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रविवार, 27 मई 2018

सीता की अग्नि परीक्षा

******* सीता की अग्निपरीक्षा*****
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                  हनुमान की आंखें मानो उस समुद्र को अपने भीतर समेट बैठी हैं,,जिस समुद्र का सीना लांघ माँ सीता के सर्वप्रथम दर्शनो का सौभाग्य हनुमान ने पाया था,,,वो समुद्र आज हनुमान के नियंत्रण से बाहर हो,,अश्रु के रूप में विद्रोह करने पर उतारू है..
                  विभीषण,,सुग्रीव,,अंगद,,,जामवंत,,मंदोदरी आदि सभी हतप्रद हैं.....राम अचानक ये कैसा आदेश दे बैठे हैं ....राम को जिसने भी निकट से जाना है,,जिसने उनके व्यक्तित्व की गहराई को बिना किसी तर्क वितर्क के आत्मसात किया है,,वो हर भक्त जानता है कि राम ने कभी धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण नही किया है....अंतर्मुखी स्वभाव राम का अवश्य है,,किन्तु अपने सिद्धांतों पर उन्हें किसी प्रकार का संशय नही है....ब्रह्मांड अपने नियम से विरुद्ध चल सकता है,,सूर्य की गणनाओं में भेद हो सकता है,,अग्नि अपना स्वभाव त्याग सकती है,,चंद्र अपने सिद्धांतों को भूलकर लक्ष्यहीन हो सकता है,,किन्तु राम के मुखारवृन्द से निकला  वाक्य,,कदापि धर्म विरुद्ध नही हो सकता.....नही कदापि नही...राम का पर्यायवाची ही धर्म का श्रेष्ठ आचरण है...राम हैं तो धर्म है....राम धर्म को धारण नही करते,अपितु धर्म राम को धारण करता है....अतः चूक होने की तो संभावना ही नही....
                 बचपन मे अन्य बहुत से भक्तजनों की मानिंद जब राम द्वारा भगवती सीता को अग्नि परीक्षा का आदेश मिलता है,,तो मेरा हृदय  अपनी गति का उल्लंघन करने लगता था...नही नही,,तुम ये आदेश कैसे दे सकते हो प्रभु.....तुम केकैयी के एक आदेश पर ,,अयोध्या के राजसिंहासन को ठोकर मार सकते हो,,,तुम सबरी के जूठे बेर सआनंद खा लेते हो,,,तुम माँ अहिल्या के अधिकार के लिए इंद्र की सत्ता को चुनौती देने का साहस रखते हो..तुम सीता के लिए रूपवती शूपर्णखा को ठुकरा सकते हो.....तुम माँ सीता की अग्नि परीक्षा की बात भी भला हृदय में कैसे ला सकते हो..कहीं लेखनी में तो ही त्रुटि नही हो गई लेखक के....राम ऐसा नही कर सकते..और मेरे राम तो स्वप्न में भी ऐसी अनहोनी नही सोच सकते.... पर तुम दे रहे हो आदेश सीता की अग्निपरीक्षा की..
                 ये सदा से ऐसा विषय रहा जिसपर मैं कतराने  का प्रयास करता रहा....कथा पंडालों में,,,मित्रों के मध्य,,,,मेरे पाठकों के द्वारा जब भी ये प्रश्न मुझसे किया गया,,मैं इसे टालने का प्रयास करता रहा हूँ....नही,,ये प्रश्न मुझे कभी रुचिकर नही लगा...ये मेरे राम की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाता है.....ये प्रश्न राम का व्यक्तित्व श्रेष्ठतम होने में अवरोध उत्पन करता है...कुतर्क करके इसका उत्तर मैं नही देना चाहता था...भला जो उत्तर मेरी आत्मा को मंजूर न हो,,वो मैं उस मित्र को,उस पाठक को कैसे दे दूं,, जो मेरे विवेक पर आंख मूंद कर विश्वास करता है....अतः बात को पलट देता रहा हर बार मैं... प्रश्न पर  सदा छिपता ही रहा हूँ..किन्तु ये  विश्वास सदा कायम रहा है कि राम कभी गलत नही हो सकते....
                       रात्रि शयन के पश्चात सुबह की वो बेला जब नींद अपने चरम पर होती है,,,जब मन सर्वाधिक शांत होता है,,,जब अरुण देव् अपने रथ के साथ सूर्यदेव के प्रांगण में उनके प्रस्थान के लिए खड़े हैं....तुम अचानक साक्षात मेरे नेत्रों में विराजमान हो गए राम....ये स्वपन है या कुछ और...तुम कोई भी लीला रचने में सक्षम हो स्वामी....पर मेरा बाल हृदय आज किसी नई लीला का साक्षी होने का अभिलाषी नही राम..बस मेरी शंका का समाधान करो मेरे आराध्य...मन्दबुद्धि लोग तुम्हारे चरित्र पर संशय करते हैं मेरे प्रभु....मैं उनके संदेह का निवारण नही कर पाता स्वामी.....
                  तुमने अग्निपरीक्षा का आदेश क्यों दिया राम...क्या वास्तव में तुम्हे माँ के चरित्र पर संदेह हुआ.....तुम्हे भगवती पर संदेह हुआ....जगतमाता को रावण दूषित कर सका होगा,,ऐसा भ्रम स्वप्न में भी तुम्हे नही रहा होगा,,ऐसा मेरा मन जानता है....फिर अग्निपरीक्षा क्यों रघुवीर....क्यों
               राम के अधरों पर वही मंद स्मित है,,जो उनकी सबसे निकट सहयोगिनी है..वही मुस्कुराहट,,जिसे देखकर भक्त अपना सब दर्द भूल ,,स्वयं को राम के चरणों मे समर्पित कर देता है....विरोध कभी भी तो नही किया तुमने.... हर आरोप,,हर छल को यूं ही मुस्कुरा कर ग्रहण कर लेते हो तुम सदा....विरोध करना अथवा स्वयं के कर्मो को परिभाषित करना,,तुम्हारा स्वभाव कभी भी तो नही रहा...किन्तु तुम्हारी मुस्कान का भेद जानने वाला अपने समस्त प्रश्नों का उत्तर स्वयं वहां पा लेता है...तुम मुस्कुरा रहे हो,,,,पूरब की लालिमा ,,सूर्यदेव के आगमन की घोषणा को आतुर है..अचानक पक्षियों का गूंजता कलरव मेरी तंद्रा तोड़ता है,,तुम वही मुस्कान अधरों पर धरे विदा लेते हो....सूर्यदेव के आगे चलने वाली किरणों ने रात्रि के तिमिर के साम्रज्य को छिन्न भिन्न कर दिया है...जनमानस के लिए नई आशाओं के सवेरे का उपहार लिए आकाश मे सूर्यदेव का आगमन हो रहा है....मेरे मानस पटल पर चढ़ा अंधकार भी धीरे धीरे विलुप्त हो रहा है......संशय की चादर ,,मेरे विवेक का त्याग कर रही है,,और मेरे आराध्य राम का नाम मेरे सर्वस्व को अपने आगोश में ले रहा है.....तुम्हारी मुस्कुराहट ने मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दे दिया प्रभु....मुझे क्षमा कर देना प्रभु,,,मैं तुम्हे समझने में बार बार असफल हुआ हूँ... बार बार तुम पर संदेह करता हूँ..
