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शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

सीता की अग्नि परीक्षा

सभी पाठकों को सादर नमस्कार। आज बहुत दिनों बाद आप सब से मुलाकात का सौभाग्य मिला। आशा है प्रभु की कृपा आप सभी पर होगी ।कई बार जिज्ञासुओं व आम सामान्य जन के मन में भी ये प्रश्न आता है की आखिर सीता जी की अग्नि परीक्षा का क्या कारण था और सदा अपने चरित्र के द्वारा मनुष्य मात्र को मर्यादाओं का पाठ पढ़ाने वाले अवध के राजा,ब्रह्माण्ड नायक प्रभु राम भला इस के द्वारा क्या सन्देश आम जन को देना चाह रहे थे?राम के अस्तित्व व राम के चरित्र की व्याख्या करने वाले भी कई बार इस प्रश्न पर उलझते दिखाई देते हैं ।
  प्रश्न सर्वप्रथम ये उठता है की हम सीता जी के विषय में कितना जानते हैं ।कई स्थानों पर तलाशने के बावजूद कहीं भी सीता जी की जन्म तिथि का अंदाजा नहीं हो पाता। रामायण के कई रूप उपलब्ध हैं ।कहा भी  गया है "नाना नाना भांति राम अवतारा -रामायण सतकोटि अपारा" कई किस्से हैं ,कई लोकोक्तियाँ हैं ,कई ग्रन्थ हैं जो इस महानतम ग्रन्थ का बखान करते हैं ।
    श्रेष्ट ब्राह्मण व महान क्षत्रिय के सम्मिलित रूप को अगर एक साथ लें तो रावण का किरदार एक सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में प्राप्त होता है ।जैसा की विदित है उस समय विशेष में सुरों व असुरों में युद्ध होते रहते थे ।समय के साथ साथ रावण अपनीं विद्या के प्रयोगों द्वारा नए नए अविष्कार करने लगा तथा इस प्रकार शक्तियां प्राप्त करते करते आखिरकार वो देवताओं से  बली हो गया व समस्त ब्रह्मांड को अपने अधिकार में करने के प्रयास करने लगा ।यहाँ रावण का उदय एक महान वैज्ञानिक के रूप में हमारे सामने आता है। ब्रह्माण्ड विजय के अपने सपने को पूरा करने हेतु रावण को आवश्यकता थी की संसार की सात्विक शक्तियों पर भी उसका नियंत्रण हो ।फलस्वरूप अपने उदेश्य की पूर्ति के लिए उसने एक प्रयोगशाला का निर्माण किया ,जहाँ वह अपने सगे भाई कुम्भकर्ण की सहायता से सात्विक मनुष्यों के रक्त से   ऐसे मनुष्यों के निर्माण हेतु प्रयासरत हो गया जो पूर्ण रूप से सात्विक प्राण हों किन्तु रावण की रचना होने के कारण उन पर अधिकार मात्र रावण का ही हो ।कुम्भकर्ण ,जैसा की नाम से ही ज्ञात हो जाता है  अपने समय का कुम्भ यानी घड़े आदि  के  द्वारा नए अविष्कारों के लिए
विख्यात था ।इन घडो कुम्भों को आज हम परखनलियों टेस्ट ट्यूबों आदि प्रयोगशालाओं में उपयोग होने वाले उपकरणों के रूप में जानते हैं ।धरती पर एक अज्ञात स्थान पर बनी इस प्रयोगशाला में कुम्भकर्ण देवताओं की नजर से बच कर लगभग 6 महीने अपने प्रयोगों में व्यस्त रहता था ,जिसे जानकारी के अभाव में हम उसका शयन काल मानते आए हैं ।
                 रावण के भेजे सैनिक इस प्रयोग हेतु दूर उत्तर दिशाओं की तरफ तपस्याओं में लिप्त साधुओं का रक्त जमा कर लाते थे ।संभवतः इस प्रयोग में उनके शरीर की अणु या कुछ अन्य हिस्सों का उपयोग भी होता हो ,जिसे शरीर विज्ञानं से जुड़े लोग बेहतर परिभाषित कर सकते हैं ।
             इंद्र आदि सभी देवताओं को आभास तो होने लगा था की रावण किसी ऐसे आविष्कार में जुटा हुआ है जिससे उसकी शक्ति अपराजित हो जायेगी। किन्तु उसका यह आविष्कार हो कहाँ रहा है ,अथवा उसकी प्रयोगशाला धरती पर कहाँ है इस पर अभी तक भी संशय था ।इसी बीच संसार के महान वैज्ञानिक। द्वारा अपनी महानतम खोज हो चुकी थी ।रावण अपनी प्रतिभा की सीमाओं का परिचय खुद को तो दे ही चूका था और अब संसार उसके अविष्कार से अचंभित होने वाला था ।
