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शनिवार, 25 अप्रैल 2015

नर्मदा जी की महिमा

   शाश्त्रों में नर्मदा नदी को कितना महत्व प्राप्त है इसका उदाहरण पद्मपुराण के आदिखंड १३:०७ में देखने में आया है ………………" त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम् ,सद्यः पुनाति गांगेयं दर्शनादेव नर्मदाम् "
   अर्थात सरस्वती का जल तीन दिनों के स्नान से पवित्र  करता है ,यमुना का सात दिनों में.… गंगा का पुण्य स्नान करते ही प्राप्त हो जाता है ,किन्तु नर्मदा का जल दर्शन मात्र से ही आपको पुण्य की प्राप्ति करा मोक्ष दान कर देता है…  
      ऐसी मान्यता है कि  नर्मदा जी अकेली ऐसी नदी हैं जो पश्चिम दिशा की ओर बहती हैं ,साथ ही इन्हें कुंवारी नदी कहा गया है ,जिसका जल घर ले जाना निषेध है..... कुंवारी से मेरा अंदाजा इस बात से है कि संभवतः अपने उदगम से सागर में अपने मिलन तक नर्मदा जी रास्ते भर किसी अन्य नदी से मेल नहीं करती हैं। 
                    ऐसे ही तीर्थों के बारे में अलग अलग सूत्रों से अलग जानकारी प्राप्त होती है ....अग्नि पुराण के ११२ :०३ खंड में काशी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ बताते हुए कहा गया है कि यहाँ पहुँचने के पश्चात मनुष्य को अपने पैरों को स्वयं पत्थरों से कुचल देना चाहिए ताकि यहाँ से जा न सके........ यथा "अश्मना चरणौ हत्वा वसेत्काशीम  न हि त्येजेत "
वहीँ दूसरी ओर पुष्कर के महत्त्व को बताते हुए वनपर्व ८२ :२६:२७ में कहा कि जो अपने पितरों का पूजन यहाँ करता है वो अश्वमेघ का दस गुना फल पाता है…… …… पद्मपुराण के ५ वें खंड के २७  और ७८ वें श्लोक में पुष्कर ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ कहा गया है .... ....
                 इस विषय में ब्रह्मपुराण २५ :०४-०६  में कहा गया है कि जितेन्द्रिय जहाँ भी रहे वहीँ कुरुक्षेत्र ,प्रयाग व पुष्कर हैं.…  .जो दुष्ट है ,जिसका मन  कपटी है व जिसका अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं ,उस व्यक्ति को कोई भी तीर्थ ,दान व जप पवित्र नहीं कर सकते … संक्षेप में मन चंगा तो कठौती में गंगा ही है.……    

  (  आपसे प्रार्थना है कि  कृपया लेख में दिखने वाले विज्ञापन पर अवश्य क्लिक करें ,इससे प्राप्त आय मेरे द्वारा धर्मार्थ कार्यों पर ही खर्च होती है। अतः आप भी पुण्य के भागीदार बने  )               

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

हवन करने की विधि

  सनातन धर्म में यज्ञ का बड़ा महत्व माना गया है ,सदियों से ऋषि मुनि ग्रहों व देवताओं को प्रसन्न करने हेतु यज्ञ किया करते थे ,ऐसा वर्णन कई ग्रंथों में आया है। महर्षि  याञवल्क्य जी ने कहा है कि हे मुनियो लक्ष्मी एवं सुखशांति के इच्छुक तथा ग्रहों की दृष्टि से दुखित जनो को ग्रह शान्ति के लिए तत्सम्बन्धी यज्ञ करना चाहिए। यज्ञ के दौरान मंत्रोचारण के साथ ग्रह से सम्बंधित समिधा (लकड़ी -सामग्री आदि )  आहुति देना शुभ फलदायी होता है। सामान्यतः यज्ञ हवन आदि में आपने पंडित जी को आम व पीपल की लकड़ी ही डालते हुए देखा होगा ,किन्तु वास्तव में हवन के दौरान हर ग्रह की अपनी अलग समिधा है,जिनके उपयोग से ग्रह को प्रसन्न किया जाता है।
    सूर्य देव के लिए अर्क (मदार) की लकड़ी की आहुति देना…  इसी क्रम में चन्द्रमा के लिए पलाश (ढाक )  ,मंगल हेतु  खदिर (खैर ), बुध हेतु अपामार्गा ,देवगुरु हेतु अस्वत्थ (पीपल) ,शुक्र हेतु उदुम्बर (गुढ़ल ),शनि हेतु शमि ,राहु हेतु दूर्वा तथा  लिए कुश की आहुति देना श्रेष्ट माना गया है।
                             इन्हे क्रमशः व्याधि नाश ,सर्वकामना सिद्धि ,धनलाभ , ईष्ट को बढ़ाने ,संतान प्राप्ति ,स्वर्ग प्राप्ति ,अदृष्ट दोषों के निवारण हेतु ,दीर्घायु व आयु- बल -तेज को बढ़ाने वाली आहुतियां भी कहा गया है।
                       वशिष्ट यज्ञ पद्धति में इसका सुन्दर संकेत प्राप्त होता है …  यथा

 "आर्की नाश्यते व्याधि पलाशी सर्वकामदा
    खादरी त्वर्थ लाभायापामार्गी चेष्टवर्धिनी
               प्रजालाभाय चाश्वती स्वर्गयोदुम्बरी भवेत
               शमी शमी शमयते पापं दूर्वा दीर्घायुरेव च
   कुशा:सर्वकामार्थमानां परम रक्षणं विदुः "
  
                                आशा है ये जानकारी आपके लिए लाभप्रद हो ,व अगली बार जब भी आपके घर में हवन यज्ञ आदि हो तो आप अपने पंडित जी से नवग्रह समिधा के बारे में अवश्य पूछें .......