                           राम स्वयं श्रेष्ठ आर्य समाज के प्रतिनिधि हैं..उनका कुल,,उनका वंश सदा से धर्म आचरण में अग्रणी रहा है...किन्तु इतिहास साक्षी है,,,सभ्य अथवा दुर्दांत ,,कोई भी समुदाय रहा हो,,स्त्रियों को समाज की सबसे कमजोर कड़ी के रूप में माना जाता रहा गया है..वानरराज बाली को अपनी शक्ति दिखानी है तो अनुज सुग्रीव की स्त्री रूमा को जबरन हासिल कर लिया...लंकेश को अपने अपमान का परिमार्जन सीता में ही दिखाई दे रहा है...कालांतर में पांडवों से अपने द्रोह की शांति ,,दुर्योधन भरी सभा मे पांचाली को निर्वस्त्र करके करना चाहता है,,,,ब्रह्मांड ऐसे सैकड़ों उदाहरणों से भरा पड़ा है,,जब स्त्री,,, मात्र आपकी मिथ्या जिजीविषा को संतुष्ट करने का साधन मानी गई है...स्त्री आपका सम्मान है,,आपकी शक्ति की संकेतक है,,,,आपकी सनक को भुनाने के लिए सर्वाधिक सहज हासिल साधन नही है..
           किन्तु तुम तो राम हो न...स्त्री तुम्हारे लिए इन सब वर्जनाओं से ऊपर,,एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है..जिसकी अपनी स्वतंत्र विचारधारा है,,स्वतंत्र इच्छाशक्ति है,,,...आप जबरन स्त्री के देह को प्राप्त तो कर सकते हैं,,किन्तु उसकी देह को दूषित नही कर सकते,,,,आपका कुत्सित प्रयास उसके हृदय को प्रभावित नही कर सकता...उसके हृदय की वो अग्नि जो इस संसार को गतिमान किये हुए हैं,,किसी भी पुरुष की पहुंच उस पवित्र अग्नि तक नही हो सकती...इंद्र तुम माँ अहिल्या के विश्वास को खंडित तो कर पाए,,,किन्तु उनके सतीत्व को खंडित करना तुम्हारे सामर्थ्य में नही था...उनकी पवित्रता की सौगंध कालांतर में समस्त ब्रह्मांड में ली जाती रही हैं.....
               युद्ध समाप्त हो चुका है...विभीषण का लंका के सिंहासन पर राज्याभिषेक हो चुका है....अभी विभीषण को जीवनपर्यन्त रावण की स्त्री मंदोदरी के साथ निर्वाह करना है....क्या विभीषण मंदोदरी को वही सम्मान प्रदान कर पायेगा,,जिसकी वो अधिकारिणी है.....संशय के बादल ,मंदोदरी के नेत्रों में विचरते राम स्पष्ट देख चुके हैं....कितना विस्मय है कि यही बादल कुछ समय पूर्व रुकमा की आंखों में भी राम ने देखे हैं......जब बाली वध के पश्चात सुग्रीव अपनी स्त्री को प्राप्त कर रहा है,,तो स्वयं सुग्रीव के मन मे असमंजस स्पष्ट दृष्टिगोचर है...अभी लंका पर चढ़ाई हेतु समय बाकी है,,किन्तु इस समय काल मे सुग्रीव एक बार भी रुकमा को उस पवित्रता से नही जोड़ सका,,जिस सम्मान से बाली हरण से पूर्व वह अपनी स्त्री को हृदय से लगाता रहा है....पुरुष सदा से स्त्री को उसकी शक्ति नही अपितु सहनशक्ति के कारण प्रताड़ित करता आया है....किष्किंधा का आदिवासी समाज भी अब अपनी रानी रुकमा के प्रति स्वयं को आश्वस्त नही कर पा रहा है.....कितनी निरीह दृष्टि से रुकमा ने राम की ओर ताका था......तुमने तो अहिल्या तक को तार दिया रघुकुल भानु....मेरी अवस्था की ओर दृष्टि नही जा रही आपकी भगवन...मेरी सुध कब लोगे रघुपति..
               आज वही प्रश्न मंदोदरी की आंखों में उमड़ता देख रहे हैं राम....
            पता नही राम के अयोध्या लौटते ही वनों में रहने वाले ये नर(वानर),,और अपनी विलासता के लिए प्रसिद्ध ये असुर समाज रुकमा और मंदोदरी के साथ कैसा व्यवहार करेंगे.....नही ,,,कुछ तो  किया जाना आवश्यक है.....राम को यहां एक संकेत समाज के लिए देना ही होगा..जानते हैं भगवान कि समाज उनके इस निर्णय के पीछे की भावना से परिचित नही हो पायेगा...इतिहास के कई ग्रंथ उनके इस निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाएंगे....अनेकों लोग उन्हें स्त्री विरोधी घोषित करेंगे....किन्तु इस समय धर्म राम से इस निर्णय की मांग कर रहा है.....किन्तु सीता इसका क्या अर्थ लगाएंगी भला.....सीता का स्मरण होते ही पहाड़ का सा वजनी निर्णय,, राम के लिए पुष्प के समान भारहीन हो गया...सीता राम की अर्धांगिनी हैं....एक ही प्राणवायु दोनो के हृदय में स्पंदन उत्पन करती है...राम कभी सीता से इतर कुछ कहाँ सोच पाए हैं...तो क्या आज राम के इस निर्णय की वास्तविकता से सीता स्वयं परिचित नही होंगीं...नही नही,,सीता की ओर से राम को कोई समस्या नही है..वो देह अवश्य सीता कहलाती होगी ,,,किन्तु उस देह में जो प्राण है वो राम हैं...सीता ही राम है,,,राम ही तो सीता हैं.....
        अग्निपरीक्षा सीता की नही अपितु राम की है...आज राम का यह निर्णय इतिहास में स्त्रियों को सदा के लिए देवी तुल्य घोषित करेगा.....आज राम स्थापित कर देंगे कि स्त्री मात्र देह नही होती....उस देह के भीतर वास्तविक स्त्री होती है.....समाज स्त्री की देह का स्पर्श कर सकता है,,उस दिव्यता का नही जो जननी का आधार है,,,जिस दिव्यता के प्रताप से पानी की एक बूंद संतान का रूप प्राप्त कर लेती है....वो दिव्यता जो आदिकाल से इस ब्रह्मांड का संचालन करती आई है....नही भगवती सीता,,,आज तुम्हे सदा की भांति मेरे धर्म मे सहभागिनी बनना है..
