. He had indeed proved worthy of being the disciple of the great Guru. His mind was crisscrossed with a lot of these thoughts while paying obeisance to Dronacharya.
As opposed to this, Dronacharya was thinking that for Arjuna to reach such a finesse and an advanced level in the art of archery would take time and a lot of practice. But this ‘Bhil’ (low caste) boy had achieved such a rare feat that Dronacharya was amazed to a point that it became a wakeup call for him. His efforts were directed in making Arjuna the ‘Greatest Warrior (Archer)’ but the way this ‘Bhil’ boy was handling the bow, let alone shooting the arrows with such precision, bore testimony to the fact that he was miles ahead of his ‘chosen one’ disciple. He had indeed poured water on all his efforts in making Arjuna the master Archer. “Tamabravīt Tvayāṅguṣṭhō Dakṣiṇō Dīyatāmiti (I want my Dakshina)”. With these insulting words Dronacharya addressed Eklavya, shrewdness in his words being quite perceptible. It is true that he had learned the art of archery by installing the statue of Dronacharya in front of him, but there is no doubt he had a natural, inborn talent which propelled him to such heights that he could achieve such superlative finesse in archery with a simple bow. A master archer would require a whole set of sophisticated weaponry to accomplish this feat. For the Kuru princes, apart from their extraordinary archery facilities, there was a constant roving presence of the master teacher, Dronacharya. It was amply clear that the entire pride of son of Pāṇḍū, Arjuna being greatest archer, was going to go down in veritable drain of tears. Out of the corner of his eye Arjuna was looking suspiciously at Dronacharya as if asking him what happened to the promise Dronacharya had made that would ensure he, Arjuna, would be the greastest living archer in the Aryavrata (country). Here is a ‘jungle boy’ who is directly challenging that stand. Furious with jealousy and anger Arjuna appeared as though he would be consumed in those flames and Dronacharya very well knew his future lay waste as a result of this jealousy. Nobody would take his word, the word of divine Guru, as unshakable truth.
But then the world favors the strong. Or so the saying goes. The weak and coward get obliterated just as a strong draft of air extinguishes a flickering flame of a candle. What can a small ‘Bhil’ jungle boy do in presence of people with illustrious lineage, eminent caste, well respected royalty? His claim to fame was in jeopardy as soon as the Kuru princes took notice of his extraordinary talent. It was quite clear that Eklavya had no right to be extraordinary even though truth suggested otherwise. If one compares Eklavya as that candle then Dronacharya’s subsequent actions were like the strong draft of air (in fact Dronacharya ensured continuation of the tradition of his own guru, great Parashurāma) which blew hard enough to extinguish the flame. It seemed as though the deity of the jungle, Vanadevi, cried out in despair. In the heavens, Lord Shiva, also let out a drop of tear seeing such great injustice, such great wrongdoing. At the spur of that moment, the lord forebode the demise of ‘House of Kurus’ in the near future. History bears testament to the fact that the entire royal lineages, dynasties and entire nations have been wiped out when righteous and capable people have been sidestepped by a few favored persons.
Jyōtiṣhaśāṣtra is witness to the fact that the natives born in the constellation of ‘Uttarafalguni’ have always succeeded in fulfilling their wishes with their ‘feminine’ stubbornness. Arjuna, who himself was born in the constellation of ‘Uttarafalguni’, has proved this over once again. The jist is that with one’s ego and stubbornness, a person can retain the tag of ‘Greatest Warrior (Archer)’.
