शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

कृष्ण

...(पूर्व में यह लेख दो भागों में प्रकाशित हुआ था,,पाठकों का आग्रह था कि इसे एक ही जगह उपलब्ध कराएं ,जिसे लय बनी रहे...अतः दोनो भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ)

******  कृष्ण का वचन*****
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    घोड़ों की रास स्वयं मधुसूधन के हाथों में थी.....मुंह से सफेद फेंन गिराती अश्व टोली इस बात से भलीभांति वाकिफ थी कि ब्रह्मांड के सर्वोत्तम सारथी के हाथ जब भी रथ की रास आती है,,तो समुद्र को भी अपना स्थान त्यागना होता है.......सूर्य की किरणें भी केशव के रथ की गति के आगे नतमस्तक होती हैं....वायु के दूत भी उस रथ की गति से पराजित हो,,स्वयं को लाचार पाते हैं,,,..
             सामान्यतः तीव्र गति से रथ भगाने के अभ्यस्त कृष्ण के अश्व आज पहली बार कॄष्ण के शब्दों की ललकार को  अपनी पीठ पर चाबुक के स्पर्श के समान महसूस कर रहे हैं... पशु मूक सही,,अपनी भावनाओं को बता पाने में असमर्थ सही,,, किन्तु स्वामी के नेत्रों की भाषा को सहज समझता है....उसके हाथों के स्पर्श के स्पंदन की कहानी जानता है....कृष्ण के हृदय की धौंकनी मानो नगाड़े की गूंज बन अश्वों को संकेत दे रही थी कि आज दौड़ निर्णायक है....आज स्वामी का सम्मान दांव पर है...आज द्रौपदी को दिए वचन को निभाने की घड़ी है....आज कृष्ण के वचन की कीमत तय   होनी है....और कृष्ण को निकट से जानने वाले सभी जानते हैं कि कालांतर में अर्जुन को दिए अपने वचन के निर्वाह हेतु,,,प्रकृति के सिद्धान्त के विपरीत जाकर भी वासुदेव ने सूर्य पर ग्रहण तक लगाया है...और आज प्रश्न एक स्त्री की अस्मिता का है....उसके अभिमान का है...
       द्रौपदी के भेजे दूत से कल रात्रि ही कृष्ण को कुरु सभा मे होने वाले चौसर के खेल का संकेत मिल चुका है....और संदेश प्राप्त होते ही कृष्ण का मन अनहोनियों की आशंका से उन्हें चौकन्ना कर चुका है....बिना एक पल गंवाएं तब से कृष्ण कुरु सभा पहुंचने को छटपटा उठे हैं,,रात्रि में ही उन्होंने रथ को हस्तिनापुर के मार्ग पर डाल दिया है...
           कृष्ण के होठों की ललकार ने जैसे पीठ पर पुनः चाबुक की चोट की हो....जानवर ने स्वामी के हृदय की वेदना को महसूस किया,और अपना सर्वस्व देकर भी आज ऋणमुक्त होने का संकल्प लिया...घोड़ों के पैरों में ज्यों बिजली कौंधती हो....पदचापों की गड़गड़ाहट कुरु साम्राज्य के समाप्ति की घोषणा में मानो ,,विजयी ढोल नाद की भांति तांडव करती हो....
            इंद्रप्रस्थ में पांडवों के समारोह में अपमानित दुर्योधन के नेत्रों की ज्वाला ,भविष्य में क्या परिणाम प्रस्तुत कर सकती है,,ये अंदाजा लगाना कृष्ण के लिए कोई बड़ा भेद नही था.....राजा युधिष्ठर चौसर के जुए के लिए हामी भर देंगे,, ये विश्वास कर पाना कठिन था.....किन्तु कहते हैं न कि "प्रभु जाको दारुण दुख दीना,,,ताकि मति पहले हर लीना".......युधिष्ठर तो अपना विवेक यह प्रस्ताव स्वीकार करते ही त्याग चुके हैं......किन्तु दुर्योधन के पास तो कभी विवेक रहा ही नही है...और  अपमान की आग में झुलसता हुआ विवेकहीन दुर्योधन ,,,,अपने बल के अहंकार व पांडवों को लज्जित करने की अपनी जिद में मानवता के समस्त नियम  बिसरा सकता है ,,इसमे कृष्ण को कोई संदेह नही...
                  रोहिणी नक्षत्र के अधिपति चंद्रदेव ने ,,मनुष्य लीला करते अपने स्वामी का पथ प्रदर्शन करने हेतु स्वयं आगे बढ़कर आज अपनी निशा यात्रा का संचालन किया...अचानक से जंगल की शांति को भंग करते हुए ,,मयूरों ने शोर मचाना आरम्भ कर दिया...अपने मार्ग से गुजरने वाले कृष्ण के घोड़ों की पदचाप ,कोसों दूर राह मे रात्री विश्राम करते नीले नागान्तकों के लिए,,, माथे पर मोर मुकुट के रूप में ब्रह्मांड का ताज धारण करने वाले चक्रवर्ती के आगमन की घोषणा है....ऐसा चक्रधारी जिसके मोरमुकुट के आगे इन्द्र का सिंहासन तुच्छ जान पड़ता है...जिसके गले मे पड़ी मोती की माला का एक एकलौता मोती ही,,कुबेर के खजाने को लज्जित करने में सक्षम है....और जिसके पीताम्बर की आभा स्वर्ग की अप्सराओं के वैभव तक को क्षीण कर देती है......
       कृष्ण के ललाट पर तनाव विद्युत तरंगों के समान रह रह कर  चिंगारियां में परिवर्तित हो रहा है...प्रकृति इस तनाव का भार झेलने की अभ्यस्त नही है....तनाव की रेखा तो केशव के ललाट पर तब नही उभरी,,जब कालिया नाग का मानमर्दन उन्होंने किया...इन्द्र की सत्ता को चुनौती देते हुए गोवर्धन उठा लेने वाले कृष्ण के अधरों पर तब भी स्मित ही था..फिर आज ये अनहोनी क्यों?? इस तनाव  का भार वहन करने के लिए शेषनाग ने  अपने फन पर टिकी वसुंधरा को व्यवस्थित किया....वाराह ने अपने नुकीले खुरों पर अपना आधिपत्य पुनः जांचा....निकट भविष्य में ब्रह्मांड को अचंभित कर देने  वाली कोई घटना अपनी रूपरेखा रच रही है,,इसका आभास धरती के इन दोनो भारवाहकों को सहज ही हो गया है...
   अश्वों के खुरों के कोने लगातार दौड़ते रहने से अब रक्ताभ होने लगे हैं,,किन्तु उनकी गति में कोई स्थिलता नही दिखाई पड़ती....कृष्ण के हृदय की ज्वाला,, स्वयं अश्वों के नेत्रों से रक्तपुंज के रूप में टपकने को आतुर है...नीले वन पक्षी कृष्ण की देह के ताप से विचलित हो रहे हैं... उनके फड़फड़ाते पंख रात्रि के घने वन में अजीब सा भयभीत कर देने वाला शोर उत्पन कर रहे हैं....नीले मयूरों का रात्रि में जागना शुभ संकेत नही है...अष्ठम कालरात्रि के अधीष्ट ,,,नीले रंग की आभा वाले सांवले कृष्ण और नीले नागान्तकों का समवेत कोप मानो आज कुरुवंश पर लगने वाले ग्रहण का संकेत है...
