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शनिवार, 12 जनवरी 2013

वृष लग्न की कन्या का जीवन साथी

पिछले क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज हम भ्रमनचक्र के द्वितीय लग्न की कन्या के होने वाले जीवनसाथी के विषय पर प्रकाश डालेंगे। जैसा की पाठकों को ज्ञात है वृष लग्न में सप्तम भाव में मंगल के स्वामित्व वाली व चंद्रमा की नीच कही जाने वाली वृश्चिक राशि का आधिपत्य होता है।
--ऐसे में जीवन साथी सामान्यतः दुबला ,मध्यम कद ,धार्मिक प्रवृति ,मेहनती होता है।ऐसे जातक कभी कभी अधिक बोलने वाले व गुस्सैल  स्वाभाव के भी देखे गए हैं।
--सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि हो (आठवीं दृष्टि को छोड़कर ) अथवा मंगल किसी भी त्रिकोण में हो तो जीवनसाथी के सरकारी नौकरी में होने की अधिक संभावनाएं होती हैं।
--  तीसरे भाव का मंगल पति से भावनात्मक या शारीरिक किसी भी प्रकार की दूरी का कारक कहा गया है।वह स्त्री की भावनाओं को न समझने वाला या कोई ऐसा कार्य व्यवसाय करने वाला होता है जिस कारण वह स्त्री को बहुत अधिक समय नहीं दे पाता .
--यदि मंगल पाप ग्रहों के प्रभाव में हो या पाप ग्रहों का प्रभाव सप्तम भाव पर हो तो वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद तक होते देखे गए हैं।देव गुरु ब्रहस्पत्ति की दृष्टि सप्तम भाव पर हो तो दाम्पत्य जीवन तो बचा रहता है किन्तु पति-पत्नी साथ भी रहें इसमें संदेह होता है।
--आठवें भाव में मंगल की उपस्थिति पति के किसी प्रकार के रोगी होने की संभावनाओं को बताती है अतः विवाह पूर्व कुंडली मिलान के समय वर के लग्नेश का शुभ अवस्था में होना जरूर ध्यान में रखना चाहिए।
-- मंगल का द्वादश भाव में होना जीवन साथी के कभी किसी मुक़दमे आदि में उलझने की ओर संकेत करने वाला माना गया है।
-- चंद्रमा या गुरु से मंगल की युति शुभ फल देने वाली होती है।
       कुंडली मिलान का कितना महत्व है इस सन्दर्भ में कभी कभी एक किस्सा दिमाग में आता है।वैसे इसका जिक्र कहीं नहीं मिलता ,यह मेरे खुद के दिमाग की ही उपज है .अतः इसके सही गलत होने या कहूँ यह कितना विश्वनीय हो सकता है इसका फैसला अपने सुबुद्ध पाठकों पर ही रहने देता हूँ।सत्यवान -सावित्री के किस्से से आप सभी परिचित ही होंगे।हुआ यूँ होगा की सत्यवान की कुंडली में अल्पायु योग रहा होगा।जब उसके माता पिता ने किसी ज्योतिषी को कुंडली दिखाई होगी तो उसने तुरंत सत्यवान का विवाह किसी ऐसी कन्या से करने को कहा होगा जिसकी कुंडली में दीर्घ वैवाहिक सुख का योग हो।अर्थात जो कन्या पति के लिए परम सौभाग्यावती हो।सावित्री ऐसे ही योगों वाली कन्या रही होगी।विवाह के पश्चात जब सत्यवान की मृत्यु का समय आया होगा तो सावित्री की कुंडली के हिसाब से उस समय उसे पति द्वारा पुत्र प्राप्ति के योग बन रहे होंगे।यहीं ग्रह गच्चा खा गए।अब भला स्त्री की कुंडली जब पति के दीर्घायु होने की गारंटी कर रही थी तो भला किस प्रकार गृह सत्यवान को मृत्यु देते।किन्तु स्वयं की कुंडली के योगों ने तो फलित होना ही था,अतः सत्यवान काफी समय तक बेहॊश या मृत्युतुल्य कष्ट में शैय्या पर रहा होगा।यह वह अन्तराल रहा होगा जिस के बारे मे हमें यह कहा जाता है की सावित्री उसके प्राणों की रक्षा के लिए यमराज के भैसें के पीछे पीछे चलती रही।कहने का तात्पर्य यह है की यदि किसी भी कुंडली में (स्त्री चाहे पुरुष ) यदि ऐसा योग किसी ज्योतिषी को दिखता हो तो  हम किसी ऐसे ही प्रयास द्वारा ग्रहों की अनुकम्पा प्राप्त कर स्पष्ट योगों को भी झुठला सकते हैं? इस विषय पर पाठकों की प्रतिक्रिया का मुझे बेसब्री से इन्तजार रहेगा।  मकर संक्रांति की अग्रिम शुभकामनाएं ................   

