आज फिर से बात करता हूँ उस ग्रह की जिस के बारे में ज्योतिष में सबसे कम
जिक्र होता है.यानि की बुध .नाम के ही अनुसार बुध वाणी और बुद्धि का
प्रतिनिधि ग्रह माना गया है.चीजों को बैलेंस करने का कार्य बुध ही करता
है.रोगों का इलाज भी बुध ही के पास होता है.बुध की तासीर गर्म होती है.यह
सूर्य के सर्वाधिक नजदीक का ग्रह है,अततः सूर्य के प्रभाव में सबसे ज्यादा
रहता है व जाहिर तौर पर सूर्य की गर्मी को सबसे ज्यादा सहन करता है.
शरीर में श्वांस
का कारक बुध ही है.गुरु शरीर में प्राण डालता है,किन्तु उन प्राणों को चलाने
वाली वायु का कारक बुध ही है.प्राण को जीवित रखना बुध ही का कार्य है.देखा
होगा आपने की सूर्य की रौशनी में पौधों द्वारा अपना भोजन बनाने की
प्रक्रिया( जिसे की विज्ञान की भाषा में फोटोसिन्थेसिस कहते हैं )के साथ
साथ हरे रंग के पौधे आक्सीजन पैदा करने का कार्य भी करते हैं.इस दौरान वो
बुध ग्रह से प्राप्त रश्मियों को अपने पत्तों द्वारा सोख कर तने की सहायता
से पौधे के अन्दर भेजते हैं.हरे रंग के पत्ते पौधे की त्वचा हैं.इसी प्रकार
शरीर में त्वचा को बुध से जोड़ा जाता है.त्वचा से सम्बंधित सभी समस्याएं
बुध से जुडी मानी जाती हैं.ध्यान दें की रात के समय पेड़ों के नीचे सोने से
मना करने का अर्थ यही होता है की रात में पौधों को बुध की सहायता प्राप्त
नहीं होती प्राण वायु बनाने हेतु.
बुध की मिथुन राशि पर सूर्य के आते ही गर्मी अपने चरम पर पहुँच जाती है,व सूर्य के चंद्रमा की जलीय राशि पर आते ही भरपूर बरसात होने लगती है.(ऋतुओं का संवाहक सूर्य ही है.)अपनी राशि पर प्रवेश कर सूर्य धरती में समा रहे जल को अपनी प्रचंड गर्मी से खराब कर उसमे विकृतियाँ पैदा करने लगता है.(जरा गौर करें की इन दिनों पानी से होने वाली बीमारियाँ बढ जाती हैं.)व सूर्य के फिर से बुध की कन्या राशि पर आते आते त्वचा से सम्बंधित रोगों में बेतहाशा वृधि हो जाती है
बुध प्राण वायु का संवाहक है.इसी कारण अस्पतालों में आपरेशन आदि के समय डाक्टरों द्वारा हरी चादरों ,हरे मास्क आदि का उपयोग किया जाता है.यहाँ वे जाने अनजाने बुध के प्रभाव को ही बढाने का प्रयत्न करते हैं.क्योंकि उनका मुख्य मकसद रोगी के प्राणों की रक्षा करना ही होता है.साथ ही बुध चीजों को बैलेंस करने का कार्य करता है. किसी भी शल्य क्रिया के दौरान मुख्य रूप से दो ग्रह ओपरेट करते हैं.एक उग्रता और जल्दबाजी देने वाला रक्त का कारक मंगल व एक चीड फाड़ का कारक शनि. आप्रेसन में यदि मंगल अधिक प्रभावी हुआ तो चिकित्सक जल्दबाजी में गलत निर्णय ले सकता है और यदि शनि प्रभावी हुआ तो आपरेशन में जरुरत से ज्यादा समय लग सकता है,दोनों कारणों से रोगी की जान के लाले पड़ सकते हैं ,इस अवस्था को नियंत्रित करने के लिए हरे रंग की वस्तुओं यानि बुध के प्रभाव को ही उपयोग में लाया जाता है.ध्यान दें की लाल रंग में यदि काला मिला दिया जाय तो हरा रंग ही बनता है.बरसात के मौसम में जब हरियाली अपने चरम पर आ जाती है तो बुध पूर्ण प्रभावी होकर त्वचा से सम्बंधित रोगों को फ़ैलाने लगता है.
