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बुधवार, 18 जनवरी 2012

उच्च और नीच ग्रह:क्या है वास्तविकता

 विद्वान गुरुजनों एवम नए पुराने सभी ज्योतिषी बंधुओं के मध्य सदा ही इस विषय को लेकर मतभेद बना रहा है.एक उच्च और एक नीच ग्रह की कार्यप्रणाली में क्या फर्क आ जाता है,उनकी साधारनावस्ता के मुकाबले में? वास्तविकता क्या है ,ये तो ग्रह खुद ही जाने.किन्तु अपने अध्ययन व आज तक की गई कुंडलियों की विवेचना के आधार पर जो कुछ समझ पाया हूँ ,वो ये की अपनी उच्च व नीचावस्था के समय ग्रहों की शक्तियों में बदलाव आ जाता है.स्वभाव सामान ही रहता है.जो ग्रह अकारक होकर उच्च हो जाये वो तात्कालिक और नैसर्गिकर मैत्री के अनुसार अपने प्रभावों में तेजी दिखा सकने में समर्थ हो जाता है. वहीँ जब अकारक होकर नीच हो जाता है,तो अपने स्वयं के भाव को नकारात्मक तौर पर प्रभावित करता है. यदि कारक ग्रह उच्च हो जाये  तो इसे थामना कठिन हो जाता है.व कारक होकर नीच हो तो भी अपने भाव को तो प्रभावित करता ही है.                         उदाहरण  के लिए वृश्चिक लग्न में गुरु धनेश व पंचमेश हैं. अब मान ले की यहाँ ये नवम भाव में अपनी उच्च राशी में हैं.इनका क्या प्रभाव होगा अब?गुरु विद्या के नैसर्गिक ग्रह हैं.अपनी उच्च राशि में आने से इनके प्रभाव से जातक का मानसिक स्तर प्रबल हो जाता है.अपनी आयु के अन्य जातकों से वह एक कदम आगे चलने लगता है.हर समय अपने ज्ञान को प्रदर्शित करने व सबसे आगे रहने की मनोवृति जागृत होने लगती है और जातक एक साथ कई छेत्रों में वह हाथ आजमाने लगता है.अपने से अधिक आयु के लोगों विशेषकर स्त्रियों के संगत में रहने का प्रयास करता है.परिणामस्वरूप गुरु के तेज को नियंत्रित करना उसके बस से बाहर हो जाता है.१४-१५ वर्षायु के पश्चात वह बहकने लगता है और शिक्षा में (यदि किसी का सही मार्गदर्शन उसे नहीं प्राप्त होता) वह पीछे रह जाता है.यदि कहीं इस के साथ पंचम भाव किसी अन्य योग (काल्सर्पादी) के प्रभाव में भी हो तो उच्च गुरु के बावजूद जातक की शिक्षा अधूरी रह जाती है.
                              एक अन्य उदाहरण से समझने का प्रयत्न करते हैं .तुला लग्न में शनि पूर्ण प्रभावी होते हैं.ऐसे में यदि ये लग्न में अपनी उच्च राशी में हैं तो बहुत संभव है की सप्तम में अपनी नीच दृष्टि होने और स्वयं अधिक प्रभावी होने के कारण सप्तम भाव को पूर्ण फलित होने से रोकते हैं.जातक का विवाह देर से हो सकता है,नहीं भी हो सकता है.विवाह से एक दिन पहले तक भी सम्बन्ध को खराब करने का सामर्थ्य ये रखते हैं. दशम भाव पर दृष्टी के कारण जातक इलेक्ट्रोनिक्स ,वकालत ,जल से सम्बंधित मशीनों -ठेकों आदि के काम, करता है किन्तु शत्रु दृष्टि के कारण शनि सफल होने से रोकता है. अततः उच्च के ग्रह का फल सदा शुभ ही होने वाला है इसमें मुझे संशय रहता है.
                                     वहीँ दूसरी ओर तुला लग्न में ही विराजमान सूर्य देव नीच के होकर भी सामान्यतः शुभ फल देते देखे गए हैं.किन्तु अपने स्थान को थोडा नकारत्मक प्रभाव जरूर देते हैं.जातक इछानारूप आय वाली नौकरी पाने में असमर्थ रहता है,सम्मानित पद प्रठिस्ता वह अवश्य प्राप्त करता है,किन्तु आय उसके अनुरूप नहीं रहती.वहीँ उसका जीवन साथी हर मामले में उससे आगे हो सकता है.यही सूर्यदेव कुम्भ लग्न में नवम भाव में भी नीच हो जाते हैं ,किन्तु इन्ही के प्रभाव से जातक विवाह पश्चात विदेश यात्रा के योग पा सकता हैव यदि जातक के जीवन साथी की कुंडली में भी सहायक योग हों तो जीवन साथी सरकारी नौकरी पाने में सक्षम हो जाता है. लेख लम्बा खिंचने लगा है ,अततः आज इस चर्चा को यहीं पर नियंत्रित करते हैं.भविष्य में इस विषय पर आगे चर्चा का प्रयास करूँगा.   