     ऋषि मुनियों के शरीर से प्राप्त उर्जाओं से रावण अपनी गुप्त प्रयोगशाला में एक ऐसे परखनली शिशु का निर्माण कर चुका था जिसका बाद में हम जन्म घड़े से हुआ सुनते आये हैं। सुबुद्ध पाठक ताड़ गए होंगे की मेरा संकेत किधर जा रहा है ।यहाँ चाहें तो अपनीं कल्पना को थोड़ी छूट देकर आप इसमें कुम्भकरण का रोल तय कर सकते हैं ।यही कारण है की खोज कर भी सीता की जन्म तिथि प्राप्त नहीं होती व अधिकतर कथाकारों ने इस विषय पर चतुराई भरा रास्ता तय किया ।
                  कारण कुछ भी रहा हो किन्तु आखिरकार देवताओं को  इस की खबर लग ही गयी व उन्होंने धरती पर इस प्रयोगशाला का पता लगा ही लिया ।जी हाँ पाठक वृंद आप बिलकुल सही अंदाजा लगा रहे हैं,यह कहीं  और नहीं अपितु राजा जनक की नगरी मिथिला में थी ।जनक जो स्वयं बड़े प्रतापी राजा थे व अवध नरेश दशरथ के विपरीत सुरों -असुरों के झगडे  में सम बने रहते थे ।दशरथ जी के विषय में तो कई बार प्रमाण मिलता है की वो देवताओं की तरफ से युद्ध हेतु जाते थे ।देवताओं ने जनक को बहुत कहा की रावण की इस प्रयोगशाला को नष्ट करें ,किन्तु जनक ने उनकी एक न सुनी । वर्षा रोककर इंद्र देव ने आखिरकार जनक को उनका कहा मानने के लिए मजबूर कर दिया ।तीन वर्षों तक अपनी प्रजा को पानी के लिए तरसता हुआ जनक न देख सके। उन्होने देवों को अपने राज्य में आकर रावण के सपने ,उसके मंसूबों पर आघात करने का मौका दे दिया किन्तु इस बीच रावण द्वारा किये गए उसके अविष्कार को समाप्त होने से बचा लिया ।जिसे बाद में धरती से प्राप्त होना बताया ।कालान्तर में पाठक अंदाजा लगा सकते हैं की क्यों आखिर सीता को धरती की गोद में समाना बताया गया ।जाहिर तौर पर वह सामान्य। मनुष्य नहीं थी तो सामान्य मृत्यु उन्हें प्राप्त नहीं थी ।सीता नाम से कुम्भ राशि का ही संकेत प्राप्त होता है (आखिर कुम्भ की ही तो संतान थीं वो )कुम्भ की होकर उन्होंने अपने लिए सप्तम दाम्पत्य भाव पर सूर्यवंश की राशी का चयन किया ,ऐसा प्रमाण स्पष्ट है ।
                        देवताओं ने रावण की प्रयोगशाला को नष्ट कर दिया व रावण स्वयं के अविष्कार को भी इसी में समाप्त मान चुका था ।वर्षों पश्चात जनकपुरी में स्वयंवर का आयोजन हुआ ।रावण भी मेहमान के रूप में इस आयोजन में उपस्थित था ।सीता को देखते ही रावण की ऑंखें सहसा इस दृश्य पर विश्वास न कर पाई।। भला कोई रचियता अपनी कृति को देखकर पहचानेगा नहीं ।ये धोखा था,उसका प्राण दिया हुआ जीवन आज कोई और कब्जाए बैठा था ।शायद कई बार पाठकों ने सीता को रावण की पुत्री के रूप में कथाओं में जाना होगा ।कृति का रचनाकार ही तो आखिर उसका वास्तविक जनक होता है ना ।
       यहीं से रावण ने प्रण किया की जैसे भी हो मुझे सीता वापस चाहिए ।जनक के सामने कुछ न कर पाया रावण सही मौके की तलाश में लग गया ।इस समय काल में अवध में राम के जन्म की दैवीय घटना घट चुकी थी ।कालान्तर में स्वयं राम इसी विद्या के पारंगत हो चुके थे जिस के द्वारा रावण ने सीता का निर्माण किया था ।इतिहास अभी बनना बाकी था ......
           शीर्षक को पूरा अगले भाग में किया जाये ऐसा प्रयास करूँगा ।किन्तु निर्भर पाठकों के रुझान पर ही है,ऐसा तय माने ।...फिलहाल इजाजत दें ।नमस्कार।
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