                        प्रातः की पहली किरण के साथ ही कृष्ण ने हस्तिनापुर की सीमा का स्पर्श कर लिया....
                 कुरु सभा मे लगती एक एक बाजी ,,सभ्य समाज के मुंह पर एक एक करारे तमाचे के समान थी....ईर्ष्या जब जब अपनी सीमाओं का अतिक्रमण  करती है ,,तब तब मनुष्य के भीतर बसा जानवर बाहर आने लगता है....गिरने की कोई सीमा नही होती...आप महानता का ,,,सहृदय होने का,,सभ्य होने का एक पैमाना तय कर सकते हैं,,किन्तु मनुष्य की नीचता को मापने के कोई पैमाना नही होता....इसकी कोई सीमा नही होती....बड़े भाई की जिस स्त्री से अपनी माता के समान व्यवहार रखना चाहिए,,उस पांचाली को भरी सभा मे निर्वस्त्र करने का आदेश देने में दुर्योधन को किंचित संकोच नही हुआ...
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अपने भवन में कृष्ण की राह देखती द्रौपदी को ज्योंही  प्रतिहारी द्वारा उसे चौसर में हार जाने की सूचना प्राप्त हुई,,उसका हृदय एक अनहोनी आशंका से ग्रसित हो गया...कृष्ण की अभी कोई सूचना नही पहुंची,, पता नही कृष्ण तक द्रौपदी का संदेश ही पहुंचा या नही....और द्वारका से यहां पहुंचने में कितना समय लगता है,,,इन प्रश्नों के उत्तर द्रौपदी के पास नही थे..
             बेबसी ने अश्रुओं का रूप ले लिया...किन्तु पलकों के कोनों पर जमा पानी,,,आत्मसमान का रूप ले,,स्वयं से विद्रोह कर उठा...इतिहास साक्षी है कि किसी  स्त्री के नेत्रों से जब भी बेबसी के अश्रु बहे हैं,, बड़े बड़े साम्राज्य इसकी भेंट चढ़े हैं..अजेय रावण अपनी लंका सहित इस ज्वाला में होम हुआ है...सती के देह त्याग का परिणाम सम्पूर्ण विश्व को नाश के कगार पर ले गया था...देवकी के नेत्रों की गंगा में डूबकर मथुरा का कंस साम्राज्य खंड खंड बिखर चुका है,.. अहिल्या के अपमान का परिणाम इंद्र को चुकाना पड़ा....नियति क्या रचे बैठी है ये कृष्ण के सिवा कोई नही जानता...अपने अनुजों सहित अपनी स्त्री को जुए के दांव में हार जाने वाले युधिष्ठिर को इतिहास भले ही धर्मराज के रूप में याद रखे,,किन्तु द्रौपदी की दृष्टि में आज युधिष्ठिर का स्थान बहुत निम्न हो गया है..
                  दुर्योधन के आदेश पर दुशासन पांचाली को केशों से घसीटकर ,,कुरु सभा को अपनी बलिष्ट भुजाओं का परिचय दे चुका है..अपमान से छटपटाई निरीह स्त्री के वस्त्रों का एक छोर अपने पैरों से दबाए ,एक वीर अपनी वीरता का प्रदर्शन कर रहा है.... संसार मे वीरता के नया अध्याय लिखा जा रहा है,,,इतिहास पौरुषत्व की नवीन व्याख्या देख रहा है..
         आरंभ से ही स्त्री को सांवन्तवादी दृष्टि से देखने की मनोवृत्ति रही है...संसार अनेकों ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है...स्त्री उपभोग की वस्तु है ,,इस कुविचार से बड़े से बड़े चरित्र भी अछूते नही रहे...संसार का ये अटल सिद्धांत है कि भले ही पुरुष कितनी ही स्त्रियों का भोग करे,,किन्तु स्त्री एक से अधिक पुरुष को नही वर सकती...द्रौपदी ने पुरुषों की इस वर्चस्वता को चुनौती दी है..वह पांच वरों को धारण करने वाली पांचाली है..और पुरुष प्रधान समाज मे ऐसा दुस्साहस करने का दंड स्त्री को अपना सम्मान देकर चुकाना चाहिए,,,जाने अनजाने इस विचार के पक्षधर इस सभा मे बैठे सभी वीर हैं...आदर्शवाद की व्याख्या करते अपने अनेक नायकों को इतिहास ने हजारों बार मुंह के बल गिरते देखा है.....सभा मे गंगापुत्र भीष्म,,आचार्य द्रोण,,,महाबली कर्ण,,, नीतिपुरुष विदुर,,कृपाचार्य सहित उस कालखंड के उत्तम पुरुष विद्यमान है...सबकी अपनी अपनी विवशताएँ हो सकना संभव हैं,,सबके संस्कार भिन्न होना संभव हैं,,,.किन्तु सबके भीतर एक विचार समान रूप से विद्यमान है,,,जो सभी को एक सूत्र से बांधता है,,वो है मिथ्या पुरुषवाद..सभी के हृदय में एक टीस सदा से उन्हें सालती आयी है कि द्रौपदी ने पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देने का साहस किया है,,और उसे इसका दंड मिलना चाहिए..
          जिस क्षण भर में आपकी महानता का पैमाना तय होता है,,जो क्षण आपको मिथ्या पुरुषवाद के अहंकार की भावना से काटकर पुरुषों में उत्तम स्थान प्रदान करता है,,,जिस क्षण आप ब्रह्मांड में एक नया आदर्श प्रस्तुत कर ,स्वयं को एक वास्तविक नायक घोषित करते  हैं,, वह यही एक क्षण मात्र होता है....जब जबर के जुल्म के विरोध में कोई दर्शक दीर्घा से आगे निकल अधर्म को अधर्म कहने का साहस करता है..जब कोई सबल का विरोध कर निर्बल का सहायक बनता है,,,और वास्तविक नायक कहलाता है..और इसी एक क्षण में संसार के श्रेष्ठ नायक किरदार अपना कर्तव्य निभाने में चूक गए..वे दुर्योधन का विरोध करने से चूक गए...एक स्त्री  की मर्यादा की लक्ष्मणरेखा को लांघने का दुस्साहस कर बैठे..आदर्शवाद की मर्यादा को तार तार करने हेतु दुशासन के हाथ द्रौपदी के वस्त्रों की ओर बड़े... सभा द्रौपदी को उस अवस्था मे देखने का मोह नही त्याग सकी,, जिस रूप में स्त्री को उसका पुत्र व स्वामी ही देख पाए हैं..राजाओं में श्रेष्ठ स्थान रखने वाले राजा द्रुपद की राजकन्या,,,,संसार के श्रेष्ठ महारथियों की अर्धांगिनी,,,आज अपनी अस्मिता की रक्षा में असमर्थ है.... जिस पुरुषप्रधान समाज ने स्त्री के लिए अस्मिता के मापदंड तय किया हैं,,,उसी अस्मिता के पहरुए आज उसके सम्मान को निर्वस्त्र करने पर आमादा हैं....द्रौपदी को आज ज्ञात हुआ कि संसार मे स्त्रियों का एक ही स्थान है,,,एक ही गति है.....भले ही उसका जन्म किसी राजपरिवार में हो अथवा किसी निम्न कुल में .....किन्तु स्त्री की सदा से एक ही जाति होती आयी है,,वह जाति स्त्री होना है,,और इससे मुक्ति नही पाई जा सकती,,,चाहे उसका जन्म वैदेही के रूप में हो अथवा द्रौपदी के रूप में....
