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गुरुवार, 30 मार्च 2017

shani...sani....neelam शनि..नीलम... वक्री....मार्गी..

हर विषय की तरह ज्योतिष शास्त्र व ज्योतिषी भी परंपरागत लकीर को लांघने में खौफ सा खाते दिखाई देते हैं.. दूध को दूध और पानी को पानी कहने वाले कई मिल सकते हैं...किन्तु पानी मिले दूध को पानी बताने के लिए कलेजा चाहिए..पीछे से चली आ रही लकीर को पीटने की प्रथा का अनुगामी जो ज्योतिषी होगा,वो नए सूत्र,नया विजन नहीं दे सकता...जो वर्जनाओं को नहीं त्याग सकता वो आकाश में नहीं उड़ सकता...
      कमोबेश यही स्थिति शनि को लेकर चली आ रही है..और यही स्थिति है शनि से सम्बंधित रत्न माने जाने वाले नीलम की...परंपरागत रूप से ज्योतिषी भाई बंधु नीलम को शनि का रत्न बताते आये हैं,,,अपने अध्ययन के दौरान सामान्यतः हर गणक ऐसा ही पढता है,या समझाया जाता है...रत्नों के बारे में साधारण सी समझ रखने वाले पाठक भी ये बात तो जानते ही होंगे कि रत्न सम्बंधित ग्रह के मूल रंग को धारण करता हूं..उसकी आभा को परिभाषित करता हूं...सफ़ेद चंद्र के लिए सफ़ेद मोती का प्रावधान है,,लाल मंगल के लिए ऐसी ही आभा लिया मूंगा तय है.....हरे बुध के लिए हरा पन्ना तय किया गया है....पीले बृहस्पति के लिए पीला पुखराज शास्त्रोक्त है...ताम्बई सूर्य के लिए वैसी ही आभा वाला माणिक उपयुक्त माना जाता है....तो इस क्रम में भला परिवर्तन शनि को लेकर क्यों हो जाता है...
   नीलम,, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है,,नीली आभा लिए एक रत्न है..जिसका सम्बन्ध शनि से जोड़ दिया गया है...पाठक भलीभांति अवगत हैं कि शनि का रंग काला है..तो इसका रत्न नीला कैसे हो सकता है...नीला राहु का रंग है मित्रों....ऊपर डिसकस किये सूत्र के अनुसार यर राहु का रत्न होना चाहिए....
         अब शनि की शिफ़्त की तरफ ध्यान दीजिए..मार्गी शनि स्वयं के शरीर से काम लेता है तो वक्री अपनी बुद्धि व दूसरों के शरीर से काम लेता है...मार्गी शनि को एक मजदूर समझ लीजिए,,जो अपने दो हाथों से जितना काम करेगा,,उतना लाभ पायेगा....वक्री शनि को ठेकेदार समझ लीजिए,जो कई मजदूरों से काम करवा कर उनकी मेहनत का लाभ ले रहा है......आप मज़दूर व ठेकेदार दोनों को भला नीलम कैसे धारण करवा सकते हैं ....यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि  वक्री शनि जहाँ भी होगा,वहाँ से लाभ के समीकरण बनाने का प्रयास करेगा...वक्री शनि ,कारक हो या अकारक,दोनों किरदारों में लाभ का ही फल उत्पन्न करता है..