बुध जब भी वक्री होता है अर्थात धरती के अधिक नजदीक होता है तो आप यकीन मानिए उस दौरान पैदा होने वाले जातकों को सांस से सम्बंधित रोग जैसे अस्थमा आदि होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा होती हैं.त्वचा के रोग ऐसे लोगों को अधिक होते हैं.बरसात के मौसम में जब चारों तरफ हरियाली ही हरियाली होती है तो अस्थमा के रोगियों की समस्या बढ़ जाती है.जिस दिन भी दोपहर में बादल लग जाते हैं तो बुध से आने वाली रश्मियाँ पूरी तरह से धरती पर नहीं पहुँच पाती व पौधों द्वारा प्राणवायु(ऑक्सीजन) के निर्माण में कमी आ जाती है.परिणामस्वरूप रक्तचाप के मरीजों व अस्थमा के मरीजों की समस्या बढ़ जाती है.आज समझ में आता है की सालों पहले मेरे पूज्य दादाजी क्यों आसमान में बादल देखते ही बैचैन होने लगते थे.क्यों उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगती थी.
पौधों में सबसे ज्यादा पारा तुलसी के पौधे में पाया जाता है.इसी कारण बुध के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए तुलसी की सेवा की जाती है.तुलसी के पौधे के संपर्क में आप जितना ज्यादा रहते हैं अस्थमा की समस्या में उतनी राहत पाते हैं.तुलसी की चाय पीने से सांस पर किसी भी प्रकार का अवरोध पैदा कर रहा कफ़ बलगम आदि तुरंत समाप्त हो जाता है.तुलसी का लेप सभी प्रकार की त्वचा की बीमारियों पर राहत पहुँचाने का काम करता है.इसलिए आमतौर पर आपने बुध की शांति हेतु पंडित जी को तुलसी पर जल चढाने की सलाह देते सुना होगा.वाणी पर नियंत्रण होने के कारण जब भी बुध दूषित होता है तो तोतलापन ,या किसी विशेष शब्द के उच्चारण में असुविधा जातक में देखी जा सकती है.तो देखा आपने जिस ग्रह को सबसे कम महत्ता प्राप्त है वो ही वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है.
शास्त्र बुध के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए हरी वस्तुओं का दान व पन्ना धारण करने की सलाह देता है.बुआ की सेवा करना भी बहुत लाभकारी माना गया है. जानवरों को हरा चारा ,चिड़ियों को हरे मूंग की दाल आदि देने का चलन काफी पुराना है.
