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रविवार, 15 जून 2014

Pitr dosh ,पित्र, पितृ दोष ( Pitr Dosh ) का कारण :कुंडली का पंचम भाव :भाग्य का भाग्य


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परम्परागत ज्योतिष में यकीन रखने वाले हम जैसे ज्योतिषी कई बार शाश्त्रों की उस रहष्यमयी भाषा की पहेलियों में उलझ कर उस सूत्र से दूर रहते हैं जो कि सारे रहस्य की कुंजी होता है.इसी क्रम  में आज हम पंचम भाव की बात करते हैं। पंचम  भाव संतान व उत्पादन का भाव है। नवम भाव भाग्य व पिता का भाव है। नवम से नवम व पिता का पिता यदि किसी भाव को माना जाय तो वह पंचम भाव है। कुंडली को जो भी भाग्य प्राप्त हो रहा है वह फलित होने के लिए भाग्य के बीज यानी पंचम भाव से प्रभावित हो रहा होता है। कई लोगों का प्रश्न होता है कि गुरूजी हमारे भाग्य भाव में तो बड़े सुन्दर ग्रह बैठे हुए हैं,फिर भी हम परेशान क्यों हैं। उन सभी बंधुओं से मेरा आग्रह है की अपने पंचम भाव पर दृष्टि डालें। क्या ये भाव पाप प्रभाव से मुक्त है ?भाग्य को फलित होने के लिए क्या प्लेटफॉर्म मिल रहा है इसका निर्णय पंचम भाव से प्राप्त होने वाली ऊर्जाओं पर निर्भर करता है। सामान्यतः नवम भाव को पितृ दोष उत्पन्न करने वाला भाव माना जाता है , किन्तु मेरा व्यक्तिगत  मत है कि पंचम भाव नवम से कहीं अधिक तीव्रता से कष्टकदायी पितृ दोष उत्पन्न करता है।
         पैदा होने वाला जातक लग्न का प्रभाव लेकर जन्म लेता है ,अगर लग्न स्वयं जातक है तो पंचम भाव उस जातक को पैदा करने वाले पिता (नवम )का भी पिता है। अर्थात आप जिस पेड़ (नवम )का फल हैं वो पेड़ पंचम रुपी बीज के गुण -दोषों पर निर्भर है। अतः सीधे रूप में अब आप जिस फल का उत्पादन (*पंचम )करने वाले हैं वो आगे जाकर  भाग्य को बीज देने वाला है। किन्तु आप जो भी फल उत्पन्न करने वाले हैं ये आपको जन्म देने वाले पेड़ (नवम )
की  गुणवत्ता पर निर्भर होगा क्योंकि आप उसी वृक्ष  का फल हैं। अब वो वृक्ष (नवम )कैसा था ये उसे जन्म देने वाले बीज (पंचम ) पर निर्भर करता है ,अतः जातक के रूप में दादा का ही रूप सामने आता है। दादा ने (पंचम )ने जो पेड़ (नवम )लगाया ,उसका फल लग्न है। अतः पंचम का भाग्य लग्न है।इसी क्रम में ये त्रिकोण चलता रहता है।
              ऐसे में ये समझना आसान हो जाता है कि क्यों पुराने समय में बुजुर्ग कहा करते थे कि दादा का बोया पोता  काटता  है। यही पितृ दोष है। पितृ दोष........... यानि पितरों द्वारा किया गया कोई पाप कर्म,अथवा पितरों का कोई ऋण जिसे उनका भाग्य होने के कारण हमें भुगतना है ,नहीं भुगतते हैं तो फिर अपने भाग्य के लिए कौन सा बीज दे रहे हैं ये हम ही तय कर रहे हैं। इसी लिए कहा गया है कि कर्म (हमारे द्वारा किया गया उत्पादन (पंचम ) )ही भाग्य को बिगाड़ता बनाता है। जैसा उत्पादन हम करेंगे ,भाग्य को पनपने के लिए वही बीज के रूप में मिलेगा।
                         ज्योतिषीय भाषा में कहूँ तो पंचम भाव सम्बन्धी उपाय बहुत आवश्यक हैं। अगर आपकी कुंडली सशक्त होकर भी परिणाम प्रस्तुत नहीं कर पा रही है तो बहुत संभव है कि आप एक अदृश्य -अनदेखे पितृ ऋण के कर्जदार हैं। सबसे पहला प्रभाव आप संतान पर पाएंगे।या तो होगी नहीं ,होगी तो स्वस्थ सुखी नहीं होगी ,या आगे जाकर आपके काबू में नहीं होगी।अर्थात संतान सम्बन्धी कई विषमताएं देखने को मिलेंगी। दूसरा प्रभाव इसका आपकी शिक्षा के ऊपर दिखाई देगा।आप चाह कर भी -लायक होकर भी शिक्षा के स्तर को उठा नहीं पाएंगे। शिक्षा प्राप्त हो भी जाएगी तो भविष्य में आपके किसी काम नहीं आएगी .आपसे कम गुणी- कम लायक लोग भाग्य के सहारे आप से आगे निकलते जाएंगे व आप हाथ मलते देखते रह जाएंगे।अगर आप भी स्वयं को ऐसी स्थिति में पा रहे हैं तो अपने दादा के बारे में ज्ञात कीजिये ,उनके किसी भाई (जो की अविवाहित रहा हो )के बारे में ज्ञात कीजिये। उपाय वहीँ से प्राप्त होगा ,रहस्य वहीं से खुलेगा। साल भर के भीतर आप अवश्य हालात में बदलाव महसूस करेंगे। पितृ दोष का असल उपाय नवम से न पकड़कर पंचम से प्राप्त करें।  लेख के प्रति आपकी अमूल्य राय की प्रतीक्षा में.….......

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