       नीलम धारण करवाने से आप मजदूर को उसकी प्रतिभा के विपरीत अधिक उकसा रहे हैं,जहाँ आगे हानि ही स्पष्ट दृष्टिगोचर है....वक्री शनि(ठेकेदार) को आप नीलम धारण करवा रहे हैं तो उसे निराशा के अंधकार में ले जा रहे हैं....जो व्यक्ति अच्छा भला दस मजदूरों से काम करवा ,लाभ प्राप्त कर रहा था,,वो अब अपने दोनों हाथों पर आश्रित हो गया है...
          रत्न वास्तव में लग्न ,पंचम व नवम की मिश्रित आभा को पूरा करता हो तो ही अधिक लाभप्रद माना गया है...किन्तु नौशिखिये ज्योतिषियों के साथ यहाँ से ही  समस्या आरम्भ हो जाती है,, अनुभव की कमी उन्हें सही निर्णय तक नहीं पहुँचने देती.......लग्न अगर खाली है तो आपको लग्नेश के आश्रित स्थान को लग्न बनाना पड़ता है,,तब जाकर आप सही निर्णय लेने की अवस्था में पहुँचते हैं....
       उदहारण के लिए मान लीजिए कोई जातक वृश्चिक लग्न से सम्बंधित है....ऐसे में बुध यहाँ मारक हो जाता है,,...किन्तु लग्न कुंडली में यदि हम लग्न को रिक्त पा रहे हैं वे लग्नेश की पोजीशन एकादश भाव में बुध की कन्या राशि पर है,,,तो जातक को रत्न संबंधी सलाह देने के लिए हमें कन्या राशि को ही लग्न की तरह ट्रीट करना पड़ेगा..ऐसी अवस्था में सहज ही पन्ना धारण कराया जा सकता है.....अपनी दशा में बुध वृश्चिक लग्न के लिए मारकेश का कार्य ही करने वाला होगा,इसमें कोई संशय नहीं.....किन्तु पन्ना यहाँ आमदनी के साधनों को शीघ्र मजबूत करेगा इसमें भी कोई संशय नहीं....किताबी सूत्रों की तुलना में स्वयं के परिभाषित किये सूत्र ज्योतिषी को अधिक सहायक रहते हैं ,ऐसा मेरा व्यक्तिगत विश्वास है.....ज्योतिष किसी आसमानी चिड़िया का नाम नहीं है मित्रों....इसके लिए आपको संस्कृत घोटने की कतई आवश्यकता नहीं है....न ही मन्त्रों में आपका पारंगत न होना आपके ज्योतिषि बनने की राह में कोई रोड़ा है....बेसिक अध्ययन के बाद अपने आस पास तार्किक व विवेचनात्मक दृष्टिकोण रखना,, व पुराने सूत्रों को नए लिबास में देखने का हुनर ही आपको ज्योतिष की राह में आगे ले जाएगा,,ऐसा मेरा विश्वास है.....अतः आप भी अपने वातावरण पर समग्र दृष्टि रखें,,प्रकृति के परिवर्तनों को समझने का प्रयास करें,अपनी छठी इंद्री को जागृत करने का अभ्यास करें.....आपकी ज्योतिषी बनने की राह स्वतः ही सुगम हो जाती है....लेख के विषय में आपकी अमूल्य राय का इंतजार करूँगा....प्रणाम...

