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रविवार, 27 मई 2018

सीता की अग्नि परीक्षा

******* सीता की अग्निपरीक्षा*****
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                  हनुमान की आंखें मानो उस समुद्र को अपने भीतर समेट बैठी हैं,,जिस समुद्र का सीना लांघ माँ सीता के सर्वप्रथम दर्शनो का सौभाग्य हनुमान ने पाया था,,,वो समुद्र आज हनुमान के नियंत्रण से बाहर हो,,अश्रु के रूप में विद्रोह करने पर उतारू है..
                  विभीषण,,सुग्रीव,,अंगद,,,जामवंत,,मंदोदरी आदि सभी हतप्रद हैं.....राम अचानक ये कैसा आदेश दे बैठे हैं ....राम को जिसने भी निकट से जाना है,,जिसने उनके व्यक्तित्व की गहराई को बिना किसी तर्क वितर्क के आत्मसात किया है,,वो हर भक्त जानता है कि राम ने कभी धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण नही किया है....अंतर्मुखी स्वभाव राम का अवश्य है,,किन्तु अपने सिद्धांतों पर उन्हें किसी प्रकार का संशय नही है....ब्रह्मांड अपने नियम से विरुद्ध चल सकता है,,सूर्य की गणनाओं में भेद हो सकता है,,अग्नि अपना स्वभाव त्याग सकती है,,चंद्र अपने सिद्धांतों को भूलकर लक्ष्यहीन हो सकता है,,किन्तु राम के मुखारवृन्द से निकला  वाक्य,,कदापि धर्म विरुद्ध नही हो सकता.....नही कदापि नही...राम का पर्यायवाची ही धर्म का श्रेष्ठ आचरण है...राम हैं तो धर्म है....राम धर्म को धारण नही करते,अपितु धर्म राम को धारण करता है....अतः चूक होने की तो संभावना ही नही....
                 बचपन मे अन्य बहुत से भक्तजनों की मानिंद जब राम द्वारा भगवती सीता को अग्नि परीक्षा का आदेश मिलता है,,तो मेरा हृदय  अपनी गति का उल्लंघन करने लगता था...नही नही,,तुम ये आदेश कैसे दे सकते हो प्रभु.....तुम केकैयी के एक आदेश पर ,,अयोध्या के राजसिंहासन को ठोकर मार सकते हो,,,तुम सबरी के जूठे बेर सआनंद खा लेते हो,,,तुम माँ अहिल्या के अधिकार के लिए इंद्र की सत्ता को चुनौती देने का साहस रखते हो..तुम सीता के लिए रूपवती शूपर्णखा को ठुकरा सकते हो.....तुम माँ सीता की अग्नि परीक्षा की बात भी भला हृदय में कैसे ला सकते हो..कहीं लेखनी में तो ही त्रुटि नही हो गई लेखक के....राम ऐसा नही कर सकते..और मेरे राम तो स्वप्न में भी ऐसी अनहोनी नही सोच सकते.... पर तुम दे रहे हो आदेश सीता की अग्निपरीक्षा की..
                 ये सदा से ऐसा विषय रहा जिसपर मैं कतराने  का प्रयास करता रहा....कथा पंडालों में,,,मित्रों के मध्य,,,,मेरे पाठकों के द्वारा जब भी ये प्रश्न मुझसे किया गया,,मैं इसे टालने का प्रयास करता रहा हूँ....नही,,ये प्रश्न मुझे कभी रुचिकर नही लगा...ये मेरे राम की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाता है.....ये प्रश्न राम का व्यक्तित्व श्रेष्ठतम होने में अवरोध उत्पन करता है...कुतर्क करके इसका उत्तर मैं नही देना चाहता था...भला जो उत्तर मेरी आत्मा को मंजूर न हो,,वो मैं उस मित्र को,उस पाठक को कैसे दे दूं,, जो मेरे विवेक पर आंख मूंद कर विश्वास करता है....अतः बात को पलट देता रहा हर बार मैं... प्रश्न पर  सदा छिपता ही रहा हूँ..किन्तु ये  विश्वास सदा कायम रहा है कि राम कभी गलत नही हो सकते....