         किन्तु अनहोनियों होती हैं....असंभव संभव होता है,,,,कश्ती उस भंवर से भी निकलती है,,जिस भंवर से निकलने की आशा स्वयं मल्लाह को भी नही होती....ईश्वर ऐसी रचनाएं करता है....देवता ऐसा संभव करते हैं..हर ओर से निराश होकर भी अंत मे हृदय में एक दीपक आशा की एक क्षीण सी किरण जलाए रखता है,,,वह है कृष्ण का नाम....इस नाम का आधार द्रौपदी ने कभी नही त्यागा....नही,, कृष्ण हैं तो द्रौपदी का सम्मान जीवित है...भक्त है तो भगवान है....भक्त सदा भक्त  है.....स्वयं को प्रत्यक्ष भगवान को करना होता है...अपनी शक्ति का परिचय देना होता है....आज द्रौपदी की नही,,एक भक्त की अस्मिता दांव पर है मधुसूदन.....आज तुम्हारा अस्तित्व दांव पर है गोवर्धन....आज तुम्हारे भक्त प्रेम की परीक्षा है केशव......
                 श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी,, जय नाथ नारायन वासुदेव.....इस मंत्र का जाप सदा पांचाली ने किया है....कृष्ण पर उसकी अटूट श्रद्धा रही है....छद्म वीरों के इस संसार मे केशव का नाम ही एक अबला का सहारा बनता रहा है,,बनता रहेगा..हे नाथ,,रक्षा...रक्षा....
                 द्रौपदी के वस्त्र का एक सिरा अपने पैरों से दबाए,दुशाशन के हाथ उसके शरीर से वस्त्र खींचने को बढ़े...वस्त्र का दूसरा सिरा थामे पांचाली,,अपने नेत्रों को भींचे,,हृदय में गोविंद गोविंद पुकार रही है..यह भक्त की वह करुणामयी पुकार है,,जिस पर शेषनाग की शैय्या करते ईश्वर की तंद्रा भी टूटती है...समाधि में बैठे शिव भी जिस करुण पुकार के कारण विचलित हो उठते हैं.....हृदय से उठी यह उस अखंड विश्वास की पुकार है,,जिसका आधार लेकर सृष्टि कायम है..जिस विश्वास पर ब्रह्मांड की गतियां कायम हैं..जो विश्वास मनुष्य को अपने आराध्य के साक्षात दर्शन कराता है...
                        दुःशाशन ने आगे बढ़कर द्रौपदी के वस्त्रों को उसके शरीर से खींचना आरम्भ किया....पांडव लज्जा से सिर झुकाए बैठे हैं...बाकी सभा नीचता से अपनी गिद्ध दृष्टि पांचाली की देह पर लगाए बैठी है..दुर्योधन ने उत्तेजित होकर अपनी जंघा पर हाथ मारा....दुशासन ने द्रौपदी के बाहरी वस्त्र को खींचकर उसके शरीर से अलग निकाल फेंका...सभा सीत्कार से भर उठी..वीर दुशाशन के हाथ अधोवस्त्रों की ओर बढ़े....द्रौपदी का मन परमहंसों की उस अवस्था तक पहुंच गया है,,जहां उसके हृदय में कृष्ण के सिवा कुछ दृश्य नही,,,कानो में केशव केशव के सिवा कोई ध्वनि नही,,जिव्हा पर हे गोविंद हे गोविंद के सिवा कोई पुकार नही.....वस्त्रों से द्रौपदी का ध्यान हट चुका है,,दोनो हाथ जोड़े भक्त बस प्रभु का आह्वान कर रहा है..
                          दुशासन ने द्रौपदी के अंगवस्त्र पर हाथ बढ़ाया ही था कि उसी क्षण सम्पूर्ण कुरुसभा एक प्रचंड ध्वनि से गूंज उठी..सम्पूर्ण ब्रह्मांड को बींधती इस ध्वनि की तीव्रता ने मानो सब कुछ शून्य कर दिया हो..कुरुमहल की धरती प्रलय के कंपन से थरथरा उठी...सभा मे उपस्थित वीरों का तेज बुझ गया...दुशाशन सहित अनेकों महारथी अपने  कर्णों पर हाथ धरे चेतनाशून्य हो उठे..धरती डगमगा उठी....शेषनाग ने अपने फन को झटक कर होने वाली घटना के लिए स्वयं को सचेत किया,,,शिव ने डगमगाते कैलाश को पुनः अपने प्रभाव से स्थिर किया,....सर्वप्रथम कुन्तीनन्दन अर्जुन ने इस ध्वनि को पहचाना....उस ध्वनि को ,जिससे  संसार का हर महारथी परिचित है ....जिस ध्वनि के आगे ब्रह्मांड शीश नवाता है..वो ध्वनि जो संसार मे विरलतम है...जिस ध्वनि की गूंज वीरों का तेज हर उन्हें नपुंसक बनाने का सामर्थ्य रखती है....ये कृष्ण के पांचजन्य की गूंज है....इस शंख को वासुदेव धारण करते हैं..ये द्वारिकाधीश के रूप में ब्रह्मांड के स्वामी के आगमन की घोषणा है.....ये उस चक्रपाणी के आगमन का संदेश है,,जिसकी वीरता के आगे संसार नतमस्तक है...
                                 वासुदेव महल प्रांगण में प्रवेश कर चुके हैं....प्रचंड ज्वाला में धधकते कृष्ण ने अपने आगमन की हुंकार करी...पांचजन्य संसार का सर्वश्रेष्ठ ध्वनि शंख है,,जिसे संसार का सर्वोत्तम महारथी धारण करता है..चलते रथ से कूद कर कृष्ण द्युत सभा की ओर भागे...जब तक कुरुसभा पांचजन्य के प्रभाव से स्थिर होती,,सम्पूर्ण कुरुमहल कृष्ण के तेज से स्तम्भित हो उठा..क्षण भर में पासा पलट गया....भगवान ने धरती की गति को मानो स्थिर कर दिया हो....कृष्ण ने अपना पीतांबर द्रौपदी के कांधे पर फैला दिया...ये वो पीताम्बर है जो समूर्ण आकाश को ढकने का सामर्थ्य रखता है..आग्नेय दृष्टि से कृष्ण ने कुरुसभा को मानो चुनौती दी हो...द्रौपदी के ओढे पीताम्बर को स्पर्श करने की चुनौती..
                कुरुसभा के समस्त वीर योद्धा जानते हैं कि द्रौपदी के शरीर पर पड़े पीताम्बर को स्पर्श करने का अर्थ  कृष्ण के सुदर्शन चक्र को ललकारना है..वे यादवों के अधिपति हैं....इस सुदर्शन के पीछे संसार का नाश करने में सक्षम मृत देहों का अंबार खड़ा करने के बलराम के हल की फाल से सब परिचित हैं..यादव श्रेष्ठ सात्यकि की बाणों की गति संसार जरासंध युद्ध मे देख चुका है,,,उद्दव के धनुष की टंकार किसी भी साम्राज्य का विध्वसंश करने में सक्षम है....ये पीताम्बर नही,,यादवों का आत्मसम्मान है...यह कृष्ण का धर्म है...और संसार मे किस महारथी का सामर्थ्य है जो कृष्ण के धर्म को चुनौती दे सके..
             सभा निर्वीर्य देखती रह गयी,,,भगवान भक्त का हाथ थामे धीमे से वहां से प्रस्थान कर गए....