बुधवार, 29 मार्च 2017

fifth house... पंचम भाव....जन्म मृत्यु..प्रारब्ध

मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होने के पश्चात कहाँ जाता है,इस विषय पर बहुत से ग्रन्थ ,बहुत से विचार प्रस्तुत करते हैं..किन्तु जन्म लेने से पूर्व वो कहाँ से किस हालात से निकल कर आया है,ये जानकारी बहुत कम उपलब्ध होती है....ज्योतिष में इस विषय में बहुत रहस्यपूर्ण तरीके से आगे बढ़ा जाता है...पूर्व में हमारी वेब साइट www.astrologerindehradun.com में  मेरे पितृ दोष संबंधी लेख में  मैंने पाठकों के समक्ष ,,बड़ी शिद्दत से पंचम भाव का महत्व रखने का प्रयास किया था व पाठकों की खूब वाहवाही पाई थी...इसी सूत्र को आगे ले जाने का प्रयास आज कर रहा हूँ...
       लग्न व अष्ठम भाव से प्रभाव एक साथ एक दूसरे की ओर बढ़ता है..वो भी विपरीत कारक के साथ....कैसे???आइये समझते हैं...लग्न जातक का जन्म है तो अष्ठम मृत्यु...अब लग्न से अगला भाव अर्थात द्वितीय भाव ,,जन्म के पश्चात की पहली सांस है... इसके विपरीत अष्ठम से पहला अर्थात सप्तम भाव जीवन की अंतिम सांस है...एक तरफ से (लग्न से) प्रभाव आगे आने वाले कारकों के लिए बुनियाद तैयार कर रहा है,तो दूसरी ओर का प्रभाव ,अंतिम सत्य (अष्ठम मृत्यु ) से प्रारब्ध की बुनियाद तलाशने का प्रयास कर पीछे की यात्रा कर रहा है..
        द्वितीय सांस के बाद तृतीय उसका आकार है,,,भविष्य की जद्दोजहद से लड़ने के लिए मनोबल ,पुरुषार्थ है....तो सप्तम से पीछे छठा भाव उस अंतिम सांस(सप्तम) के लिए कारण पैदा करने वाला भाव है....तृतीय के बाद चतुर्थ माँ  की गोद है.. ..वहीँ षष्ठम भाव से पूर्व का पंचम भाव अंतिम सांस के कारण तय करने वाले भाव को उत्पन्न करने वाली भूमि है..यहाँ पाठक एक बात अवश्य गौर करें कि किसी भी भाव ,किसी भी ग्रह से सप्तम स्वतः ही उसके लिए अपोजिट प्रभाव उत्पन्न करने को मजबूर हो जाता है..अतः पंचम यदि प्रथम वस्त्र के रूप में माँ के आँचल के रूप में देखा जाता है तो एकादश इसी कारण अंतिम वस्त्र कफ़न का भाव है...लग्न को जातक माना जाय तो नवम उस भूमि का रूप है ,जिसपर ये पौधा उगा है,,,,,नवम पिता है तो नवम के पीछे पंचम उसका आधार है....इसी कारण स्पष्ट है कि जातक अपने अंश के रूप में  भविष्य में जो पंचम(संतान) उत्पादन करने वाला है,वास्तव में ये ही भाव लग्न के निर्माण वाली भूमि(नवम) का आधार भाव है....अतः ज्योतिषी को सभी भाव त्यागकर सर्वप्रथम पंचम भाव का विवेचन करना श्रेष्ठ निर्णय लेने में सहायक बनता है...पंचम आपके पूर्व जन्म के किस्सों का भाव है व गुरु इस भाव का यात्री है..इसी कारण तो अष्ठम मृत्यु के बाद कालपुरुष में पहला भाव नवम गुरु का भाव है...कालपुरुष में पंचम सूर्य का भाव है जो वंश परंपरा का घोतक है, आप असल में अपने पिता का ही डीएनए हैं..और पिता आपके दादा का डीएनए....तो असल में आप दादा का ही रूप हैं...आप पिता से अधिक अपने दादा के डीएनए हैं....इसीलिए सामान्यतः अनुवांशिक बीमारियां एक पीढ़ी छोड़कर अधिक प्रबल रूप से सामने आती है....पंचम भाव आपके लिए तय कर चुका होता है कि निकट भविष्य में क्या आपके लिए मारक प्रभाव लाने वाला है...अतः  मृत्यु कुंडली पंचम भाव को आधार रखकर करें तो बहुत से नए रहस्य सामने आते हैं.... ये षष्ठम रोग को व्यय करने वाला भाव है....अगर इसका रहस्य पकड़ आ गया तो शर्तिया जातक अटल मृत्यु को काटने की ताकत पा जाता है...आपने यूनानी कथाओं में फिनिक्स पक्षी का नाम सुना ही होगा...

मंगलवार, 28 मार्च 2017

सभी मित्रों को नववर्ष की शुभकामनाएं,,,,,,,खुश रहें मस्त रहें ,,,बस दुविधाग्रस्त न रहें,,,,लालसाओं की पूर्ति के लिए पस्त न रहें ,,,,,जीवन क्षणभंगुर है इसके अभ्यस्त न रहें ,,धर्म पर जो अडिग रहा वो ही पार पाया ,स्वार्थ पूर्ति में अपनी मदमस्त न रहें ,,,कौन मैं और क्या मेरा ,,क्या तू और क्या तेरा ,इस उधेड़बुन में तनावग्रस्त न रहें ,,,उड़ानें ऊँची हों तो अक्सर गिरने का कारण बन जाती हैं , भूल कर भी शाख अपनी पदभ्रष्ट न रहें ,,,,त्यागें न धरती अपनी ,अपने संस्कार न  भुलाएं ,,,,,,आइये इसी कामना के साथ नवरात्र मनाएं 

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

याज्ञवल्कय के अनुसार नई दुल्हन विवाह होने के प्रथम वर्ष के भीतर ज्येष्ठ ,आषाढ़ व मलमास में यदि अपने ससुराल में निवास करती है तो क्रमश अपने जेठ ,सास ससुर व स्वयं का नाश करती है . इसी प्रकार यदि कन्या चैत्र मॉस में मॉस में अपने पिता के घर निवास करती है तो पिता की हानि होती है.
    