                       रात्रि शयन के पश्चात सुबह की वो बेला जब नींद अपने चरम पर होती है,,,जब मन सर्वाधिक शांत होता है,,,जब अरुण देव् अपने रथ के साथ सूर्यदेव के प्रांगण में उनके प्रस्थान के लिए खड़े हैं....तुम अचानक साक्षात मेरे नेत्रों में विराजमान हो गए राम....ये स्वपन है या कुछ और...तुम कोई भी लीला रचने में सक्षम हो स्वामी....पर मेरा बाल हृदय आज किसी नई लीला का साक्षी होने का अभिलाषी नही राम..बस मेरी शंका का समाधान करो मेरे आराध्य...मन्दबुद्धि लोग तुम्हारे चरित्र पर संशय करते हैं मेरे प्रभु....मैं उनके संदेह का निवारण नही कर पाता स्वामी.....
                  तुमने अग्निपरीक्षा का आदेश क्यों दिया राम...क्या वास्तव में तुम्हे माँ के चरित्र पर संदेह हुआ.....तुम्हे भगवती पर संदेह हुआ....जगतमाता को रावण दूषित कर सका होगा,,ऐसा भ्रम स्वप्न में भी तुम्हे नही रहा होगा,,ऐसा मेरा मन जानता है....फिर अग्निपरीक्षा क्यों रघुवीर....क्यों
               राम के अधरों पर वही मंद स्मित है,,जो उनकी सबसे निकट सहयोगिनी है..वही मुस्कुराहट,,जिसे देखकर भक्त अपना सब दर्द भूल ,,स्वयं को राम के चरणों मे समर्पित कर देता है....विरोध कभी भी तो नही किया तुमने.... हर आरोप,,हर छल को यूं ही मुस्कुरा कर ग्रहण कर लेते हो तुम सदा....विरोध करना अथवा स्वयं के कर्मो को परिभाषित करना,,तुम्हारा स्वभाव कभी भी तो नही रहा...किन्तु तुम्हारी मुस्कान का भेद जानने वाला अपने समस्त प्रश्नों का उत्तर स्वयं वहां पा लेता है...तुम मुस्कुरा रहे हो,,,,पूरब की लालिमा ,,सूर्यदेव के आगमन की घोषणा को आतुर है..अचानक पक्षियों का गूंजता कलरव मेरी तंद्रा तोड़ता है,,तुम वही मुस्कान अधरों पर धरे विदा लेते हो....सूर्यदेव के आगे चलने वाली किरणों ने रात्रि के तिमिर के साम्रज्य को छिन्न भिन्न कर दिया है...जनमानस के लिए नई आशाओं के सवेरे का उपहार लिए आकाश मे सूर्यदेव का आगमन हो रहा है....मेरे मानस पटल पर चढ़ा अंधकार भी धीरे धीरे विलुप्त हो रहा है......संशय की चादर ,,मेरे विवेक का त्याग कर रही है,,और मेरे आराध्य राम का नाम मेरे सर्वस्व को अपने आगोश में ले रहा है.....तुम्हारी मुस्कुराहट ने मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दे दिया प्रभु....मुझे क्षमा कर देना प्रभु,,,मैं तुम्हे समझने में बार बार असफल हुआ हूँ... बार बार तुम पर संदेह करता हूँ..
                           राम स्वयं श्रेष्ठ आर्य समाज के प्रतिनिधि हैं..उनका कुल,,उनका वंश सदा से धर्म आचरण में अग्रणी रहा है...किन्तु इतिहास साक्षी है,,,सभ्य अथवा दुर्दांत ,,कोई भी समुदाय रहा हो,,स्त्रियों को समाज की सबसे कमजोर कड़ी के रूप में माना जाता रहा गया है..वानरराज बाली को अपनी शक्ति दिखानी है तो अनुज सुग्रीव की स्त्री रूमा को जबरन हासिल कर लिया...लंकेश को अपने अपमान का परिमार्जन सीता में ही दिखाई दे रहा है...कालांतर में पांडवों से अपने द्रोह की शांति ,,दुर्योधन भरी सभा मे पांचाली को निर्वस्त्र करके करना चाहता है,,,,ब्रह्मांड ऐसे सैकड़ों उदाहरणों से भरा पड़ा है,,जब स्त्री,,, मात्र आपकी मिथ्या जिजीविषा को संतुष्ट करने का साधन मानी गई है...स्त्री आपका सम्मान है,,आपकी शक्ति की संकेतक है,,,,आपकी सनक को भुनाने के लिए सर्वाधिक सहज हासिल साधन नही है..