क्या है आपके लिए निषेध

--*** क्या है आपके लिए निषेध.***
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        कारक व अकारक के संबंध में बहुत सी भ्रांतियां व जिज्ञासाएं देखने मे आती रहती हैं..कई पाठकों का प्रश्न होता है कि हमारे लिए क्या कारक है व क्या अकारक है....ऐसे में अपने सुधि पाठकों को आज इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करता हूँ....कारक अकारक के कंफ्यूज़न में एक शब्द सदा उपेक्षित हो जाता है,,,और वह है निषेध.... निषेध अर्थात आउट ऑफ बाउंड...आपके समीकरण के विपरीत कोई सिद्धान्त,,नियम,,वस्तु...
          पेट्रोल कितना भी ताकतवर सही,किन्तु डीजल इंजन में निषेध है,,,,,डीजल कितना भी बेहतर सही,,पेट्रोल इंजन में निषेध है....जल से उत्पन्न होकर भी विधुत उपकरणों के लिए जल निषेध है..दूध कितना भी बेहतर सही,,खट्टे के साथ निषेध है....ऐसे में जातक के जीवन मे कई साधन निषेध हैं,,किन्तु हम ज्ञान के अभाव में उन्ही निषेध पदार्थों को अपने जीवन मे उपयोग करते रहते हैं,,व अपने लिए समस्याएं उत्पन करते हैं...
                  अष्टम भाव अंतिम भाव है जीवन का.…नवम प्रथम भाव है,,प्राण है..आठवां अंतिम ग्रह है,,,आठ ग्रह हैं....ग्रहों का प्रमाण आठ है,,,केतु राहु से ही निकला हुआ ग्रह है.…अतः आठवें का रंग मनुष्य के लिए कफन का रंग है.…..इससे परहेज करना बेहतर होता है..अष्ठम मृत्यु के बाद नवम प्रथम जीवन का आभास है,,धर्म है,,मंदिर है,,देवता का स्थान है...बचपन है.....ध्यान दीजिए,,भोजन का सबसे अधिक परहेज बालक के लिए ही होता है...बहुत से भोज्य पदार्थ उसका शरीर पचाने में सक्षम नही होता...दूसरा यह कि मंदिर होने के कारण ये देवताओं को अर्पित होने वाला स्थान है,,यहाँ की हर वस्तु पर देवताओं का अधिकार है...अतः भोज्य पदार्थ के रूप में आपके लिए त्याज्य है.…..नवम में बैठे ग्रह व नवमेश से संबंधित भोजन का परहेज करिये....यहां गुरु विराजमान है तो केले से परहेज कीजिये..चंद्र की राशि है तो रात्रि में दूध से परहेज कीजिये.. आठवें का संबंध मंगल से है तो पहनने के लिए लाल रंग से परहेज कीजिये...,गुरु का संबंध है तो पीले रंग के वस्त्रों से परहेज कीजिये...चंद्र संबंधी है तो सफेद त्याज्य है....इसी प्रकार अन्य ग्रहों का संबंध देखा जाना ,,बहुत सी जटिलताओं को सुलझाने में सहायक होता है....
        आशा है पाठकों तक अपनी बात पहुंचा पाया हूँ...कृपया अपनी अमूल्य राय रखिये....रविवार के अवकाश का आप पूर्ण आनंद लें,,,,इसी दुआ के साथ आप सभी को सादर प्रणाम..