            संसार को संचालित करने वाले राम ,,आज एक आदेश के द्वारा स्त्री की पवित्रता को तय करने वाला एक मापदंड निर्धारित करने का निर्णय ले चुके हैं ....एक सूत्र जो कलुषित विचारधारा के पुरुषों के लिए एक आदेश होगा...जो मापदंड युगों तक स्त्री को पवित्र घोषित करेगा....वो मापदंड जो तय करेगा कि स्त्री की पवित्रता को तय करने का कोई मापदंड नही हो सकता..वो सूत्र जो आदेश करेगा कि स्त्री की पवित्रता ,,पुरुष की स्वयं की पवित्रता पर निर्भर करती है....अपवित्र पुरुष को ही स्त्री अपवित्र ज्ञात होती है...प्राणों में पवित्रता रखने वाला पुरुष उसे हर अवस्था मे देवी के रूप में देखता है... अतः देह तो मात्र रूपक है स्त्री की विचारधारा का...
                  अग्निदेव  ने आगे बढ़कर सीता के चरणों को स्पर्श किया..भगवती मैं कृतार्थ हुआ...तुमने पुत्र को माँ की मर्यादा मापने का भार दिया....अपने सर्वश्रेष्ट रूप में अग्नि ने स्वयं को प्रस्तुत किया....वो संहारक नही,,अपितु पालक है...ये संसार की अज्ञानता है जो अग्नि को संहारक मानती है....अन्यथा जरा भी भान हो तो देखे कि हर प्राण में अग्नि ही जीव के जीवित होने का प्रमाण है...
             पवन पुत्र के आग्रह पर जब अग्निदेव ने लंका में अपना प्रचंड रूप प्रदर्शित किया था,,तब बहुत इच्छा के बाद भी माँ सीता के चरणों का स्पर्श अग्निदेव नही कर पाए....आज सौभाग्य स्वयं मानो द्वार पर चला आया है....आह....मेरे भाग्य,,,तूने मेरा होना सार्थक किया..भगवती ने अग्नि में प्रवेश किया....इतनी ही सहजता से जितना एक माँ अपने पुत्र के घर मे प्रवेश करती है..इतने ही अधिकार से,,जितना अधिकार एक माँ को अपनी संतान के वर्चस्व पर होता है....एक सुपुत्र की भांति अग्नि मानो आज सर्वस्व लुटाने को उत्सुक है माँ के आगमन पर...माँ के आंचल में ज्यों पुत्र खुशी से मचलता है,,,उसी भाव ने अग्नि को मानो आज स्वयं को प्रकट करने की स्वतंत्रता दे दी....चंद लकड़ियों का ढेर ,,सहज ही विकराल रूप में प्रज्वलित हो गया...लंका वासियों ने अग्नि को संहारक के रूप में ही देखा था...वानर तो खैर सदा से अग्नि से भयभीत होते आये हैं...चंद लकड़ी के टुकड़ों में सवार अग्नि ने ब्रह्मांड के दूसरे छोर का स्पर्श किया,,,आज मानो बालक माँ का आँचल त्यागने को तैयार ही नही....सीता नजरों  से ओझल हैं,,,,,सामने है तो मात्र स्वर्ग के द्वार तक को अपने लड़कपन से भयभीत करते अग्निदेव..सीता अग्नि में प्रवेश अवश्य कर गयी हैं,,किन्तु देह का ताप मंदोदरी को बढ़ता महसूस हुआ...यहां से कोसों दूर किष्किंधा में मानो रुकमा ने स्वयं को ताप से घिरा पाया...अग्नि के लपटें मानो किष्किंधा के राजमहल को आज रुकमा की पवित्रता का संदेश देने को आतुर हैं...महलवासियों ने स्वयं को भट्टी में तपता पाया..किष्किंधा के राजमहल में इस ताप से हाहाकार मच गया,,किन्तु कितना आश्चर्य कि जहां देवी रुकमा हैं,,वहां इस ताप का अब कोई असर नही...रुकमा ने भावुक होकर अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगा लिए.....प्रभु तुमने मेरी मूक प्रार्थना सुन ली न...अविरल अश्रुओं में मानो किष्किंधा के राजमहल के समस्त ताप को निस्तारित कर दिया हो...
           सीता अग्नि से बाहर कदम रखती हैं...आकाश से देवताओं ने मंदोदरी के चेहरे पर आए गर्व को स्पष्ट देखा...वो त्रिलोक विजयी रावण की अर्धांगिनी है..उस त्रिलोकविजयी को मोक्ष देने वाले विष्णु के अवतार ने लंका सहित समस्त ब्रह्मांड को मंदोदरी के स्वतंत्र होने का आदेश पारित कर दिया है..अब कोई मंदोदरी को उसकी इच्छा के विरुद्ध मजबूर नही कर सकता...स्त्री के मन की शक्ति ही उसकी पवित्रता है.....
      सुग्रीव ने स्वयं को मानो बहुत तुच्छ महसूस किया....जब से बाली की कैद से रुकमा को स्वतंत्र किया था,,तब से एक बार भी सुग्रीव का मन ,,रुकमा को उसका पुराना मान सम्मान नही लौटा पाया था...उसकी देह ही सुग्रीव को दिखाई देती थी..किन्तु उसके मन की पवित्रता से सुग्रीव आज तक अनिभिज्ञ था...किन्तु राम ने सीता को अग्निप्रवेश करा,,विश्व को ये संदेश दे दिया कि स्त्री को कभी उसकी शारीरिक अवस्था से न देखा जाय....स्त्री जननी है,,वो उस अग्नि की भांति है,,जिसके प्रभाव में आते ही समस्त पाप स्वयं होम हो जाते हैं,,किन्तु अग्नि  का कोई अहित नही कर सकता..ये वो गंगा है जो सदियों से पुरुष के प्रत्येक भाव को ,,एक माँ की भांति अपने अंदर पालती रही है...ये हमे जीवन देने वाली वो देह है जिसका विस्तार अग्नि की भांति धरती से आकाश तक है.....
          राम सीता को हृदय से लगाते हैं....तुमने मेरे धर्म की लाज रख ली जनकसुता...मुझे किंचित भी खेद नही कि मेरे इस आदेश को इतिहास में सदा मेरे विरुद्ध माना जायेगा...किन्तु तुम तो उस आस्था से परिचित हो न,,,जो इस निर्णय के मूल में है...अब वानर समाज रुकमा को हेय दृष्टि से नही देखेगा... अब राक्षस समाज मंदोदरी के सम्मान को ठेस नही लगाएगा....अब युद्ध मे विधवा हुई स्त्रियों को पुनः अपना नया जीवन ,,,अपनी इच्छा से ,,अपना मान सम्मान बरकरार रख जीने की स्वतंत्रता होगी.....उनकी देह उनके चरित्र की व्याख्या नही होगी...
            स्वयं के चरित्र पर संदेह की कालिमा उत्पन हो रही है,,,,ये जानकर भी राम धर्म निर्वाह में नही चूक नही कर सकते....तुम पुरुषोत्तम हो प्रभु...पुरुषों में सबसे उत्तम....

