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गुरुवार, 4 जुलाई 2013

मन्त्र :जो सदा सहायक हैं

मेल -फ़ोन द्वारा कई बार बार पाठकों की डिमांड रहती है की पंडित जी कोई ऐसा मन्त्र बताइये जो सहज रूप से पढ़े जा सकें व जिन के उच्चारण से मन को सुकून प्राप्त हो .कुछ मन्त्र आप लोगों को बता रहा हूँ जिनका जाप सामान्यतः अपने दैनिक जीवन में आप लोग रोज कर सकते हैं ,साथ ही ये मन्त्र आपको मन की शुद्धि में सहायक होते हैं .
  प्रातःकाल सूर्य देव को हाथ जोड़कर इन मन्त्रों का जाप किया जा सकता है :--
१ . " ॐ अहिं सूर्यो सहस्त्रांशों तेजो राशे: जगत्पते 
      अनुकम्पय्माम भक्त्याम ग्रहानाग्र्यम दिवाकरो ".

२ . " एक चक्रों राथोस्य दिव्य कनक विभूषितः 
      समे भवतु सुग्रीतः पदम्हस्तो दिवाकरः "

.(ये दोनों मन्त्र मनुष्य के भीतर बड़ी तेजी से शक्ति का संचार करते हैं ) 

पूजा स्थल पर सामान्य रूप से हाथ जोड़कर नवग्रहों की उपासना इस मन्त्र के द्वारा की जा सकती है :---
      
१.          " ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी ,भानु शशि भूमिसुतो बुधस्य्ह 
            गुरुस्य शुक्रो शनि राहु केतु ,कुरुवन्तु सर्वे मम सुभ्प्रभातम "     


२.   "सूर्यः शौर्य मथेन्दु रुच्च पदवीं ,संमंगलम मंगल:   सदबुद्धिम च बुधो , गुरूशच  गुरुताम शुक्रः सुखं सम शनि
         राहुर्बाहुबलं करोतु विपुलं ,केतु कुलस्योउन्नति ,नित्यं प्रीती करा भवन्तु भवतां ,सर्वे प्रसन्ना ग्रहा: "

     (पाठक यकीन करें की इस मन्त्र से स्वयं मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त किया है .ग्रहों की कृपा मुझ पर सदा रही ,हर बुरी परिस्थिति से मैंने पार  पाया .जब भी स्वयं को अकेला पाया ,जब भी मन निराशा से भरा इस मन्त्र ने सदा उबारा )    

अपने बच्चों के माथे पर तिलक करते समय इस मन्त्र को पढ़ा जा सकता है ,जो सदा उसकी रक्षा करेगा .

१ .   " ब्रह्मा विष्णु श्च रुद्रश्च लोकपाल दिधॆश्वरह 
         रक्षन्तु सर्व दात्रानी ,लालाटेति लकीक्रिते "


मन्त्रों के सम्बन्ध में सदा से कुछ साजिशों के तहत,( विशेषकर उस वर्ग द्वारा जो संस्कृत भाषा पर अपना एकाधिकार समझता रहा व स्वयं को विशेष मानते रहने के भ्रम तले ,खुद की सत्ता को बनाये रखने हेतु उसने आम जनता को कई कई बहानो द्वारा ईश्वर की स्तुति से दूर रखा )उच्चारण सम्बन्धी कुछ नियम तय किये गए हैं,जिनका मैं  सदा विरोधी रहा व  इसी कारण अपने जात भाइयों से भी भली बुरी सुनता रहा हूँ .प्रभु की उपासना ,उसकी भक्ति ,उसकी शरण के लिए यदि कोई नियम तय होता है ,यदि कोई स्तर लागू होता है तो वो मात्र श्रद्धा का होता है ,मन की पवित्रता का होता है .इसके सिवा कुछ नहीं .भला जिसने अक्षरों का ज्ञान प्राप्त न किया हो ,जिसे प्रभु ने वाणी ही न दी हो क्या वो प्रभु भक्ति के अपने नैसर्गिक अधिकार से वंचित हो जाना चाहिए ?कदापि नहीं ,ऐसा कहना ,सोचना भी मैं पाप  मानता हूँ .शबरी जटायु  कई उदहारण ऐसे हैं जो इन बातों को प्रमाणित करते हैं .अतः मन की पवित्रता के साथ हर मनुष्य का अधिकार है की वो चाहे जिस भाषा में ,चाहे जिस अंदाज से चाहे जिस अवस्था में वह प्रभु की वंदना करे ,उसे पुकारे ,उस का आभार प्रकट करे .मरा -मरा रटने वाले वाल्मीकि देव ऋषि का पद पाने में सफल हुए .  इसी के साथ आज्ञां दीजिये ......जय श्री राम ..........           