राहु देता है छप्पर फाड़ कर

***--  राहु देता है छप्पड़ फाड़ कर..***
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         प्रबुद्ध पाठकों ने एक कहावत सुनी होगी,,,छप्पड़ फाड़ कर देना....कहावतें भी कई बार ज्योतिष के आम सूत्रों की ओर संकेत करती हैं..राहु धड़ विहीन एक ग्रह है...एक ऐसा ग्रह जब अपनी नकारात्मकता पर उतर आए,,तो सूर्य व चंद्र तक को खा जाता है...राहु को नकारात्मक अथवा सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करने को बाध्य करने का सामर्थ्य स्वयं जातक के पास होता है,,या कह लें स्वयं जातक ही अपने राहु को सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव देता है..
                   उत्पादन के हिसाब से देखा जाय तो पंचम व एकादश,,ये दो भाव उत्पादन करने वाले कहे गए हैं..ऐसे में पंचम व एकादश को प्रभावित करने वाला राहु प्रारम्भिक रूप से इन दोनों भावों का उत्पादन खा जाता है...शिक्षा भाव मे आधिपत्य जमाया राहु प्रारम्भिक शिक्षा का नाश करता है..एकादश भाव मे बैठा राहु ,,आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया की कहावत को चरितार्थ करता है..ये जातक की आरंभिक आय को कई तरीके से खाने के रूप में जाना जाता है...
            किन्तु पाठक जानते हैं राहु के पास पेट नही है ,,खाया हुआ पचाने को...अतः स्वाभाविक रूप से इसे ये सब खाया हुआ उगलना पड़ता है एक  दिन...इसे ही ज्योतिष की दृष्टि में छप्पड़ फाड़ कर देने वाला कहा गया है..पंचम में राहु के प्रभाव ने थॉमस अल्वा एडिसन को प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रखा...उसे स्कूल तक से निकम्मा कह कर निकाल दिया गया...किन्तु तुला लग्न में लग्नस्थ राहु के शुभ प्रभाव से वही बालक बिजली के बल्ब अविष्कारक बन नोबल पुरस्कार विजेता बन कर कालांतर में सामने आया..महान भरतीय वैज्ञानिक श्री अब्दुल कलाम के नवमस्थ राहु ने पंचम भाव को बांधा,,,उनकी आरम्भिक शिक्षा बहुत कठिनाई के माहौल में हुई,,किन्तु नवम शिक्षा की भी शिक्षा है,,पंचम से पंचम... उच्च शिक्षा के भाव में राहु के प्रभाव  ने उन्हें श्रेष्ट अविष्कारक बना कर प्रस्तुत किया....एकादश राहु के बहुत प्रमाण देखने मे आते हैं....भारतीय कप्तान धोनी के नाम से सभी परिचित है ....देवानंद एक मामूली इंसान थे,,एकादश राहु जब देने पर आया तो छप्पड़ फाड़ कर दे गया..अल्मोड़ा के एक गरीब परिवार से निकले महान राजनीतिज्ञ स्वर्गीय नारायण दत्त तिवाड़ी जी का प्रारम्भिक जीवन बेहद विषमताओं में गुजरा....एकादश राहु के शुभ प्रभाव में आते ही उनका वर्चस्व इंदिरा गांधी तक को चुनौती दे गया....इसी एकादश राहु का चमत्कार आजकल और एक उदाहरण में दिखाई दिया है...जरा अंदाजा लगाइये कहाँ.....
     सोचिये,,,
           दिमाग पर जोर डालिये...….

      .... . . ..  .. ...   ... ...रानू मंडल का नाम तो सुना ही होगा.......