           किन्तु तुम तो राम हो न...स्त्री तुम्हारे लिए इन सब वर्जनाओं से ऊपर,,एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है..जिसकी अपनी स्वतंत्र विचारधारा है,,स्वतंत्र इच्छाशक्ति है,,,...आप जबरन स्त्री के देह को प्राप्त तो कर सकते हैं,,किन्तु उसकी देह को दूषित नही कर सकते,,,,आपका कुत्सित प्रयास उसके हृदय को प्रभावित नही कर सकता...उसके हृदय की वो अग्नि जो इस संसार को गतिमान किये हुए हैं,,किसी भी पुरुष की पहुंच उस पवित्र अग्नि तक नही हो सकती...इंद्र तुम माँ अहिल्या के विश्वास को खंडित तो कर पाए,,,किन्तु उनके सतीत्व को खंडित करना तुम्हारे सामर्थ्य में नही था...उनकी पवित्रता की सौगंध कालांतर में समस्त ब्रह्मांड में ली जाती रही हैं.....
               युद्ध समाप्त हो चुका है...विभीषण का लंका के सिंहासन पर राज्याभिषेक हो चुका है....अभी विभीषण को जीवनपर्यन्त रावण की स्त्री मंदोदरी के साथ निर्वाह करना है....क्या विभीषण मंदोदरी को वही सम्मान प्रदान कर पायेगा,,जिसकी वो अधिकारिणी है.....संशय के बादल ,मंदोदरी के नेत्रों में विचरते राम स्पष्ट देख चुके हैं....कितना विस्मय है कि यही बादल कुछ समय पूर्व रुकमा की आंखों में भी राम ने देखे हैं......जब बाली वध के पश्चात सुग्रीव अपनी स्त्री को प्राप्त कर रहा है,,तो स्वयं सुग्रीव के मन मे असमंजस स्पष्ट दृष्टिगोचर है...अभी लंका पर चढ़ाई हेतु समय बाकी है,,किन्तु इस समय काल मे सुग्रीव एक बार भी रुकमा को उस पवित्रता से नही जोड़ सका,,जिस सम्मान से बाली हरण से पूर्व वह अपनी स्त्री को हृदय से लगाता रहा है....पुरुष सदा से स्त्री को उसकी शक्ति नही अपितु सहनशक्ति के कारण प्रताड़ित करता आया है....किष्किंधा का आदिवासी समाज भी अब अपनी रानी रुकमा के प्रति स्वयं को आश्वस्त नही कर पा रहा है.....कितनी निरीह दृष्टि से रुकमा ने राम की ओर ताका था......तुमने तो अहिल्या तक को तार दिया रघुकुल भानु....मेरी अवस्था की ओर दृष्टि नही जा रही आपकी भगवन...मेरी सुध कब लोगे रघुपति..
               आज वही प्रश्न मंदोदरी की आंखों में उमड़ता देख रहे हैं राम....
            पता नही राम के अयोध्या लौटते ही वनों में रहने वाले ये नर(वानर),,और अपनी विलासता के लिए प्रसिद्ध ये असुर समाज रुकमा और मंदोदरी के साथ कैसा व्यवहार करेंगे.....नही ,,,कुछ तो  किया जाना आवश्यक है.....राम को यहां एक संकेत समाज के लिए देना ही होगा..जानते हैं भगवान कि समाज उनके इस निर्णय के पीछे की भावना से परिचित नही हो पायेगा...इतिहास के कई ग्रंथ उनके इस निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाएंगे....अनेकों लोग उन्हें स्त्री विरोधी घोषित करेंगे....किन्तु इस समय धर्म राम से इस निर्णय की मांग कर रहा है.....किन्तु सीता इसका क्या अर्थ लगाएंगी भला.....सीता का स्मरण होते ही पहाड़ का सा वजनी निर्णय,, राम के लिए पुष्प के समान भारहीन हो गया...सीता राम की अर्धांगिनी हैं....एक ही प्राणवायु दोनो के हृदय में स्पंदन उत्पन करती है...राम कभी सीता से इतर कुछ कहाँ सोच पाए हैं...तो क्या आज राम के इस निर्णय की वास्तविकता से सीता स्वयं परिचित नही होंगीं...नही नही,,सीता की ओर से राम को कोई समस्या नही है..वो देह अवश्य सीता कहलाती होगी ,,,किन्तु उस देह में जो प्राण है वो राम हैं...सीता ही राम है,,,राम ही तो सीता हैं.....
