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रविवार, 27 मई 2018

ज्योतिष को जानें..

******* ज्योतिष को जानें****
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           .     ज्योतिष के विद्यार्थियों व शोधार्थियों को पुस्तकों में लिखे सूत्रों के साथ साथ ,,,अन्य कारकों पर भी समग्र दृष्टि रखनी चाहिए...गुरु अवश्य धारण करना चाहिए..बिना गुरु,,पुस्तकों के सूत्र मात्र किताबी आखर के समान व्यवहार करने लगते हैं..राहु भारी है,,शनि मारक है,,मंगल बिगड़ गया है,,,,,इन शब्दों ,,इन विचारों से ऊपर दृष्टि जाना असंभव हो जाता है,,,बिना गुरु के सानिध्य के.....
                   ज्योतिष आकाश से लेकर पाताल,,और पहाड़ों से लेकर समुद्र तक फैला पड़ा है...वृक्षों से लेकर कीट पतंगों पर इसका अधिकार है...कुछ सूत्रों को प्रदर्शित करने के लिए ,,पुरानी मान्यताओं का आधार भी ज्योतिषी को लेना पड़ सकता है....ज्योतिष व्यवहार से भी प्रदर्शित होता है,,व आंकड़ों से भी...बिल्ली के रास्ता काटने में भी ज्योतिष है,,,व घर के ऊपर से निकला परिंदा भी ज्योतिष के सूत्र बताता है....अतः एक ज्योतिषी को गणित,,इतिहास,,भूगोल,,,प्राणी विज्ञान,,,मनोविज्ञान,,वनस्पतिशास्त्र आदि की जानकारी रखना उतना ही आवश्यक है,,जितना एक वाहन चालक के लिए,,गेर,,ब्रेक,,एक्सेल,,तेल,,,हॉर्न,,, पंचर,,, स्पार्क प्लग की जानकारी होना....मात्र कुछ पुस्तक विशेष में पढ़कर बिना गुरु के ज्योतिषी बनना उस ड्राइवर के समान है ,,जो वाहन का ज्ञान मात्र चाबी लगाकर उसे स्टार्ट करने तक जानता है...इसके बाद के उपक्रमो की जानकारी के अभाव में,,वो वाहन को सड़क पर तो ला सकता है,,किन्तु इससे सड़क पर चल रहे अन्य लोगों के प्राणों पर कितना रिस्क है,,ये हमे भलीभांति ज्ञात है...इसी प्रकार नौ ग्रह और बारह भाव की कहानी सुनकर जो ज्योतिष की गाड़ी लेकर मैदान में उतर आते हैं,,वे कितने लोगों को कुचलेंगे,,इसका अंदाजा नही लगाया जा सकता...
                  अब मुख्य प्रश्न ये उठता है कि गुरु कौन है....सर्वप्रथम आपकी अंतरात्मा आपकी गुरु है...हृदय पर हाथ रखकर अपनी आत्मा से प्रश्न किया जाय,,कि क्या मैं वाकई ज्योतिषी होने के लायक हूँ,,, क्या मेरा अनुभव,,मेरा ज्ञान वाकई मुझे उस सीमा तक ले आया है,,जहां से मैं किसी जिज्ञासु को कोई सलाह देने की हालत में हूँ....
           दूसरा गुरु आपका विवेक है....क्या मैं वास्तव में ज्योतिष की उस रहस्यमय भाषा को ताड़ना सीख गया हूँ,,जिन गूढ़ चिन्हों में देवताओं ने इस शास्त्र को परिभाषित किया है....क्या कारण है कि ब्लड रिपोर्ट एक भाषा विशेष में प्रकाशित की जाती है,,,क्या कारण है कि कंप्यूटर को चलाने वाली भाषाएं जावा आदि विशेष चिन्हों द्वारा दिखाई गई हैं...क्या कारण है कि हवाई जहाज,, अथवा पानी के जहाज से संबंधी विज्ञान,,सामान्य से इतर अपनी एक अलग ही लिपि पर चलता है......क्या कारण है कि न्यायालय में बात को सीधे न कहकर,,दफ़ा 302,,दफ़ा 420,,,दफ़ा 512 आदि कोड वर्ड में की जाती है.....साधारण सा उत्तर है ,,कि आशा की जाती है कि भविष्य में इन क्षेत्रों में जिन लोगों द्वारा इस भाषा का उपयोग जन हित में किया जाय,,वो सामान्य ज्ञान से ऊपर का ज्ञान रखने वाले लोग हों...हर किसी की पहुंच से इसे दूर रखा जाय..मात्र वे ही इसका उपयोग कर पाएं ,,जो विषय विशेष में एक निर्धारित मापदंड का स्पर्श कर चुके हों.....अन्यथा खुद देखिये कि आठवीं -नवीं- दसवीं में पढ़ाए गए गणित के सूत्रों साइन थीटा,, कॉस थीटा,,,,,अथवा फिजिक्स में पढ़े न्यूटन के सिद्धांत,,आज हममे से किंतने लोग,,कहाँ उपयोग में लाते हैं.....