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         (Mothers Day के उपलक्ष्य में समर्पित ये लेख कल प्रकाशित करना चाहता था,,किन्तु समयाभाव से कल इसे पूर्ण नही कर सका....पाठकों की अदालत में इसे आज सुपुर्द करता हूँ..हार जीत का निर्णय पाठक के अधिकार में,,जो निर्णय होगा,,सहर्ष स्वीकार होगा.....प्रणाम..)

अपना घर

***** अपना घर...क्यों नही हो रहा फलदायी ****
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      प्रत्येक मनुष्य का सबसे  प्रिय स्वप्न सदा से स्वयं का एक घर होना है,,,छोटा हो अथवा बड़ा,, किन्तु स्वयं के परिवार पर अपनी छत हो.....अनेकों बार देखने मे आता है  कि मनुष्य अपने सर्वस्व झोंक कर अपने सपनो की कुटिया बनाने का सामर्थ्य नही जुटा पाता......गृह निर्माण आरम्भ ही नही हो पाता,,,,,ऐसा संजोग ही नही जुड़ पाता..... किसी प्रकार गृह निर्माण आरम्भ हो भी जाता है तो किसी न किसी कारण इसके पूर्ण होने में अड़चन आने लगती है...सामान्यतः गृह निर्माण आरम्भ से पूर्व जातक यथासंभव जानकार विद्वान ब्राह्मणों से सलाह लेता ही है,,,,,,किन्तु सामान्य पंचांग में दिए गए ग्रह निर्माण के सूत्रों के इतर कुछ विषय और होते हैं,,,जिनका जिक्र स्थानाभाव के कारण पंचांग में करना संभव नही होता.....जिज्ञासु पाठकों व पेशेवर ज्योतिषियों हेतु कुछ सूत्र देने का प्रयास कर रहा हूँ,,,,,,आशा है पाठक व ज्योतिषी दोनो को लाभ मिलेगा......
            गृह आरम्भ करने से पूर्व कुछ बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है...पाठकों से निवेदन है कि जब भी अपने नए मकान का निर्माण आरम्भ करें..अपने ज्योतिषी से इस विषय में अवश्य जानकारी प्राप्त करें..क्योंकि निषेध समयकाल में आरम्भ किया गया मकान स्वयं मकान मालिक हेतु भी अशुभ फल उत्पन्न करने में सक्षम होता है...शाष्त्र कहता है कि सूर्य जिस नक्षत्र में हो ,उससे सात नक्षत्र आगे तक गृह निर्माण आरम्भ नहीं किया जाना चाहिए..इन सात नक्षत्रों के बाद आगे 11 नक्षत्र इस कार्य हेतु शुभ माने गए हैं..इससे आगे पुनः 10 नक्षत्र अशुभ माने गए हैं...अब अगर जिज्ञासु पाठक के मन में ये प्रश्न उठे कि इस क्रम में तो 7+10+11 तो 28 नक्षत्र हो रहे हैं जबकि सामान्यतः नक्षत्र 27 ही होते हैं तो सूचित कर दूँ कि इस गणना में अभिजीत को भी शामिल किये जाने का आदेश शाश्त्रों में है...इसी प्रकार गृह आरम्भ के समय यदि सूर्य नीच,अथवा निर्बल हो,अशुभ भावों में हो तो गृहस्वामी हेतु शुभ नहीं माना जाता....इसी क्रम में चंद्रमा को गृहस्वामिनी ,गुरु को सुख ,शुक्र को धन हेतु अशुभ माना जाना चाहिए...गृह निर्माण के आरम्भ में यदि सूर्य 3-6-11 भावों में हो तो शुभ माना गया है,8-12-2-4 में ये अशुभ फल प्रदाता है...केंद्र त्रिकोण में उच्च के गुरु-शुक्र मकान की आयु को बढ़ाने वाले कहे गए है...भविष्य में गृहनिर्माण सम्बन्धी विस्तृत लेख अपनी वेब साईट अथवा ब्लॉग पर देने का प्रयास करूंगा....
Rightsunshineforu.blogspot.in
WWW.astrologerindehradun.com

राहु....

*****राहु *********
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          राहु एक क्रिया का नाम है..इसे आप किसी रूप में खोजेंगे तो निराशा हाथ लगेगी...ये हर जगह है ,किन्तु कहीं नहीं है..आम का वो स्वाद जिसे आप परिभाषित नहीं कर सकते..राहु ही है..बहुत तेज प्यास के बाद पानी से जो तृप्ति प्राप्त हुई वो राहु है...किसी लाचार को देखकर जो दया आई वो राहु ही है...सचिन के सेंचुरी मारते हुए देखने पर जो आनंद प्राप्त हुआ वो राहु है...दवा का जो कड़वा स्वाद है वो राहु है...अतः ऐसा कुछ भी जिसकी कोई सीमा नहीं,कोई माप नहीं वो राहु है...शरीर में  आभास के रूप में   इसे खोजने का प्रयास करें तो इसके दो रूप हैं..एक विक्रम और एक बेताल...एक सकारात्मक और एक नकारात्मक....
            जातक के अंदर किसी भी कला के लिए जो तकनीक है वो राहु है..मशीन के  अंदर तकनीक राहु है...शरीर द्वारा बिना सोचे समझे किये गए कार्य राहु हैं...बिजली का तार छूते ही उसका बिना ये देखे कि बच्चा है या बूढ़ा या जवान,करंट का झटका देना राहु है...कुछ भी अप्रत्याशित होना राहु है...और जहाँ भी राहु को संतुलन देने का प्रयास किया जाता है,किसी भी प्रकार से,किसी के भी द्वारा..वो केतु है..बिजली का झटका आते ही ट्रिप हो जाना केतु है..सचिन की सेंचुरी के बाद भी भारत का हार जाना उस ,,,ख़ुशी को थामने का कार्य करेगा..ये केतु की श्रेणी में रखा जाएगा..राहु आकाश है अर्थात सिर है..केतु पाताल है अतः पैर है..दोनों का मेल है तो विक्रम बेताल है..वरना बिना ताल के यानी बेताल है..विक्रम है तो हर बात क्रम से है..सही है...इसलिए यदि विक्रम(विवेक)जीवित है तो  बेताल को भी ताल प्राप्त है..वो सुर में है...अतःक्रिया के संतुलन के रूप  में केतु की कीमत है..ज्योतिषियों को चाहिए कि जातक को उनके वास्तवकि राहु केतु से परिचित कराए,,न कि आकाशीय पिंड का हौवा बनाकर बेसिर की बातें उड़ाए....जागरूक ज्योतिषी को सीमाओं को लांघने हेतु तत्पर रहना चाहिए....घिसी पिटी लकीर पर चलकर वास्तविक ज्योतिष आपको समझ में आएगा,,इसमें संशय है..आशा है पाठक सहमत.. होंगे..

चतुर्थ माता,,दशम पिता

...कई बार मन मे ये प्रश्न जिज्ञासु ज्योतिषी भाइयों के आया होगा कि यदि चतुर्थ माँ का भाव है ,,तो इससे पूर्व तृतीय भाव भला सहज(भाई बहन) का भाव कैसे है ..आपने देखा होगा कि चतुर्थ माँ का भाव है,,,किन्तु तृतीय भाव को सहज(सहोदर) का भाव कहा गया है,,क्यों भला,,,,,क्या माँ पहले हासिल हुई अथवा सगे भाई बहन...कायदे से माँ का भाव पहले आना चाहिए,,तत्पश्चात सहज भाव की कल्पना होनी चाहिए,,,
                 किन्तु होता इसका उलट है......चतुर्थ माँ का आँचल है पाठक वृन्द,,,,किन्तु तृतीय माँ का गर्भ है,,,,,तृतीय में पला डिम्ब ही चतुर्थ में आकार पाता है,,माँ की कोख ही वह स्थान है जहां अपने सहोदरों के साथ जातक रहा है,,इसी कारण ये सहज भाव है,,,,किन्तु वास्तव में चतुर्थ के लिए भूमि है,,,चतुर्थ नामक वृक्ष इसी भूमि पर अंकुरित हुआ है,,,कोई भी भाव अपने से अगले भाव के लिए भूमि का आधार समान कार्य करता है,,,या कहें कोई भी भाव अपने से पिछले भाव का फल है....
           इसी प्रकार दशम पिता की गोद है,,किन्तु नवम पिता का वीर्य है,,,,नवम का अंकुरित बीज ही फल के रूप में दशम है...यूं समझिए कि एक पर्दे के पीछे का हिस्सा है व एक वो चलचित्र है जो सामने दिखाया जाता है...हर भाव के आपरेट करने के कई प्रकार होते हैं,,,,बीज- भूमि -फल...ये ही रिश्ता हर भाव का अपने आगे पीछे के भाव से राहत है....आशा है अपनी बात आप तक पहुंचा पाया ....प्रणाम

ज्योतिष को जानें..