बुध सबसे महत्वपूर्ण है

--*****संसार को संचालित कर रहा है बुध..**
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       ज्योतिष में सबसे कम विवेचित किये जाने वाला कोई ग्रह है तो वह बुध है...संसार भर के ज्योतिषी राहु शनि व मंगल की पूंछ उमेठने में ही सामान्यतः  लगे रहते हैं....किन्तु मेरी व्यक्तिगत राय में मैं बुध से अधिक पावरफुल इस युग में किसी ग्रह को नही मानता...जातक का बुध मजबूत है तो बहुत सी बाधाओं पर वो सहजता से विजय पा लेता है...
          जन्म में साथ बुध का प्रथम प्रभाव जातक की त्वचा पर होता है,,,,अर्थात स्किन बुध का विभाग है..आप जानते ही हैं कि गोरा(अंग्रेज)पैदा होते ही आप अपने आप श्रेष्ट कहलाये जाने योग्य होते हैं...मेरे जैसे काले इंडियन समाज मे दूसरे स्तर पर गिनती होते हैं...आप अंग्रेज हैं तो आपके मल में से भी खुशबू आती है...मेरे जैसे काले हैं तो आपका इत्र भी बास मारता है....अतः समाज मे श्रेष्ठता का प्रथम सोपान आपकी त्वचा के रंग से तय होता है....द्वितीय पायदान आपके स्नायु तंत्र हैं....विवेकहीन की भला क्या बिसात...हालात को नियंत्रित रखने के लिए आपका स्वयं के स्नायु पर नियंत्रण होना आवश्यक है....बुध का तीसरा अधिकार क्षेत्र आपकी वाणी पर है....भाषा पर आपका नियंत्रण है तो आप गंजे को भी कंघी बेच आते हैं..संसार की प्रत्येक मुश्किल को आप अपने भाषा कौशल से सहज ही निपटाने में सक्षम होते हैं.....शिक्षा में मैथ्स अर्थात गणित का डंका संसार भर में बजता है....यह गणित बुध द्वारा ही नियंत्रित होती है...
              दुनिया को चलाने के लिए अथवा कहें संसार में जीने के लिए अगर आज के युग मे कोई वस्तु प्राणवायु से भी अधिक कीमती हो चली है तो वह पैसा है....बुध पैसे का अधिकारी है....बिना बुध कोई बैंक नही,,कोई फाइनेंस सेक्टर नही,,कोई कम्युनिकेशन नही.....दिशाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिशा उत्तर का अधिकारी बुध ही है..वनस्पतियों में सबसे कीमती तुलसी को बुध का पौधा ही माना गया है..हरी भरी खेती का मालिक ही असली जमींदार है.....हर प्रकार का व्यापार बुध ही तो है...देवताओं में अग्रपूजनीय गणेश जी इसके अधिष्ठात्री देवता हैं....
           आप जानते हैं बुध का धरती पर सबसे बड़ा स्रोत क्या है??..जिसे आप बुध का ट्रांसफार्मर कह सकते हैं....वो बुआ होती है,,,आपके पिता की बहन,,,आपकी फूफू.....विश्वास कीजिये यदि आपका बुआ से मतभेद है तो स्वयं के व्यापार में बरकत की कहानी भूल जाओ भैय्या….ये संभव नही है....बुध का दूसरा जेनरेटर किन्नर होता है...यदि आपके मन मे किन्नरों के लिए सम्मान नही तो बुध आपके सम्मान की धज्जियां कभी भी उड़ा सकता है.....तुलसी का पौधा आपके लिए कल्पवृक्ष के समान है,,इसे घर मे लगाइये व इसका सेवन किसी भी रूप में कीजिये,,,बहुत सी समस्याएं स्वतः ही आपका पीछा छोड़ देंगी....ज्योतिष को समझने के लिए बहुत से वेद पढ़ने की आवश्यकता नही ,,,ज्योतिष आपके चारों तरफ बिखरा पड़ा है...बस समग्र दृष्टि रखिये...देखने से अधिक समझिये..तोते की भांति रटने की बजाय महसूस कीजिये.....समस्त प्रश्नों के उत्तर ब्रह्मांड में बिखरे पड़े हैं...स्वयं खोजिये...…..तो बोलिये बुध महाराज की जय......

छत में बंधा कुत्ता..राहु

***--  राहु ..छत में बंधा कुत्ता...आ बैल मुझे मार..
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              ज्योतिष संबंधी भविष्यवाणियों के साथ समस्या यह होती है कि जातक व पाठक को सबकुछ कहीं लिखा हुआ ही चाहिए होता है....स्वयं अनुभूत तथ्यों पर उसकी आस्था नही होती,,,व दूसरे के अनुभवों पर कुतर्क करने के लिए फ़ेसबुक यूनिवर्सिटी व व्हाट्सअप विश्वविद्यालय से डिग्री किया हुआ ज्योतिषी सबसे पहले फांद कर आगे आता है......यही कारण रहा कि मैं पिछले 15 वर्षों के अपने अनुभव को सूत्रों के रूप में शेयर करने में कंजूसी दिखाता हूँ.... जानता हूं कि उन सूत्रों का इस मायाजाल में कोई महत्व नही होने वाला...किन्तु स्वयं की प्रैक्टिस में निस्संकोच उन सूत्रों को अमल में लाता हूँ,, व कहते हुए कोई संकोच नही कि उन्ही सूत्रों के दम पर मेरी रोजी रोटी बहुत इत्मीनान व सम्मान से चल रही है...मेरे इन्ही सूत्रों ने मुझे कैनाडा,, अमेरिका आदि तक मे परमानैंट जजमान दिलवाए हैं....
              मेरे पड़ोस में एक परिवार आकर बसा है,,,वैसे मैं खुद अधिकतर अपने ऑफिस के दबड़े में दुबका रहने वाला इंसान हूँ,,किसी अन्य को क्या दोष दूँ,,,किन्तु पड़ोस में बसे परिवार के बालकों तक ने भी कभी दुआ सलाम,,पंडित जी प्रणाम कहने की जहमत नही उठाई है..खैर किस्सा यह है उनकी छत में अधिकतर दो तीन कुत्ते बंधे रहते हैं,,जो लगातार भौंकते व रोते रहते हैं...मुझे शिद्दत से पता है कि यदि किसी जातक की कुंडली मे राहु अष्ठम भाव अथवा भावेश को किसी भी रूप में प्रभावित कर रहा हो,,,संबंध बना रहा हो,,तो घर की छत में कुत्ता बांधना,,व कुत्ते का वहां रोना बहुत घातक दुष्परिणाम उत्पन करने में सक्षम होता है...ये राहु को बिगाड़ने का काम करता है,,,,आ बैल मुझे मार की कहावत चरितार्थ करता है..घर का मुखिया अथवा कोई सदस्य ऐसा होने के 120 दिनों के भीतर दुर्घटना अथवा किसी घातक रोग का शिकार होता ही होता है....ये वर्षों से अनुभूत तथ्य है मेरा...लिखा हुआ दिखाने को कहेंगे तो मैं नमस्ते बोलकर आगे बढ़ लूंगा...
            हां तो हुआ यह कि मेरी बहुत इच्छा हुई पड़ोस में बसे परिवार को इस बाबत सूचित करूँ.. किन्तु उन लोगों के आचरण व्यवहार से लगा नही कि धर्म के किसी भी रूप में उनकी किसी प्रकार की आस्था होगी,,,अतः मन मसोज कर रह गया.. कुछ समय पश्चात एक दिन अचानक उनके घर से बहुत शोर सुनने को मिला...मालूम हुआ एम्बुलेंस आयी हुई है,,उनकी माताजी छत से गिर कर बेहद खतरनाक तरीक़े से घायल हो गयी हैं..मेरी दृष्टि तुरंत उनकी छत पर गयी,,,तीन तीन राहु देव् मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे...मैं जानता था राहु अपना काम कर गया....हृदय को दुख हुआ...मैं रोक सकता था,,कम से कम सचेत तो कर ही सकता था उन्हें...नही कर पाया,,,कारण कुछ भी रहा हो....किन्तु अब उस भूल को सुधारता हूँ,, सुधारना चाहता हूं....अतः अपने प्रिय पाठकों को सूचित कर रहा हूँ,,,घर मे किसी भी सदस्य के अष्ठम भाव,, भावेश से कैसा भी संबंध राहु का बनता हो तो कृपया अपनी छत में कुत्ता न बांधे.....छत में चिड़ियाओं के लिए दाना बिखेरें.….वे राहु की नकारात्मक ऊर्जा का क्षय  करती हैं....कुत्ता उन्हें डराता है,,वे उड़ जाती हैं...
       इस विषय पर आप लोगों का कोई अनुभूत अनुभव हो तो कृपया बताएं...लेख के बारे के आपकी अमूल्य राय से भी अवगत कराएं...आप सुधि पाठकों का प्रोत्साहन मुझे आपके साथ अपने अनुभव बांटने के लिए प्रोत्साहित करेगा....सादर प्रणाम..