             सबको ज्ञान है कि बुखार में पैरासिटामोल खाया जाता है,,सिर दर्द के लिए डिस्प्रिन कारगर दवा है...किन्तु इतना ज्ञान होने से हम स्वयं को उस चिकित्सक के समकक्ष नही मान सकते,,जो इस विद्या को विधिवत गुरुओं द्वारा प्राप्त कर आज इस मुकाम पर है... अपनी गाड़ी का स्पार्क प्लग निकाल कर ,,साफ करके उसे वापस लगा देने की अपनी क्षमता के बल पर ,,,यदि हम स्वयं को एक मेकैनिकल इंजीनियर के बराबर उस विषय का जानकार मान बैठे हैं,, तो हम हंसी का पात्र हैं...कंपास,, एल्टीट्यूड ,,,ग्रेविटी,,,लैंड,,टेक ऑफ,, आदि कुछ शब्दों की जानकारी जैसे हमे पायलट नही बना सकती,, उसी प्रकार 9 ग्रह व 12 भाव और 27 नक्षत्र की रटन विद्या किसी को ज्योतिषी नही बना सकती.....
                    ... बिना गुरु के ज्ञान मात्र एकलव्य को प्राप्त हो सकता है,,सभी इस श्रेणी में नही आते...अतः गुरु आवश्यक हो जाता है,,अनिवार्य हो जाता है...तीसरा गुरु प्रकृति होती है..
                       हर धर्म,,जाति,,, सम्प्रदाय विशेष के अपने रिवाज़ होते हैं,,,अपनी अवधारणाएं होती हैं...अपने सिद्धांत होते हैं...इनका सीधा संबंध ज्योतिष से होता है..इन्हें जाने बगैर,,या कहें इनका अध्ययन किये बिना,,इन्हें नकारना,,इनका विरोध करना,,मनुष्य को उस बालक के समकक्ष खड़ा कर देता है जिसने "अ" से अनार का ज्ञान ही अभी प्राप्त किया होता है..."अ" से अविराम,,अवधूत,, अंजुमन,,,अवरोध बताते ही वह गलत गलत चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लेता है....उस मनुष्य के समान घोषित कर देता है,,जिसने कभी मोबाइल नही देखा था,,,अथवा जिसने अमेरिका के बारे में नही सुना था,,,या कहें जिसने आज तक  पानी को icecream का रूप लेते नही देखा हो.....
                         .बिल्ली का रास्ता काटना आपके लिए अंधविश्वास है क्योंकि आप प्राणीशास्त्र नही पढ़े हैं...जानवरो के व्यवहार के प्रति आप अज्ञानी हैं,,अतः कोई दूसरा यदि इस विषय पर बात कर रहा है तो वह आपकी दृष्टि में अज्ञानी है....बिल्ली आमतौर पर एक सुस्त प्राणी है,,,,कुछ समय विशेष के अलावा वह सामान्यतः एक कोने में पड़ा रहना पसंद करती है..यदि कभी वह आपके सामने से तेजी से निकल रही है,,तो बहुत संभव है वह सांप आदि किसी हानिकारक जीव जंतु के पीछे लगी हो,,,,ऐसे में वहां अन्य हानिकारक जंतुओं की उपस्थिति से इनकार नही किया जा सकता,,,अतः आपसे आशा की जाती है,,कि तनिक क्षण रुककर देख लें कि आपकी राह आपके व आपके बच्चों के लिए साफ है,,कोई विषैला जीव तो अचानक आपके पैरों से नही टकराने वाला....गाय व अन्य जानवर धरती के नीचे के कंपन को तीव्रता से भांपते हैं,,,,कहीं ऐसा तो नही कि वे अकारण,,असमय  रंभाकर,,भौंककर आपको कोई संदेश देने के प्रयासरत हैं....आपके इलाके से,,आपके निकट से अचानक सभी परिंदों का पलायन करना कहीं आपको सूचित तो नही कर रहा कि शीघ्र आपको पानी के उचित साधनों की व्यव्यस्था कर लेनी चाहिए आपके परिवार के लिए,,क्योंकि आगे अकाल की संभावना है....घर से निकलते समय परिवार के किसी सदस्य का अचानक छींक देना,,,कहीं उसके बीमार होने का सूचक तो नही.....बच्चे,,बुजर्ग कब बीमार हो जाएं,,और पता चले,,हम समय पर उनकी सेवा के लिए उपलब्ध न हो पाएं,,,, उससे पहले तनिक रुकिए,,जरा उस छींक को जांच लीजिये,,कोई बीमार तो नही घर मे....ये सब ज्योतिष के सहायक विषय हैं......