******* ज्योतिष को जानें****
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           .     ज्योतिष के विद्यार्थियों व शोधार्थियों को पुस्तकों में लिखे सूत्रों के साथ साथ ,,,अन्य कारकों पर भी समग्र दृष्टि रखनी चाहिए...गुरु अवश्य धारण करना चाहिए..बिना गुरु,,पुस्तकों के सूत्र मात्र किताबी आखर के समान व्यवहार करने लगते हैं..राहु भारी है,,शनि मारक है,,मंगल बिगड़ गया है,,,,,इन शब्दों ,,इन विचारों से ऊपर दृष्टि जाना असंभव हो जाता है,,,बिना गुरु के सानिध्य के.....
                   ज्योतिष आकाश से लेकर पाताल,,और पहाड़ों से लेकर समुद्र तक फैला पड़ा है...वृक्षों से लेकर कीट पतंगों पर इसका अधिकार है...कुछ सूत्रों को प्रदर्शित करने के लिए ,,पुरानी मान्यताओं का आधार भी ज्योतिषी को लेना पड़ सकता है....ज्योतिष व्यवहार से भी प्रदर्शित होता है,,व आंकड़ों से भी...बिल्ली के रास्ता काटने में भी ज्योतिष है,,,व घर के ऊपर से निकला परिंदा भी ज्योतिष के सूत्र बताता है....अतः एक ज्योतिषी को गणित,,इतिहास,,भूगोल,,,प्राणी विज्ञान,,,मनोविज्ञान,,वनस्पतिशास्त्र आदि की जानकारी रखना उतना ही आवश्यक है,,जितना एक वाहन चालक के लिए,,गेर,,ब्रेक,,एक्सेल,,तेल,,,हॉर्न,,, पंचर,,, स्पार्क प्लग की जानकारी होना....मात्र कुछ पुस्तक विशेष में पढ़कर बिना गुरु के ज्योतिषी बनना उस ड्राइवर के समान है ,,जो वाहन का ज्ञान मात्र चाबी लगाकर उसे स्टार्ट करने तक जानता है...इसके बाद के उपक्रमो की जानकारी के अभाव में,,वो वाहन को सड़क पर तो ला सकता है,,किन्तु इससे सड़क पर चल रहे अन्य लोगों के प्राणों पर कितना रिस्क है,,ये हमे भलीभांति ज्ञात है...इसी प्रकार नौ ग्रह और बारह भाव की कहानी सुनकर जो ज्योतिष की गाड़ी लेकर मैदान में उतर आते हैं,,वे कितने लोगों को कुचलेंगे,,इसका अंदाजा नही लगाया जा सकता...
                  अब मुख्य प्रश्न ये उठता है कि गुरु कौन है....सर्वप्रथम आपकी अंतरात्मा आपकी गुरु है...हृदय पर हाथ रखकर अपनी आत्मा से प्रश्न किया जाय,,कि क्या मैं वाकई ज्योतिषी होने के लायक हूँ,,, क्या मेरा अनुभव,,मेरा ज्ञान वाकई मुझे उस सीमा तक ले आया है,,जहां से मैं किसी जिज्ञासु को कोई सलाह देने की हालत में हूँ....
           दूसरा गुरु आपका विवेक है....क्या मैं वास्तव में ज्योतिष की उस रहस्यमय भाषा को ताड़ना सीख गया हूँ,,जिन गूढ़ चिन्हों में देवताओं ने इस शास्त्र को परिभाषित किया है....क्या कारण है कि ब्लड रिपोर्ट एक भाषा विशेष में प्रकाशित की जाती है,,,क्या कारण है कि कंप्यूटर को चलाने वाली भाषाएं जावा आदि विशेष चिन्हों द्वारा दिखाई गई हैं...क्या कारण है कि हवाई जहाज,, अथवा पानी के जहाज से संबंधी विज्ञान,,सामान्य से इतर अपनी एक अलग ही लिपि पर चलता है......क्या कारण है कि न्यायालय में बात को सीधे न कहकर,,दफ़ा 302,,दफ़ा 420,,,दफ़ा 512 आदि कोड वर्ड में की जाती है.....साधारण सा उत्तर है ,,कि आशा की जाती है कि भविष्य में इन क्षेत्रों में जिन लोगों द्वारा इस भाषा का उपयोग जन हित में किया जाय,,वो सामान्य ज्ञान से ऊपर का ज्ञान रखने वाले लोग हों...हर किसी की पहुंच से इसे दूर रखा जाय..मात्र वे ही इसका उपयोग कर पाएं ,,जो विषय विशेष में एक निर्धारित मापदंड का स्पर्श कर चुके हों.....अन्यथा खुद देखिये कि आठवीं -नवीं- दसवीं में पढ़ाए गए गणित के सूत्रों साइन थीटा,, कॉस थीटा,,,,,अथवा फिजिक्स में पढ़े न्यूटन के सिद्धांत,,आज हममे से किंतने लोग,,कहाँ उपयोग में लाते हैं.....
             सबको ज्ञान है कि बुखार में पैरासिटामोल खाया जाता है,,सिर दर्द के लिए डिस्प्रिन कारगर दवा है...किन्तु इतना ज्ञान होने से हम स्वयं को उस चिकित्सक के समकक्ष नही मान सकते,,जो इस विद्या को विधिवत गुरुओं द्वारा प्राप्त कर आज इस मुकाम पर है... अपनी गाड़ी का स्पार्क प्लग निकाल कर ,,साफ करके उसे वापस लगा देने की अपनी क्षमता के बल पर ,,,यदि हम स्वयं को एक मेकैनिकल इंजीनियर के बराबर उस विषय का जानकार मान बैठे हैं,, तो हम हंसी का पात्र हैं...कंपास,, एल्टीट्यूड ,,,ग्रेविटी,,,लैंड,,टेक ऑफ,, आदि कुछ शब्दों की जानकारी जैसे हमे पायलट नही बना सकती,, उसी प्रकार 9 ग्रह व 12 भाव और 27 नक्षत्र की रटन विद्या किसी को ज्योतिषी नही बना सकती.....
                    ... बिना गुरु के ज्ञान मात्र एकलव्य को प्राप्त हो सकता है,,सभी इस श्रेणी में नही आते...अतः गुरु आवश्यक हो जाता है,,अनिवार्य हो जाता है...तीसरा गुरु प्रकृति होती है..
                       हर धर्म,,जाति,,, सम्प्रदाय विशेष के अपने रिवाज़ होते हैं,,,अपनी अवधारणाएं होती हैं...अपने सिद्धांत होते हैं...इनका सीधा संबंध ज्योतिष से होता है..इन्हें जाने बगैर,,या कहें इनका अध्ययन किये बिना,,इन्हें नकारना,,इनका विरोध करना,,मनुष्य को उस बालक के समकक्ष खड़ा कर देता है जिसने "अ" से अनार का ज्ञान ही अभी प्राप्त किया होता है..."अ" से अविराम,,अवधूत,, अंजुमन,,,अवरोध बताते ही वह गलत गलत चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लेता है....उस मनुष्य के समान घोषित कर देता है,,जिसने कभी मोबाइल नही देखा था,,,अथवा जिसने अमेरिका के बारे में नही सुना था,,,या कहें जिसने आज तक  पानी को icecream का रूप लेते नही देखा हो.....
                         .बिल्ली का रास्ता काटना आपके लिए अंधविश्वास है क्योंकि आप प्राणीशास्त्र नही पढ़े हैं...जानवरो के व्यवहार के प्रति आप अज्ञानी हैं,,अतः कोई दूसरा यदि इस विषय पर बात कर रहा है तो वह आपकी दृष्टि में अज्ञानी है....बिल्ली आमतौर पर एक सुस्त प्राणी है,,,,कुछ समय विशेष के अलावा वह सामान्यतः एक कोने में पड़ा रहना पसंद करती है..यदि कभी वह आपके सामने से तेजी से निकल रही है,,तो बहुत संभव है वह सांप आदि किसी हानिकारक जीव जंतु के पीछे लगी हो,,,,ऐसे में वहां अन्य हानिकारक जंतुओं की उपस्थिति से इनकार नही किया जा सकता,,,अतः आपसे आशा की जाती है,,कि तनिक क्षण रुककर देख लें कि आपकी राह आपके व आपके बच्चों के लिए साफ है,,कोई विषैला जीव तो अचानक आपके पैरों से नही टकराने वाला....गाय व अन्य जानवर धरती के नीचे के कंपन को तीव्रता से भांपते हैं,,,,कहीं ऐसा तो नही कि वे अकारण,,असमय  रंभाकर,,भौंककर आपको कोई संदेश देने के प्रयासरत हैं....आपके इलाके से,,आपके निकट से अचानक सभी परिंदों का पलायन करना कहीं आपको सूचित तो नही कर रहा कि शीघ्र आपको पानी के उचित साधनों की व्यव्यस्था कर लेनी चाहिए आपके परिवार के लिए,,क्योंकि आगे अकाल की संभावना है....घर से निकलते समय परिवार के किसी सदस्य का अचानक छींक देना,,,कहीं उसके बीमार होने का सूचक तो नही.....बच्चे,,बुजर्ग कब बीमार हो जाएं,,और पता चले,,हम समय पर उनकी सेवा के लिए उपलब्ध न हो पाएं,,,, उससे पहले तनिक रुकिए,,जरा उस छींक को जांच लीजिये,,कोई बीमार तो नही घर मे....ये सब ज्योतिष के सहायक विषय हैं......