शुक्र से कैसे बने राजयोग

***** (मात्र उन्ही  प्रश्नों के उत्तर दे पाऊंगा जो,,स्पष्ट भाषा मे,,पूर्ण डाटा द्वारा पूछे  गए हों,,यथासंभव प्रयास के बाद भी यदि किसी का प्रश्न नही ले सका,, तो रुष्ट न होइएगा,,ये प्रार्थना है)******
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            ज्योतिष के विद्यार्थी सामान्यतः जानते हैं कि शुक्र को द्वादश भाव में ,तथा द्वादश राशि मे उच्च माना जाता है....अधिकतर ज्योतिषीय ग्रंथों में इस योग का बड़ा गुणगान होता आया है...विवेचना के स्तर पर नए ज्योतिष विद्यार्थियों को कई बार इसी भ्रम में ,इसका परिणाम तय करते हुए देख कर पीड़ा होती है ...........संभवतः पाठकों को ज्ञात हो कि शुक्र सामान्यतः अन्य ग्रहों की अपेक्षा अपने लैप में उल्टी दिशा में घूमता है....ऐसे में वो एक प्रकार से वापस आता हुआ ग्रह है......अपने सिद्धान्त के विपरीत शुक्र मीन में अपने स्वभाव के अपोजिट  सात्विक प्रभाव देने वाला हो जाता है.........
            कारण वास्तव में बहुत गूढ़ है....द्वादश भाव में मोक्ष का भाव है..महानिर्वाण का भाव है..ऐसे में कालपुरुष में ये भाव देवगुरु के आधीन है...सामान्य मित्र चक्र में देवगुरु के नितांत शत्रु होते हुए भी इस भाव में शुक्र उच्च पद पा जाते हैं.....क्योंकि भोगी अपना स्वरुप बदलकर योगी बन जाता है...शुक्र जो भी क्रिया देते हैं,,जो भी कर्म करवाते है ,वो मोक्ष के लिए होता है...ये भाग्य को सुख देने का भाव है...सामान्यतः शुक्र भोग विलास के कारक हैं...यहाँ ये भोग विलास सात्विक हो जाता है..अतः पूजनीय हो जाता है..कालपुरुष में षष्ठम भाव रिपु भाव माना गया है...अतः भोग विलास जब सांसारिकता का भाव ग्रहण कर लेता है तो यही भोग विलास के कारक शुक्र मित्र बुध की कन्या राशि होते हुए भी नीच मान लिए जाते हैं.............
           भोग विलास के कारक का उच्च होना वास्तव में भोग की प्रवृत्ति को लगाम लगाना है......राम की,,, गौतम बुद्ध की कुंडली मे शुक्र उच्च हो सकते हैं,,,,किन्तु एक रईस शेख की कुंडली मे इन्हें नीच में आना ही होता है ,,,अपना वास्तविक प्रभाव देने के लिए.....इतिहास गवाह है कि जातक को सांसारिक सुख का जितना लाभ कन्या के शुक्र ने प्रदान किया है,, वो मीन का शुक्र नही दे पाया..........ये बारहवें मोक्ष (जीवन के पश्चात सुख) का कारण बन सकता है,,,,किन्तु जब तक मनुष्य पृथ्वी पर ,सांसारिकता से बंधा है,,तब तक नीच शुक्र ही एकलौती आशा की किरण है भैया.....मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात का पक्षधर हूँ कि यदि जातक मरने के बाद मोक्ष की आस नही रखकर,,जीते जी भोग विलास का अनुयायी है,,,तो ऐसी अवस्था मे कन्या का शुक्र आपके लिए अधिक सौभाग्य का कारक है...
            प्रोफेशनल ज्योतिषी कई बार शुक्र को उच्च का पाकर भी जातक की स्थिती डांवाडोल देखेंगे,,,,और नीच का शुक्र होते हुए भी जातक को मौज में देखेंगे..............कारण वही है,,,शुक्र का सामान्य से विपरीत दिशा को भ्रमण........अब कृपया कोई पाठक ऐसा बोल कर कुतर्क न करे ,कि हमने तो ऐसा कहीं लिखा नही देखा..............(जैसा एक सज्जन मेरे पिछले लेख में बोल रहे थे) ,,,मित्रवर हर बात लिखी हुई ही मिल जाती ,तो शौकिया ज्योतिषी और विधिवत आचार्य में भला क्या अंतर रह जाता........ ये सूत्र निरंतर कुंडली अध्ययन ,,,,,,पेशे के प्रति आपकी आस्था,,,स्वयं को प्रयासों की भट्टी में झोंककर ,,तपाकर प्राप्त हुआ कुंदन है... आपके द्वारा स्वयं को  ज्योतिष सागर में डुबोकर  प्राप्त होने वाले मोती हैं,,,,इनके लिए समुंदर के तल में उतरना होता है....किनारे बैठ कर अपने पैरों को पानी मे भिगो कर ,,समुद्र का गोता मारने का भ्रम रखने वाला गणक इन बातों को समझने में सक्षम हो पायेगा,,ऐसा मानना ज्योतिष शास्त्र के साथ अन्याय है....और इन्ही सूत्रों की जानकारी ,एक प्रोफेशनल ज्योतिषी व एक शौकिया ज्योतिषी के मध्य का भेद तय करती है.......अतः यहां बेकार तर्क करने से बेहतर है कि भविष्य में कुंडली अवलोकन करते समय,,इसे  संज्ञान में रखकर प्रक्टिकली समझें.............हर बात के लिए पुस्तकों के भरोसे मत रहिये,,,,,,,,,अन्यथा हाल उस छात्र की तरह हो जाता है जो निबंध गाय पर रटकर गया था और परीक्षा में बैल का आ गया...........बंदे ने उपाय ये किया,,कि निबंध वही रखा,,,,, बस गाय के बदले बैल लिखता गया.......आशा है पाठक सहमत होंगे...आज किंचित फुरसत में हूं,,, अतः पाठक चाहें तो अपना प्रश्न  करें,,,,,,,जितनी इजाजत समय देगा,मात्र उतने ही प्रश्नों के उत्तर दे पाऊंगा,,एक मेहरबानी कीजियेगा,,कृपया प्रश्न स्पष्ट रखियेगा.....
       इनबॉक्स में प्रश्न न करें,,चाहे गरिया लें,चाहे अपशब्द कहे लें किन्तु हर बार की भांति स्पष्ट बता दूं ,मैं प्रोफेशनल ज्योतिषी हूँ,, फीस लेता हूँ ,क्योंकि इसी कार्य से मेरे परिवार का भरण पोषण होता है..........प्रणाम
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मृत्यु की काट,,सप्तम भाव