                                 प्रदेशों के ,,,जातियों के ,,,इलाकों के अलग अलग रिवाज हैं,,,अपनी अपनी सीमाओं के दायरे में....अपनी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कुछ नियम हैं,,,,ये सब ज्योतिष के नियमो के सहायक हैं.....गढ़वालो में जब दूर दूर बसे होने से,व यातायात के साधनों का अभाव होने से ,,,किसी विवाह,,,अथवा किसी भी भोज में कहीं निमंत्रण मिलता तो ,,गुड़ का बना मीठा भात पहले परोसा जाता....किन्तु आपके यहाँ तो मीठा अंत मे परोसा जाता है,,तो मीठा भात पहले परोसने वाले आपकी निगाह में देहाती गंवार हो जाते हैं......मीठा सदा खाने की तृप्ति प्रदान करता है....तीखे भोजन को पचाने के लिए शरीर को अधिक आराम की आवश्यकता होती है..अतः पहले मीठा परोस दिया जाता है ताकि आपकी भूख नियंत्रित हो जाय....आप बाद में मिलने वाला तीखा भोजन कम खाएं,,,,जिस कारण आपको असमय नींद का सहारा न लेना पड़े....आप दूर के अपने गंतव्य के लिए सही समय पर प्रस्थान कर सकें..वहीं विलासिता से भरे जीवन मे भोजन से पूर्व तीखा सूप आदि परोसने का रिवाज है,,,ताकि आपकी भूख खुल जाय,, आप डटकर भोजन करें,,व पश्चात तृप्ति के लिए कुछ मीठा खाएं,,,,,अब नींद भी बेहतर आएगी,,,,गलत कोई नही,,अकारण कुछ  नही..बस अपनी अपनी आवश्यकताएं,,,अपनी अपनी जरूरतें...
                                  इसी प्रकार अलग अलग स्थानों में बलि प्रथा संबंधी अपनी अपनी आवश्यकताओं के कारण अपने अपने रिवाज रचे गए......जिन जिन जानवरों की क्षेत्र में अधिकता व दैनिक जीवन में उनका कोई इनका कोई उपयोग न होकर,,,उल्टे समस्याएं ही उत्पन करना,,,उनकी बलि की व्यवस्था का कारण बनता गया.... क्योंकि आपके यहाँ ऐसे जानवर नही रहे,,और आपने उनके द्वारा अपना खेत चौपट होते नही देखा,,,तो बलि प्रथा आपके लिए गलत हो जाती है....अपने अपने स्थान विशेष की अपनी आवश्यकताएं होती हैं,,,उन्हें बिना महसूस किए,,बिना जाने विरोध करना ,,,,अक्लमंदी के दायरे में नही आ सकता..
                               आकाश से गुजरते पंछी,,आपके घर पर पड़ती आकाशीय नाकारात्मक ऊर्जाओं को विखंडित करने में सहायक होते हैं...आपको ज्ञात ही नही कि किंतने परिंदे ,,कब कब आकर उन नकारात्मक ऊर्जाओं को बाधित कर गए आपके लिए.....इसलिए छत पर आपको बाजरा,,,अनाज,,,दाने डालने की सलाह आपके ज्योतिषी द्वारा दी जाती है....अनाज की उपलब्धता परिंदों को आपके छत के ऊपर से निकलने को आमंत्रित करती है,,,,परिंदे आमंत्रित होते हैं तो छोटे मोटे कीट पतंगों ही नही अपितु कई बार बीमारियां फैलाने वाले चूहों व विषैले सर्प तक को अपना आहार बना लेते हैं.... ये सब ज्योतिष के विषय हैं....ज्योतिष आपकी दैनिक जीवनचर्या के साथ चलने वाला एक सिद्धांत है.....अलौकिक बातों से इसका कोई सरोकार नही...अब आपको इसका अर्थ नही पता तो आपके पंडित जी दकियानूसी,,और पाखंडी हो गए आपकी दृष्टि में....