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

वृष लग्न और जीवनसाथी

अपने पिछले लेख में हमने मेष लग्न के स्त्री व पुरुष दोनों के जीवनसाथी के बारे में चर्चा करी थी,आज आपको द्वितीय  अर्थात वृष लग्न के पुरुषों के होने वाले जीवन साथी के बारे में बताने का कुछ प्रयास करता हूँ।यदि आपकी कुंडली में वृष लग्न है तो जाहिर तौर पर आपके सप्तम में वृश्चिक राशि का आधिपत्य होगा। लग्न और सप्तम इन दोनों राशियों का यहाँ चंद्रमा से विशेष महत्त्व होता है।वृष में जहाँ चंद्रदेव उच्च होते हैं वहीँ सप्तम(वृश्चिक) में इन्हें नीच मान लिया जाता है।वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल होता है।अततः जिस जातक के सप्तम  में मंगल नाकारात्मक राशि का आधिपत्य होता है उसका जीवनसाथी भारी शरीर, भरे हुए चेहरे ,बड़ी आँखों, धार्मिक विचारधारा वाली होती है।किन्तु बातों को मन ही मन में गुंथने की उस की प्रवृत्ति होती है।आम बोलचाल में वह भाषा के साधारण नियमों का कम ध्यान रखती है अर्थात कभी कभी दूसरों के ह्रदय को दुखाने वाली बात कर देती है।
-- मंगल की उपस्थिति यदि सिंह -वृश्चिक-मकर या कुम्भ राशियों में हो व यदि अन्य ग्रहों का जरा सा भी सहयोग मिल रहा हो,तो ऐसा जातक अपनी स्त्री के भाग्य से किसी प्रकार का सरकारी सम्मान प्राप्त कर सकता है।      
--यही मंगल यदि अपनी सप्तम या अष्टम दृष्टि से दाम्पत्य के भाव को देख रहा हो तो भैय्या अब आपको अपनी सहधर्मिणी के उग्र स्वाभाव के लिए खुद को मजबूत कर लेना ही बेहतर है।
--आठवें भाव में सप्तमेश का चला जाना संकेत कर देता है की जातक को विवाह के पश्चात शारीरिक सुख पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होगा ,चाहे कारण कुछ भी बने।
--मंगल यदि सिंह या मकर राशि में हो तो जातक की स्त्री नौकरी या अन्य किसी प्रकार से धन की सहायता प्रदान करती है,ऐसा नहीं होने की अवस्था में इस योग का लाभ जातक को उसी प्रकार प्राप्त होता है,जैसा मैं ऊपर वर्णन कर चुका हूँ।
--छठवें भाव में सप्तमेश के होने से स्त्री खर्चीले व थोड़े लापरवाह स्वभाव की होने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं।
--मिथुन या मीन राशि में मंगल विवाह पश्चात धन प्राप्ति की संभावनाओं को दर्शाता है।
--मंगल किसी भी भाव में मजबूत दशा -अंशों में हो व शुक्र कमजोर पड़ रहा हो जातक सदा पत्नी भक्त बन कर रहता है।स्त्री घर के मुखिया की तरह आचरण करने वाली होती है व पति को अपने से कमतर आंकती है।अधिक पुरुष संतानों को जन्म देती है.
--यदि जातक की कुंडली में बुध और शनि की युति हो रही हो व मंगल पर शुक्र का प्रभाव किसी भी प्रकार से हो तो पुरुष को यथासंभव चिकित्सीय या योग खान पान आदि की सहायता से अपने को आतंरिक (शारीरिक ) रूप से मजबूत करने का प्रयास समय रहते कर लेना चाहिए।
--शुक्र मंगल की युत्ति में जातक को चाहिए की विवाह पूर्व ही स्वयं को शाकाहारी बना ले व विवाह पश्चात यथासंभव स्त्री को भी गरिष्ट भोजन न करने दे व कामोत्तेजित करने वाली वस्तुओं ,साहित्यों ,फिल्मों आदि से दूरी बनाये रखें
    बीच में व्यस्तताओं के कारण लिख नहीं पाया,इसी कारण कोशिश कर रहा हूँ की इस कमी को जितना जल्दी हो सके पाट दूं।किन्तु अफ़सोस है की जिस स्तर से या जिस संख्या में ग्राफ मेरे पाठकों की और संकेत करता है ,उस तरह से टिप्पणियां प्राप्त नहीं हो रही हैं।पाठक अपने सवाल सीधे मेरी मेल आई डी पर भेज देते हैं .अततः आप से अनुरोध है को जो भी जिज्ञासा या सलाह हो वह ब्लॉग के जरिये ही हो,ताकि चर्चा में सभी को रस आये,व कुछ नए योगों की तरफ हमारा ध्यान जाए।अगली मुलाक़ात तक ...............................विदा।

  ( आपसे प्रार्थना है कि  कृपया लेख में दिखने वाले विज्ञापन पर अवश्य क्लिक करें ,इससे प्राप्त आय मेरे द्वारा धर्मार्थ कार्यों पर ही खर्च होती है। अतः आप भी पुण्य के भागीदार बने   )