“Give me your thumb of your right hand as Guru Dakshina”. This statement has forever remained as a blemish on Dronacharya’s character. He was bound by his own pledge that he would only teach princes of Kuru lineage. He had once broken a pledge to King Dhrupada. As a result of that he had to feed his own son, Ashwatthama, soup of rice flour labelling it as milk. The mere thought of breaking another pledge would send shiver down his spine. He knew he could not displease Bheeshma at any cost. Destiny was literally sealed for Eklavya at that moment. He had to be pushed back and brought down. The dakshina of right thumb would ensure this. “Tamabravīt Tvayāṅguṣṭhō Dakṣiṇō Dīyatāmiti (I want the thumb of your right hand as my Dakshina, i.e charity)”. It was impossible to comply with such charity without the thought of the consequence gleaming in one’s eyes. Eklavya’s future was pegged on it. But it is said that Eklavya acted without a hitch, which was even faster than what the master philanthropist, Daanveer Karna, achieved when he donated his Kavachha and Kundalas to Devraja Indra. Within minutes the thumb of right hand was at the feet of Dronacharya. A feat that needed a new definition here because there is no other glaring example in the history of mankind at the speed of its compliance. The entire universe cried at this injustice. Even Ashwatthama, who was old enough to understand the greatness of the act, felt ashamed in his heart. He knew his own father, Dronacharya, loved Arjuna more than he himself. That fact had not escaped anyone but that love had transcended to a new level. It made him cringe and detest Arjuna, as he himself was the son of the illustrious guru. He was well aware of the grueling process that ensured the making of the great warrior, that too without any help or without any suitable facility available in Eklavya’s case. There was no divine boon, only self-practice of the individual that had ensured Eklavya mastery at the art of archery. But when the time came to admit who was his guru, he with all his simplicity, put his entire talent and natural ability at the feet of his father, Dronacharya. This selfless act even surprised the gods and forever etched Eklavya’s name into annals of history. But then the world favors the strong every time. This, without a doubt, will be repeated in the future as well and people like Eklavya will find no value in this world for their inborn talents. The weak will always be brought down. It has happened now and will keep happening in the future as well.
History only remembers the winners. There is only a scant mention of Eklavya in other works. Legend has it, that one day Arjuna and couple of his friends surreptitiously went to the forest where he saw Eklavya practicing the art of archery with only four fingers of his hand. Like a kid who is learning to use the bow for the first time, the arrows which shot out of his bow dropped only a few yards in front of him. Arjuna smirked and felt very satisfied with what he saw and returned to the palace subsequently. Indeed, what he saw that day were the tears in the eyes of Eklavya, but what he unable to see was the yearning to excel in adverse of the circumstances.
Eklavya does get mentioned in Vishnu Purana and Harivansh Purana. He is supposed to the king of Nishad lineage, the jungle people. He had supposedly led an attack on the Kingdom of Mathura, ruled by Jarasandha, and ensured complete rout of his Yadava army. During the course of the battle, when there was utter confusion in the battlefield, Lord Krishna himself was from Yadava lineage, saw that the part of the battlefield which was at the center of the rout had a ‘Great Warrior’ riding a chariot. But the person just had four fingers on his right hand. Such great was his finesse that even a divine being as Lord Krishna himself was dumbfounded. With his archery talent he was able to hold back his rivals generals and with each pull of the bow, numerous arrows would fly off to pierce their targets without fail. Lord Krishna could have easily mistake this person to be Kunti Putra, Arjuna, since he wielded his bow with such deftness. But four fingers probably gave up his identity and spelt doom for this person who eventually was killed in the battlefield by Lord Krishna himself. This gives the clearest proof that even though Eklavya donated his right thumb, he still attained his former mastery at the art of archery. It could be debated, subsequent to his thumb donation, he might not have attained the level of mastery in the art but the way he wiped out his rival Yadava generals in the battlefield leaves no room for his grip at the art of archery.
After the end of the great war of Mahabharata, all the great surviving people started to relate their valorous stories. It was then Lord Krishna revealed the truth to Arjuna. It was his love for him that ensured the tag of ‘Greatest Warrior’ forever was stuck to his name. With his divine powers he ensured the ultimate death of his guru, Dronacharya, weakened Karna and without Arjuna’s knowledge killed Eklavya. This is the ultimate tribute to this great warrior. Even today the ‘Bhil’ tribal people in Madhya Pradesh and Chattisgarh continue to fight for their right with bow and arrows.
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