             छत में कुत्ते का बांधना,, और उसका जोर जोर से रोना और भौंकना,,उन पंछियों की दिशा को बाधित करता है,,,इसी कारण आपका ज्योतिषी आपको बताता है कि कुत्ता राहु है व इसे अपने सिर पर न रखें,,अर्थात छत पर बंधा कुत्ता राहु की नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त करने में बाधक हैं.....आजमा के देख लीजिए पाठक वृंद,,, जहां जहां ऐसा होगा वहां वहां विपदाओं का आगमन होगा...पचासों बार आजमाया सूत्र है मेरा......उस घर का कोई सदस्य बड़ी बीमारियों,,चोटादि की चपेट में शीघ्र आते हैं..रोजगार व्यवसाय में अचानक हानि देखनी होती है .....जहां कुत्ता घर के भीतर रखा जाता है,,वहां रहने वाले स्त्री पुरुष जातकों के विवाह देर से होते हैं...कुछ का दामपत्य उचित नही रह पाता...भैरव ,,,मंदिर से बाहर के रक्षक देवता हैं,,,इन्हें आप भीतर नही रख सकते..
                 बहुत सी ऐसी बातें हैं,,जो अनुभव की कमी से हमें व्यर्थ प्रतीत होती हैं....भारत सामान्यतः एक गर्म देश है..नाभकीय कक्षाओं से सूर्य का भ्रमण अधिकतर दक्षिणी कोण से यहां होता है.....अतः मकान बनाते समय यथासंभव दक्षिण मुखी मकानों से परहेज रखा जाता है...ताकि दिनभर के सूर्य के ताप से बचाव हो सके......ये जियोग्राफी( भूगोल )के अंतर्गत आने वाला विषय है....अब अगर आपने जॉग्रफी का अध्ययन नही किया है ,, तो आपको यह सलाह देने वाला गणक मूर्ख है आपकी दृष्टि में......
                               अगर आप फिजिक्स (भौतिक) के विद्यार्थी रहे हैं तो नाभकीय विद्युत ऊर्जा से होने वाले नुकसान के विषय मे आपने अवश्य पढ़ा होगा.....बड़ी बड़ी इमारतों में सिविल इंजीनियर  ताडिचालक द्वारा अर्थिंग का कनेक्शन जमीन के भीतर डालते हुए आपने अवश्य देखे होंगे...अब संभवतः आपको आपके पंडित जी द्वारा मकान के वास्तु के रूप में चांदी के नाग,,और तांबे का लोटा ,,बुनियाद के एक कोने में दबाने का अर्थ ज्ञात हो रहा हो....ये अर्थिंग है भैया उस समयकाल की...
                         ज्योतिष में पारंगत होने के लिए एक भाषा विशेष की कुछ पंक्तियां रटने की आवश्यकता नही है मित्रों......रोजमर्रा के जीवन मे घटित होने वाली घटनाओं पर समग्र दृष्टि रखने से,,,,प्रत्येक घटना को अपना गुरु मानने से,,व नित एक जिज्ञासु छात्र बने रहने से ,,आप इस विद्या पर नियंत्रण पाते हैं...अतः निरंतर कुछ नया सीखने हेतु तत्पर रहें....नही ज्ञात इसलिए किसी बात का विरोध करना ही बुद्धिमत्ता नही कहलाती मित्र.....
               आशा है पाठक सहमत होंगे...एक लेख के लिए,,, लेखक अपने सारे कार्य त्याग इस लालच में अपना समय लगाता है कि अपने पाठक से वाहवाही प्राप्त करे....पाठक की तालियां सुबह से खाली पेट बैठे आपके लेखक के लिए अमृत रस समान हैं...आपकी टिप्पणी रूपी अमृत बूंदें मुझमें भी प्राण संचार करेंगी...इसी आशा मे .............आपका अपना.........

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