        अग्निपरीक्षा सीता की नही अपितु राम की है...आज राम का यह निर्णय इतिहास में स्त्रियों को सदा के लिए देवी तुल्य घोषित करेगा.....आज राम स्थापित कर देंगे कि स्त्री मात्र देह नही होती....उस देह के भीतर वास्तविक स्त्री होती है.....समाज स्त्री की देह का स्पर्श कर सकता है,,उस दिव्यता का नही जो जननी का आधार है,,,जिस दिव्यता के प्रताप से पानी की एक बूंद संतान का रूप प्राप्त कर लेती है....वो दिव्यता जो आदिकाल से इस ब्रह्मांड का संचालन करती आई है....नही भगवती सीता,,,आज तुम्हे सदा की भांति मेरे धर्म मे सहभागिनी बनना है..
            संसार को संचालित करने वाले राम ,,आज एक आदेश के द्वारा स्त्री की पवित्रता को तय करने वाला एक मापदंड निर्धारित करने का निर्णय ले चुके हैं ....एक सूत्र जो कलुषित विचारधारा के पुरुषों के लिए एक आदेश होगा...जो मापदंड युगों तक स्त्री को पवित्र घोषित करेगा....वो मापदंड जो तय करेगा कि स्त्री की पवित्रता को तय करने का कोई मापदंड नही हो सकता..वो सूत्र जो आदेश करेगा कि स्त्री की पवित्रता ,,पुरुष की स्वयं की पवित्रता पर निर्भर करती है....अपवित्र पुरुष को ही स्त्री अपवित्र ज्ञात होती है...प्राणों में पवित्रता रखने वाला पुरुष उसे हर अवस्था मे देवी के रूप में देखता है... अतः देह तो मात्र रूपक है स्त्री की विचारधारा का...
                  अग्निदेव  ने आगे बढ़कर सीता के चरणों को स्पर्श किया..भगवती मैं कृतार्थ हुआ...तुमने पुत्र को माँ की मर्यादा मापने का भार दिया....अपने सर्वश्रेष्ट रूप में अग्नि ने स्वयं को प्रस्तुत किया....वो संहारक नही,,अपितु पालक है...ये संसार की अज्ञानता है जो अग्नि को संहारक मानती है....अन्यथा जरा भी भान हो तो देखे कि हर प्राण में अग्नि ही जीव के जीवित होने का प्रमाण है...
             पवन पुत्र के आग्रह पर जब अग्निदेव ने लंका में अपना प्रचंड रूप प्रदर्शित किया था,,तब बहुत इच्छा के बाद भी माँ सीता के चरणों का स्पर्श अग्निदेव नही कर पाए....आज सौभाग्य स्वयं मानो द्वार पर चला आया है....आह....मेरे भाग्य,,,तूने मेरा होना सार्थक किया..भगवती ने अग्नि में प्रवेश किया....इतनी ही सहजता से जितना एक माँ अपने पुत्र के घर मे प्रवेश करती है..इतने ही अधिकार से,,जितना अधिकार एक माँ को अपनी संतान के वर्चस्व पर होता है....एक सुपुत्र की भांति अग्नि मानो आज सर्वस्व लुटाने को उत्सुक है माँ के आगमन पर...माँ के आंचल में ज्यों पुत्र खुशी से मचलता है,,,उसी भाव ने अग्नि को मानो आज स्वयं को प्रकट करने की स्वतंत्रता दे दी....चंद लकड़ियों का ढेर ,,सहज ही विकराल रूप में प्रज्वलित हो गया...लंका वासियों ने अग्नि को संहारक के रूप में ही देखा था...वानर तो खैर सदा से अग्नि से भयभीत होते आये हैं...चंद लकड़ी के टुकड़ों में सवार अग्नि ने ब्रह्मांड के दूसरे छोर का स्पर्श किया,,,आज मानो बालक माँ का आँचल त्यागने को तैयार ही नही....सीता नजरों  से ओझल हैं,,,,,सामने है तो मात्र स्वर्ग के द्वार तक को अपने लड़कपन से भयभीत करते अग्निदेव..सीता अग्नि में प्रवेश अवश्य कर गयी हैं,,किन्तु देह का ताप मंदोदरी को बढ़ता महसूस हुआ...यहां से कोसों दूर किष्किंधा में मानो रुकमा ने स्वयं को ताप से घिरा पाया...अग्नि के लपटें मानो किष्किंधा के राजमहल को आज रुकमा की पवित्रता का संदेश देने को आतुर हैं...महलवासियों ने स्वयं को भट्टी में तपता पाया..किष्किंधा के राजमहल में इस ताप से हाहाकार मच गया,,किन्तु कितना आश्चर्य कि जहां देवी रुकमा हैं,,वहां इस ताप का अब कोई असर नही...रुकमा ने भावुक होकर अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगा लिए.....प्रभु तुमने मेरी मूक प्रार्थना सुन ली न...अविरल अश्रुओं में मानो किष्किंधा के राजमहल के समस्त ताप को निस्तारित कर दिया हो...