                                 प्रदेशों के ,,,जातियों के ,,,इलाकों के अलग अलग रिवाज हैं,,,अपनी अपनी सीमाओं के दायरे में....अपनी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कुछ नियम हैं,,,,ये सब ज्योतिष के नियमो के सहायक हैं.....गढ़वालो में जब दूर दूर बसे होने से,व यातायात के साधनों का अभाव होने से ,,,किसी विवाह,,,अथवा किसी भी भोज में कहीं निमंत्रण मिलता तो ,,गुड़ का बना मीठा भात पहले परोसा जाता....किन्तु आपके यहाँ तो मीठा अंत मे परोसा जाता है,,तो मीठा भात पहले परोसने वाले आपकी निगाह में देहाती गंवार हो जाते हैं......मीठा सदा खाने की तृप्ति प्रदान करता है....तीखे भोजन को पचाने के लिए शरीर को अधिक आराम की आवश्यकता होती है..अतः पहले मीठा परोस दिया जाता है ताकि आपकी भूख नियंत्रित हो जाय....आप बाद में मिलने वाला तीखा भोजन कम खाएं,,,,जिस कारण आपको असमय नींद का सहारा न लेना पड़े....आप दूर के अपने गंतव्य के लिए सही समय पर प्रस्थान कर सकें..वहीं विलासिता से भरे जीवन मे भोजन से पूर्व तीखा सूप आदि परोसने का रिवाज है,,,ताकि आपकी भूख खुल जाय,, आप डटकर भोजन करें,,व पश्चात तृप्ति के लिए कुछ मीठा खाएं,,,,,अब नींद भी बेहतर आएगी,,,,गलत कोई नही,,अकारण कुछ  नही..बस अपनी अपनी आवश्यकताएं,,,अपनी अपनी जरूरतें...
                                  इसी प्रकार अलग अलग स्थानों में बलि प्रथा संबंधी अपनी अपनी आवश्यकताओं के कारण अपने अपने रिवाज रचे गए......जिन जिन जानवरों की क्षेत्र में अधिकता व दैनिक जीवन में उनका कोई इनका कोई उपयोग न होकर,,,उल्टे समस्याएं ही उत्पन करना,,,उनकी बलि की व्यवस्था का कारण बनता गया.... क्योंकि आपके यहाँ ऐसे जानवर नही रहे,,और आपने उनके द्वारा अपना खेत चौपट होते नही देखा,,,तो बलि प्रथा आपके लिए गलत हो जाती है....अपने अपने स्थान विशेष की अपनी आवश्यकताएं होती हैं,,,उन्हें बिना महसूस किए,,बिना जाने विरोध करना ,,,,अक्लमंदी के दायरे में नही आ सकता..
                               आकाश से गुजरते पंछी,,आपके घर पर पड़ती आकाशीय नाकारात्मक ऊर्जाओं को विखंडित करने में सहायक होते हैं...आपको ज्ञात ही नही कि किंतने परिंदे ,,कब कब आकर उन नकारात्मक ऊर्जाओं को बाधित कर गए आपके लिए.....इसलिए छत पर आपको बाजरा,,,अनाज,,,दाने डालने की सलाह आपके ज्योतिषी द्वारा दी जाती है....अनाज की उपलब्धता परिंदों को आपके छत के ऊपर से निकलने को आमंत्रित करती है,,,,परिंदे आमंत्रित होते हैं तो छोटे मोटे कीट पतंगों ही नही अपितु कई बार बीमारियां फैलाने वाले चूहों व विषैले सर्प तक को अपना आहार बना लेते हैं.... ये सब ज्योतिष के विषय हैं....ज्योतिष आपकी दैनिक जीवनचर्या के साथ चलने वाला एक सिद्धांत है.....अलौकिक बातों से इसका कोई सरोकार नही...अब आपको इसका अर्थ नही पता तो आपके पंडित जी दकियानूसी,,और पाखंडी हो गए आपकी दृष्टि में....
             छत में कुत्ते का बांधना,, और उसका जोर जोर से रोना और भौंकना,,उन पंछियों की दिशा को बाधित करता है,,,इसी कारण आपका ज्योतिषी आपको बताता है कि कुत्ता राहु है व इसे अपने सिर पर न रखें,,अर्थात छत पर बंधा कुत्ता राहु की नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त करने में बाधक हैं.....आजमा के देख लीजिए पाठक वृंद,,, जहां जहां ऐसा होगा वहां वहां विपदाओं का आगमन होगा...पचासों बार आजमाया सूत्र है मेरा......उस घर का कोई सदस्य बड़ी बीमारियों,,चोटादि की चपेट में शीघ्र आते हैं..रोजगार व्यवसाय में अचानक हानि देखनी होती है .....जहां कुत्ता घर के भीतर रखा जाता है,,वहां रहने वाले स्त्री पुरुष जातकों के विवाह देर से होते हैं...कुछ का दामपत्य उचित नही रह पाता...भैरव ,,,मंदिर से बाहर के रक्षक देवता हैं,,,इन्हें आप भीतर नही रख सकते..
                 बहुत सी ऐसी बातें हैं,,जो अनुभव की कमी से हमें व्यर्थ प्रतीत होती हैं....भारत सामान्यतः एक गर्म देश है..नाभकीय कक्षाओं से सूर्य का भ्रमण अधिकतर दक्षिणी कोण से यहां होता है.....अतः मकान बनाते समय यथासंभव दक्षिण मुखी मकानों से परहेज रखा जाता है...ताकि दिनभर के सूर्य के ताप से बचाव हो सके......ये जियोग्राफी( भूगोल )के अंतर्गत आने वाला विषय है....अब अगर आपने जॉग्रफी का अध्ययन नही किया है ,, तो आपको यह सलाह देने वाला गणक मूर्ख है आपकी दृष्टि में......
                               अगर आप फिजिक्स (भौतिक) के विद्यार्थी रहे हैं तो नाभकीय विद्युत ऊर्जा से होने वाले नुकसान के विषय मे आपने अवश्य पढ़ा होगा.....बड़ी बड़ी इमारतों में सिविल इंजीनियर  ताडिचालक द्वारा अर्थिंग का कनेक्शन जमीन के भीतर डालते हुए आपने अवश्य देखे होंगे...अब संभवतः आपको आपके पंडित जी द्वारा मकान के वास्तु के रूप में चांदी के नाग,,और तांबे का लोटा ,,बुनियाद के एक कोने में दबाने का अर्थ ज्ञात हो रहा हो....ये अर्थिंग है भैया उस समयकाल की...
                         ज्योतिष में पारंगत होने के लिए एक भाषा विशेष की कुछ पंक्तियां रटने की आवश्यकता नही है मित्रों......रोजमर्रा के जीवन मे घटित होने वाली घटनाओं पर समग्र दृष्टि रखने से,,,,प्रत्येक घटना को अपना गुरु मानने से,,व नित एक जिज्ञासु छात्र बने रहने से ,,आप इस विद्या पर नियंत्रण पाते हैं...अतः निरंतर कुछ नया सीखने हेतु तत्पर रहें....नही ज्ञात इसलिए किसी बात का विरोध करना ही बुद्धिमत्ता नही कहलाती मित्र.....
               आशा है पाठक सहमत होंगे...एक लेख के लिए,,, लेखक अपने सारे कार्य त्याग इस लालच में अपना समय लगाता है कि अपने पाठक से वाहवाही प्राप्त करे....पाठक की तालियां सुबह से खाली पेट बैठे आपके लेखक के लिए अमृत रस समान हैं...आपकी टिप्पणी रूपी अमृत बूंदें मुझमें भी प्राण संचार करेंगी...इसी आशा मे .............आपका अपना.........