शनिवार, 14 जनवरी 2012

जीवन में सुख क्यों नहीं ?सुखी कैसे रहें

ईश्वर की सत्ता पर अविश्वास ही दुखों का मूल है.दुखों का परिचय ही मनुष्य को वहां से होने लगता है,जहाँ से वह स्वयं को अपना पालनकर्ता समझने लगता है.शास्त्र कहते हैं की जन्म से लेकर मरण तक मनुष्य का किसी भी अवस्था में स्वयम को निर्धारणकर्ता  मान लेना ही उसके गर्त की ओर गिराने  का मार्ग बनाता है.स्वयं को उस बच्चे के समान मानिए जिसे हम हवा में उछालते हैं तो वो डरकर रोता नहीं,अपितु खुश होकर खिलखिलाता है . कारण क्या है ? यही की उसे आप के ऊपर यह अटल विश्वास है की  आप उसे जमीन पर नहीं गिरने देंगे.आप के ऊपर यही विश्वास उसे हंसने को उकसाता है.ईश्वर की सत्ता पर यही विश्वास हमें दुखों में भी मुस्कुराने का संबल प्रदान करता है.उस परम पिता ने सब कुछ पहले ही निश्चित किया हुआ है.ठीक एक फिल्म के रायटर की तरह.बस जो भी किरदार हमें मिला है ,आवश्यकता उसमे अवार्ड विन्निंग पर्फोर्मांस की है.ताकि जब दर्शक सिनेमा हॉल से बाहर निकलें तो याद रखें  आपके किरदार को.फिल्म चाहे हिट हो या फ्लॉप.
                                                  समानरूप से जीवन में जो भी किरदार हासिल हमें हुआ है,दूसरों पर, स्थितियों पर, जलन की भावना न रख अपने कर्तव्यों का निर्वाह,बल्कि कहना चाहिए उचित निर्वाह ही  आपको ईश्वर के निकट ले जाता है.अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ा कर अध्यात्म की तलाश में निकले लोग उस कस्तूरी मृग के सामान हैं जो अपने पास की ही सुगंध को प्राप्त करने के लिए वन-वन भटककर आखिर में थककर निराश हो बैठ जाता है.
                    बड़े ज्ञानियों और गुरुजनों ने सदा ही कहा है की यात्रा अन्दर की है.अर्थात अपने मन में झांको.वहां की अच्छाइयों  बुराइयों को देखो.दूसरों के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखना इस बात की ओर संकेत है की हमें अभी तक ये ही नहीं मालूम है की अन्य सभी अपना अपना किरदार निभा रहे हैं.आप उनसे प्रभावित या विचलित जो भी हो रहें हैं,ये बताने के लिए काफी है की वो अपने किरदार को बड़े कितने बेहतर ढंग से निभा कर अवार्ड जीतने की ओर अग्रसर हैं.ओर आप काफी पीछे छूटे जा रहे हैं.
                                        महायात्रा कर जब अपने वास्तविक ठिकाने हम लौटते हैं तो यहाँ कमाए गए रुपये डालर अदि की वहां कोई कीमत नहीं है.यहाँ आपके किरदार पर बटोरी गयी तालियाँ व आपके सत्कर्मो द्वारा जमा किया पुण्य रुपी धन ही निर्णय लेता है की कितने बड़े क्रेडिट कार्ड के हकदार आप हैं.
                                       किसी ने सत्य ही कहा है की ये दुनिया तो सराय है जो हमारे कुछ ही दिनों का ठिकाना है.असल गंतव्य कहीं और ही है.जिसे आज हम अपना समझ बैठे हैं वो कल किसी और का था और कल किसी और का होना तय है.फिर काहे का मोह.  मन को भजिये ,यही द्वार है महानिर्वाण का.