सोमवार, 8 अगस्त 2016

Mangalik Dosh --- मांगलिक दोष

अपने ब्लॉग ,वेब साईट,मेल्स व अन्य साधनो से प्राप्त प्रश्नो में सर्वाधिक प्रश्न जो मुझे प्राप्त होते हैं,उनका सम्बन्ध परोक्ष -अपरोक्ष रूप से मंगल से ही होता है...अब समयाभाव के कारण प्रत्येक प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता... इसलिए साधारण भाषा में आज मंगल के दोष,उनका निवारण ,व उनके प्रभाव आदि के विषय में चर्चा करेंगे,,,,
         अमूमन मंगल की चर्चा तब अधिक होने लगती है जब लड़का या लड़की विवाह योग्य होने लगते हैं व उनकी कुण्डलियाँ मिलान के लिए निकाली जाने लगती हैं...यकीन मानिए कन्या के पिता के पैरों के नीचे से तो जमीन ही खिसक जाती होगी,जब बेटी मांगलिक निकल आती होगी तो...कुछ लोग इस दौरान कुण्डलियाँ ही बदल देते हैं तो कुछ स्वयं को इंटेलेक्चुअल घोषित करते हुए डंके की चोट पर कह देते हैं कि हम इस सब बकवास को नहीं मानते।।.
                 वर्षों बीत गए मंगल पर चर्चा करते हुए ,हजारों टीकाएँ ग्रंथों के आधार पर लिखी गई ,सैकड़ों लोगों ने इस पर नए नए विचार प्रस्तुत किये....इसे हौव्वा बताया .....किन्तु आज भी विवाह सन्दर्भ में चर्चा चलते ही सबसे अधिक खौफ अगर किसी ग्रह का है तो वो मंगल ही है....ज्योतिष को सिरे से नकारने वाले सज्जन भी अपने लिए बहु लाते समय दबी जुबान मांगलिक दोष की तरफ से शंका मिटाना नहीं चूकते..
                                क्या है ये मंगल और क्यों इसका इतना खौफ जनमानस पर हावी है ??सामान्य  गणना  के अनुसार हम जानते हैं कि किसी भी पुरुष व स्त्री की कुंडली में चौथे ,सातवें ,आठवें ,बारहवें व लग्न भाव में मंगल होने से  उन्हें मांगलिक मान लिया जाता है। वास्तव में देखने में आया है (मेरी व्यक्तिगत सोच है ) कि मंगल की उपस्थिति से अधिक इसका चौथा व आठवां दृष्टि प्रभाव दाम्पत्य पर अधिक प्रतिकूल असर देता है...... ऐसे में मेरा मानना  है कि मंगल की चौथे व बारहवें भाव की उपस्थिति दाम्पत्य के लिए अधिक घातक परिणाम प्रस्तुत करती है .....सातवें व आठवें भाव में बैठा मंगल दाम्पत्य  कडुवाहट उत्पन्न करता है ,किन्तु मैं व्यक्तिगत रूप से इसे जीवनसाथी के लिए मारक नहीं मानता हूँ ...मेरे  पिछले दस -बारह साल के अध्ययन व क्लाइंट्स के साथ अपनी काउंसलिंग में मैंने सप्तम -अष्ठम मंगल को तलाक दिलाते ,वैचारिक मतभेद बनाते अधिक देखा है किन्तु चतुर्थ व द्वादस्थ भौम मारक होते हुए हर बार पाया है ....जबकि बदनामी सप्तम व अष्ठम मंगल के हिस्से में अधिक आती है प्रभाव के रूप में कहें तो मंगल की चौथी व आठवीं दृष्टि जलीय प्रभाव लिए हुए होती हैं ,,,,,भौम जो कि अग्नि का कारक ग्रह है व जिसका काम शरीर-व जीवन रुपी भाव - भट्टी को ईंधन उपलब्ध कराना है ,,उसे कार्य  करने के लिए ऊर्जा प्रदान करना है ,अपने चौथे व आठवें जलीय प्रभाव में अपना नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न कर उस आग को ,उस भाव के प्राणों की अग्नि को बुझा देता है ...संभवतः इसी कारण मंगल को चौथी राशि कर्क में नीच माना जाता  है व  इसकी स्वयं की आठवीं वृश्चिक राशि इसकी नकारात्मक राशि मानी गई है ....