गुरुवार, 30 मार्च 2017

shani...sani....neelam शनि..नीलम... वक्री....मार्गी..

हर विषय की तरह ज्योतिष शास्त्र व ज्योतिषी भी परंपरागत लकीर को लांघने में खौफ सा खाते दिखाई देते हैं.. दूध को दूध और पानी को पानी कहने वाले कई मिल सकते हैं...किन्तु पानी मिले दूध को पानी बताने के लिए कलेजा चाहिए..पीछे से चली आ रही लकीर को पीटने की प्रथा का अनुगामी जो ज्योतिषी होगा,वो नए सूत्र,नया विजन नहीं दे सकता...जो वर्जनाओं को नहीं त्याग सकता वो आकाश में नहीं उड़ सकता...
      कमोबेश यही स्थिति शनि को लेकर चली आ रही है..और यही स्थिति है शनि से सम्बंधित रत्न माने जाने वाले नीलम की...परंपरागत रूप से ज्योतिषी भाई बंधु नीलम को शनि का रत्न बताते आये हैं,,,अपने अध्ययन के दौरान सामान्यतः हर गणक ऐसा ही पढता है,या समझाया जाता है...रत्नों के बारे में साधारण सी समझ रखने वाले पाठक भी ये बात तो जानते ही होंगे कि रत्न सम्बंधित ग्रह के मूल रंग को धारण करता हूं..उसकी आभा को परिभाषित करता हूं...सफ़ेद चंद्र के लिए सफ़ेद मोती का प्रावधान है,,लाल मंगल के लिए ऐसी ही आभा लिया मूंगा तय है.....हरे बुध के लिए हरा पन्ना तय किया गया है....पीले बृहस्पति के लिए पीला पुखराज शास्त्रोक्त है...ताम्बई सूर्य के लिए वैसी ही आभा वाला माणिक उपयुक्त माना जाता है....तो इस क्रम में भला परिवर्तन शनि को लेकर क्यों हो जाता है...
   नीलम,, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है,,नीली आभा लिए एक रत्न है..जिसका सम्बन्ध शनि से जोड़ दिया गया है...पाठक भलीभांति अवगत हैं कि शनि का रंग काला है..तो इसका रत्न नीला कैसे हो सकता है...नीला राहु का रंग है मित्रों....ऊपर डिसकस किये सूत्र के अनुसार यर राहु का रत्न होना चाहिए....
         अब शनि की शिफ़्त की तरफ ध्यान दीजिए..मार्गी शनि स्वयं के शरीर से काम लेता है तो वक्री अपनी बुद्धि व दूसरों के शरीर से काम लेता है...मार्गी शनि को एक मजदूर समझ लीजिए,,जो अपने दो हाथों से जितना काम करेगा,,उतना लाभ पायेगा....वक्री शनि को ठेकेदार समझ लीजिए,जो कई मजदूरों से काम करवा कर उनकी मेहनत का लाभ ले रहा है......आप मज़दूर व ठेकेदार दोनों को भला नीलम कैसे धारण करवा सकते हैं ....यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि  वक्री शनि जहाँ भी होगा,वहाँ से लाभ के समीकरण बनाने का प्रयास करेगा...वक्री शनि ,कारक हो या अकारक,दोनों किरदारों में लाभ का ही फल उत्पन्न करता है..
       नीलम धारण करवाने से आप मजदूर को उसकी प्रतिभा के विपरीत अधिक उकसा रहे हैं,जहाँ आगे हानि ही स्पष्ट दृष्टिगोचर है....वक्री शनि(ठेकेदार) को आप नीलम धारण करवा रहे हैं तो उसे निराशा के अंधकार में ले जा रहे हैं....जो व्यक्ति अच्छा भला दस मजदूरों से काम करवा ,लाभ प्राप्त कर रहा था,,वो अब अपने दोनों हाथों पर आश्रित हो गया है...
          रत्न वास्तव में लग्न ,पंचम व नवम की मिश्रित आभा को पूरा करता हो तो ही अधिक लाभप्रद माना गया है...किन्तु नौशिखिये ज्योतिषियों के साथ यहाँ से ही  समस्या आरम्भ हो जाती है,, अनुभव की कमी उन्हें सही निर्णय तक नहीं पहुँचने देती.......लग्न अगर खाली है तो आपको लग्नेश के आश्रित स्थान को लग्न बनाना पड़ता है,,तब जाकर आप सही निर्णय लेने की अवस्था में पहुँचते हैं....
       उदहारण के लिए मान लीजिए कोई जातक वृश्चिक लग्न से सम्बंधित है....ऐसे में बुध यहाँ मारक हो जाता है,,...किन्तु लग्न कुंडली में यदि हम लग्न को रिक्त पा रहे हैं वे लग्नेश की पोजीशन एकादश भाव में बुध की कन्या राशि पर है,,,तो जातक को रत्न संबंधी सलाह देने के लिए हमें कन्या राशि को ही लग्न की तरह ट्रीट करना पड़ेगा..ऐसी अवस्था में सहज ही पन्ना धारण कराया जा सकता है.....अपनी दशा में बुध वृश्चिक लग्न के लिए मारकेश का कार्य ही करने वाला होगा,इसमें कोई संशय नहीं.....किन्तु पन्ना यहाँ आमदनी के साधनों को शीघ्र मजबूत करेगा इसमें भी कोई संशय नहीं....किताबी सूत्रों की तुलना में स्वयं के परिभाषित किये सूत्र ज्योतिषी को अधिक सहायक रहते हैं ,ऐसा मेरा व्यक्तिगत विश्वास है.....ज्योतिष किसी आसमानी चिड़िया का नाम नहीं है मित्रों....इसके लिए आपको संस्कृत घोटने की कतई आवश्यकता नहीं है....न ही मन्त्रों में आपका पारंगत न होना आपके ज्योतिषि बनने की राह में कोई रोड़ा है....बेसिक अध्ययन के बाद अपने आस पास तार्किक व विवेचनात्मक दृष्टिकोण रखना,, व पुराने सूत्रों को नए लिबास में देखने का हुनर ही आपको ज्योतिष की राह में आगे ले जाएगा,,ऐसा मेरा विश्वास है.....अतः आप भी अपने वातावरण पर समग्र दृष्टि रखें,,प्रकृति के परिवर्तनों को समझने का प्रयास करें,अपनी छठी इंद्री को जागृत करने का अभ्यास करें.....आपकी ज्योतिषी बनने की राह स्वतः ही सुगम हो जाती है....लेख के विषय में आपकी अमूल्य राय का इंतजार करूँगा....प्रणाम...