बुध की मिथुन राशि पर सूर्य के आते ही गर्मी अपने चरम पर पहुँच जाती है,व सूर्य के चंद्रमा की जलीय राशि पर आते ही भरपूर बरसात होने लगती है.(ऋतुओं का संवाहक सूर्य ही है.)अपनी राशि पर प्रवेश कर सूर्य धरती में समा रहे जल को अपनी प्रचंड गर्मी से खराब कर उसमे विकृतियाँ पैदा करने लगता है.(जरा गौर करें की इन दिनों पानी से होने वाली बीमारियाँ बढ जाती हैं.)व सूर्य के फिर से बुध की कन्या राशि पर आते आते त्वचा से सम्बंधित रोगों में बेतहाशा वृधि हो जाती है
बुध प्राण वायु का संवाहक है.इसी कारण अस्पतालों में आपरेशन आदि के समय डाक्टरों द्वारा हरी चादरों ,हरे मास्क आदि का उपयोग किया जाता है.यहाँ वे जाने अनजाने बुध के प्रभाव को ही बढाने का प्रयत्न करते हैं.क्योंकि उनका मुख्य मकसद रोगी के प्राणों की रक्षा करना ही होता है.साथ ही बुध चीजों को बैलेंस करने का कार्य करता है. किसी भी शल्य क्रिया के दौरान मुख्य रूप से दो ग्रह ओपरेट करते हैं.एक उग्रता और जल्दबाजी देने वाला रक्त का कारक मंगल व एक चीड फाड़ का कारक शनि. आप्रेसन में यदि मंगल अधिक प्रभावी हुआ तो चिकित्सक जल्दबाजी में गलत निर्णय ले सकता है और यदि शनि प्रभावी हुआ तो आपरेशन में जरुरत से ज्यादा समय लग सकता है,दोनों कारणों से रोगी की जान के लाले पड़ सकते हैं ,इस अवस्था को नियंत्रित करने के लिए हरे रंग की वस्तुओं यानि बुध के प्रभाव को ही उपयोग में लाया जाता है.ध्यान दें की लाल रंग में यदि काला मिला दिया जाय तो हरा रंग ही बनता है.बरसात के मौसम में जब हरियाली अपने चरम पर आ जाती है तो बुध पूर्ण प्रभावी होकर त्वचा से सम्बंधित रोगों को फ़ैलाने लगता है.
बुध जब भी वक्री होता है अर्थात धरती के अधिक नजदीक होता है तो आप यकीन मानिए उस दौरान पैदा होने वाले जातकों को सांस से सम्बंधित रोग जैसे अस्थमा आदि होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा होती हैं.त्वचा के रोग ऐसे लोगों को अधिक होते हैं.बरसात के मौसम में जब चारों तरफ हरियाली ही हरियाली होती है तो अस्थमा के रोगियों की समस्या बढ़ जाती है.जिस दिन भी दोपहर में बादल लग जाते हैं तो बुध से आने वाली रश्मियाँ पूरी तरह से धरती पर नहीं पहुँच पाती व पौधों द्वारा प्राणवायु(ऑक्सीजन) के निर्माण में कमी आ जाती है.परिणामस्वरूप रक्तचाप के मरीजों व अस्थमा के मरीजों की समस्या बढ़ जाती है.आज समझ में आता है की सालों पहले मेरे पूज्य दादाजी क्यों आसमान में बादल देखते ही बैचैन होने लगते थे.क्यों उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगती थी.
पौधों में सबसे ज्यादा पारा तुलसी के पौधे में पाया जाता है.इसी कारण बुध के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए तुलसी की सेवा की जाती है.तुलसी के पौधे के संपर्क में आप जितना ज्यादा रहते हैं अस्थमा की समस्या में उतनी राहत पाते हैं.तुलसी की चाय पीने से सांस पर किसी भी प्रकार का अवरोध पैदा कर रहा कफ़ बलगम आदि तुरंत समाप्त हो जाता है.तुलसी का लेप सभी प्रकार की त्वचा की बीमारियों पर राहत पहुँचाने का काम करता है.इसलिए आमतौर पर आपने बुध की शांति हेतु पंडित जी को तुलसी पर जल चढाने की सलाह देते सुना होगा.वाणी पर नियंत्रण होने के कारण जब भी बुध दूषित होता है तो तोतलापन ,या किसी विशेष शब्द के उच्चारण में असुविधा जातक में देखी जा सकती है.तो देखा आपने जिस ग्रह को सबसे कम महत्ता प्राप्त है वो ही वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है.
शास्त्र बुध के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए हरी वस्तुओं का दान व पन्ना धारण करने की सलाह देता है.बुआ की सेवा करना भी बहुत लाभकारी माना गया है. जानवरों को हरा चारा ,चिड़ियों को हरे मूंग की दाल आदि देने का चलन काफी पुराना है.