           सीता अग्नि से बाहर कदम रखती हैं...आकाश से देवताओं ने मंदोदरी के चेहरे पर आए गर्व को स्पष्ट देखा...वो त्रिलोक विजयी रावण की अर्धांगिनी है..उस त्रिलोकविजयी को मोक्ष देने वाले विष्णु के अवतार ने लंका सहित समस्त ब्रह्मांड को मंदोदरी के स्वतंत्र होने का आदेश पारित कर दिया है..अब कोई मंदोदरी को उसकी इच्छा के विरुद्ध मजबूर नही कर सकता...स्त्री के मन की शक्ति ही उसकी पवित्रता है.....
      सुग्रीव ने स्वयं को मानो बहुत तुच्छ महसूस किया....जब से बाली की कैद से रुकमा को स्वतंत्र किया था,,तब से एक बार भी सुग्रीव का मन ,,रुकमा को उसका पुराना मान सम्मान नही लौटा पाया था...उसकी देह ही सुग्रीव को दिखाई देती थी..किन्तु उसके मन की पवित्रता से सुग्रीव आज तक अनिभिज्ञ था...किन्तु राम ने सीता को अग्निप्रवेश करा,,विश्व को ये संदेश दे दिया कि स्त्री को कभी उसकी शारीरिक अवस्था से न देखा जाय....स्त्री जननी है,,वो उस अग्नि की भांति है,,जिसके प्रभाव में आते ही समस्त पाप स्वयं होम हो जाते हैं,,किन्तु अग्नि  का कोई अहित नही कर सकता..ये वो गंगा है जो सदियों से पुरुष के प्रत्येक भाव को ,,एक माँ की भांति अपने अंदर पालती रही है...ये हमे जीवन देने वाली वो देह है जिसका विस्तार अग्नि की भांति धरती से आकाश तक है.....
          राम सीता को हृदय से लगाते हैं....तुमने मेरे धर्म की लाज रख ली जनकसुता...मुझे किंचित भी खेद नही कि मेरे इस आदेश को इतिहास में सदा मेरे विरुद्ध माना जायेगा...किन्तु तुम तो उस आस्था से परिचित हो न,,,जो इस निर्णय के मूल में है...अब वानर समाज रुकमा को हेय दृष्टि से नही देखेगा... अब राक्षस समाज मंदोदरी के सम्मान को ठेस नही लगाएगा....अब युद्ध मे विधवा हुई स्त्रियों को पुनः अपना नया जीवन ,,,अपनी इच्छा से ,,अपना मान सम्मान बरकरार रख जीने की स्वतंत्रता होगी.....उनकी देह उनके चरित्र की व्याख्या नही होगी...
            स्वयं के चरित्र पर संदेह की कालिमा उत्पन हो रही है,,,,ये जानकर भी राम धर्म निर्वाह में नही चूक नही कर सकते....तुम पुरुषोत्तम हो प्रभु...पुरुषों में सबसे उत्तम....

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         (Mothers Day के उपलक्ष्य में समर्पित ये लेख कल प्रकाशित करना चाहता था,,किन्तु समयाभाव से कल इसे पूर्ण नही कर सका....पाठकों की अदालत में इसे आज सुपुर्द करता हूँ..हार जीत का निर्णय पाठक के अधिकार में,,जो निर्णय होगा,,सहर्ष स्वीकार होगा.....प्रणाम..)

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