बुधवार, 29 मार्च 2017

fifth house... पंचम भाव....जन्म मृत्यु..प्रारब्ध

मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होने के पश्चात कहाँ जाता है,इस विषय पर बहुत से ग्रन्थ ,बहुत से विचार प्रस्तुत करते हैं..किन्तु जन्म लेने से पूर्व वो कहाँ से किस हालात से निकल कर आया है,ये जानकारी बहुत कम उपलब्ध होती है....ज्योतिष में इस विषय में बहुत रहस्यपूर्ण तरीके से आगे बढ़ा जाता है...पूर्व में हमारी वेब साइट www.astrologerindehradun.com में  मेरे पितृ दोष संबंधी लेख में  मैंने पाठकों के समक्ष ,,बड़ी शिद्दत से पंचम भाव का महत्व रखने का प्रयास किया था व पाठकों की खूब वाहवाही पाई थी...इसी सूत्र को आगे ले जाने का प्रयास आज कर रहा हूँ...
       लग्न व अष्ठम भाव से प्रभाव एक साथ एक दूसरे की ओर बढ़ता है..वो भी विपरीत कारक के साथ....कैसे???आइये समझते हैं...लग्न जातक का जन्म है तो अष्ठम मृत्यु...अब लग्न से अगला भाव अर्थात द्वितीय भाव ,,जन्म के पश्चात की पहली सांस है... इसके विपरीत अष्ठम से पहला अर्थात सप्तम भाव जीवन की अंतिम सांस है...एक तरफ से (लग्न से) प्रभाव आगे आने वाले कारकों के लिए बुनियाद तैयार कर रहा है,तो दूसरी ओर का प्रभाव ,अंतिम सत्य (अष्ठम मृत्यु ) से प्रारब्ध की बुनियाद तलाशने का प्रयास कर पीछे की यात्रा कर रहा है..
        द्वितीय सांस के बाद तृतीय उसका आकार है,,,भविष्य की जद्दोजहद से लड़ने के लिए मनोबल ,पुरुषार्थ है....तो सप्तम से पीछे छठा भाव उस अंतिम सांस(सप्तम) के लिए कारण पैदा करने वाला भाव है....तृतीय के बाद चतुर्थ माँ  की गोद है.. ..वहीँ षष्ठम भाव से पूर्व का पंचम भाव अंतिम सांस के कारण तय करने वाले भाव को उत्पन्न करने वाली भूमि है..यहाँ पाठक एक बात अवश्य गौर करें कि किसी भी भाव ,किसी भी ग्रह से सप्तम स्वतः ही उसके लिए अपोजिट प्रभाव उत्पन्न करने को मजबूर हो जाता है..अतः पंचम यदि प्रथम वस्त्र के रूप में माँ के आँचल के रूप में देखा जाता है तो एकादश इसी कारण अंतिम वस्त्र कफ़न का भाव है...लग्न को जातक माना जाय तो नवम उस भूमि का रूप है ,जिसपर ये पौधा उगा है,,,,,नवम पिता है तो नवम के पीछे पंचम उसका आधार है....इसी कारण स्पष्ट है कि जातक अपने अंश के रूप में  भविष्य में जो पंचम(संतान) उत्पादन करने वाला है,वास्तव में ये ही भाव लग्न के निर्माण वाली भूमि(नवम) का आधार भाव है....अतः ज्योतिषी को सभी भाव त्यागकर सर्वप्रथम पंचम भाव का विवेचन करना श्रेष्ठ निर्णय लेने में सहायक बनता है...पंचम आपके पूर्व जन्म के किस्सों का भाव है व गुरु इस भाव का यात्री है..इसी कारण तो अष्ठम मृत्यु के बाद कालपुरुष में पहला भाव नवम गुरु का भाव है...कालपुरुष में पंचम सूर्य का भाव है जो वंश परंपरा का घोतक है, आप असल में अपने पिता का ही डीएनए हैं..और पिता आपके दादा का डीएनए....तो असल में आप दादा का ही रूप हैं...आप पिता से अधिक अपने दादा के डीएनए हैं....इसीलिए सामान्यतः अनुवांशिक बीमारियां एक पीढ़ी छोड़कर अधिक प्रबल रूप से सामने आती है....पंचम भाव आपके लिए तय कर चुका होता है कि निकट भविष्य में क्या आपके लिए मारक प्रभाव लाने वाला है...अतः  मृत्यु कुंडली पंचम भाव को आधार रखकर करें तो बहुत से नए रहस्य सामने आते हैं.... ये षष्ठम रोग को व्यय करने वाला भाव है....अगर इसका रहस्य पकड़ आ गया तो शर्तिया जातक अटल मृत्यु को काटने की ताकत पा जाता है...आपने यूनानी कथाओं में फिनिक्स पक्षी का नाम सुना ही होगा...