--**रोग व मृत्यु के बीच खड़ी दीवार..आपकी अर्धांगनी --**
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"लेकर कर में पत्रिका
 हिय से लियो विचारी
 मृत्यु और शत्रु के
 बीच खड़ी है नारी.."
     सप्तम भाव पर बहुत कुछ कहा गया है...यह रोग भाव व मृत्यु भाव के मध्य खड़ी दीवार है....पुराणों में सत्यवान व सावित्री की कथा आपने सुनी होंगी....सत्यवान की अखंड मृत्यु को अपने सतीत्व के बल पर सावित्री ने परास्त किया,,ऐसा प्रमाण है.....कालिदास की सफलता के पीछे उसकी स्त्री ही खड़ी दिखाई देती हैं..इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने युद्ध लड़े गए,,उस सबके पीछे जऱ जोरू व जमीन ही रही है,,,इसी कारण सप्तम व द्वितीय मारक कहे गए हैं,,व कालपुरुष का आरम्भ करता मंगल,,चतुर्थ में नीच फल देने लगता है...कितनी हैरानी है कि भूमि का कारक होकर भौम अर्थात मंगल,,भूमि के भाव मे ही नीच हो जाता है,,,,कभी सोचा है आपने क्यों??...सोचिये...इसी कारण ये भाव झगड़े की जड़ है,,,
                  सैकड़ों प्रमाण हैं कि किसी जातक की स्त्री ने अपनी सेवा द्वारा अपने जीवन साथी के बड़े बड़े रोगों को ठीक किया है..कालपुरुष में देखें तो यह आय का नवम भाव है,,अर्थात पुरुष की आय को भाग्य देने का स्थान...इसलिए पुराने लोग विवाह के बाद घर पर लक्ष्मी का आगमन होना कहा करते थे.. जिस पुरुष ने अपने जीवनसाथी का महत्व पहचान लिया,,संसार मे उससे अधिक शक्तिशाली कोई नही...यह भाग्य की आय का भाव है..अर्थात भाग्य को बरकत तभी है जब सप्तम बलवान है..यह देवताओं के लिए तक पुण्य स्थान रहा है..कितना रोचक संयोग है कि सप्तम सदा लग्नेश का शत्रु ग्रह होता है,,व अपनी मूल त्रिकोण अथवा उच्च की राशि मे यदि ग्रह लग्न में विराजमान होता है तो सप्तम में स्वतः ही उसकी नीच राशि आ जाती है...हालांकि ये क्रम सभी भावों से बनता है,,किन्तु ध्यान रखने वाली बात है कि लग्न से ही अर्धनारीश्वर  का निर्माण माना गया है.…लग्न यदि संसार को विसध्वंश करने में सक्षम शिव का त्रिनेत्र है,,तो सप्तम संसार को प्राण देने वाली योनि है,गर्भ है..यह प्राणों की रक्षा का भाव है....अतः पाठकों को चाहिए कि यदि अकाल मृत्यु से बचना है,,,रोगों की काट करनी है,,तो अपने जीवन साथी के आगे नतमस्तक होना सीखिए..... लेख के बारे में आपकी अमूल्य राय से अवश्य अवगत कराइये..