Grahan Dosh... . कुंडली में ग्रहण दोष

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कई बार पाठकों ने अनुरोध किया है की आप ग्रहण दोष पर भी कुछ कहें .इसी क्रम में आज कुछ चर्चा करते हैं .सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना ,धारण करना ,मान जाना आदि .ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . .पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र  सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .
                  अब ग्रहण क्या होता है ?राहु व केतु का सूर्य या चन्द्र के साथ युति करना आमतौर पर ग्रहण मान लिया जाता है .किन्तु वास्तव में सूर्य ग्रहण मात्र राहु से बनता है व चन्द्र ग्रहण केतु द्वारा .ज्योतिष में बड़े जोर शोर से इसकी चर्चा होती है .बिना सोचे समझे इस दोष के निवारण बताये जाने लगते हैं .बिना यह जाने की ग्रहण दोष बन रहा है तो किस स्तर का और वह क्या हानि जातक के जीवन में दे रहा है या दे सकता है .बात अगर आकड़ों की करें तो राहु केतु एक राशि का भोग १८ महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है .यानी दुनिया की एक तिहाई आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब कई ज्योतिषियों द्वारा राहु केतु की दृष्टि भी सूर्य चन्द्र पर हो तो ग्रहण दोष होता है .हम जानते हैं की राहु केतु अपने स्थान से पांच सात व नौवीं दृष्टि रखते हैं .यानी आधे से अधिक आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब ये आंकड़ा कम से कम मुझे तो विश्वसनीय नहीं लगता भैय्या .इसी लिए फिर से स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह  एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है ,और इस टर्मिनोलॉजी के अनुसार संसार के लगभग दस प्रतिशत से कम जातक ही ग्रहण दोष का कुफल भोगते हैं .हाँ आंकड़ा अब मेरी पसंद का बन रहा है. अन्य प्रकार की युतियाँ कुछ असर डाल सकती है जिनके बारे में आगे जिक्र करूँगा।किन्तु किसी भी भ्रमित करने वाले ज्योतिषी से सावधान रहें जो ग्रहण दोष के नाम पर आपको ठग रहा है .दोष है तो उपाय अवश्य है किन्तु यह बहुत संयम के साथ करने वाला कार्य है .मात्र  तीस सेकंड में टी .वी पर बिना आपकी कुंडली देखे ग्रहण दोष सम्बन्धी यंत्र आपको बेचने वाले ठगों से सचेत रहें ,शब्दों पर पाठकों से थोडा रिआयत चाहूँगा ,बेचने  वाले नहीं अपितु भेड़ने वाले महा ठगों से बचना भैय्या .एक पाठक का पैसा भी बचा तो जो भी प्रयास आज तक ब्लॉग के जरिये कर रहा हूँ ,समझूंगा काम आया .   जैसा की हमें ज्ञात है सूर्य हमारी कार्य करने की क्षमता का ग्रह है,हमारे सम्मान ,हमारी प्रगति का कारक है .राहु के साथ जब भी यह ग्रहण दोष बनाता है तो देखिये इसके क्या परिणाम होते हैं .राहु जाहिर रूप से बिना धड का ग्रह  है ,जिस के पास स्वाभाविक रूप से दिमाग का विस्तार है .यह सोच सकता है,सीमाओं के पार सोच सकता है .बिना किसी हद के क्योंकि यह बादल है ..जिस कुंडली में यह सूर्य को प्रभावित करता है वहाँ जातक बिना कोई सार्थक प्रयास किये ,कल्पनाओं के घोड़े  पर सवार रहता है .बार बार अपनी बुद्धि बदलता है .आगे बढने के लिए हजारों तरह की तरकीबों को आजमाता है किन्तु एक बार भी सार्थक पहल उस कार्य के लिए नहीं करता, कर ही नहीं पाता क्योंकि प्लान को मूर्त रूप देने वाला धड उसके पास नहीं है .अब वह खिसियाने लगता है .पैतृक  धन  बेमतलब के कामों में लगाने लगता है .आगे बड़ने की तीव्र लालसा के कारण चारों तरफ हाथ डालने लगता है और इस कारण किसी भी कार्य को पूरा ही नहीं कर पाता .हाथ में लिए गए कार्य को (किसी भी कारण) पूरा नहीं कर पाता ,जिस कारण कई बार अदालत आदि के चक्कर उसे काटने पड़ते हैं .सूर्य की सोने जैसी चमक होते हुए भी धूम्रवर्णी  राहु के कारण उसकी काबिलियत समाज के सामने मात्र लोहे की रह जाती है. उसकी क्षमताओं का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता .अब अपनी इसी आग को दिल में लिए वह इधर उधर झगड़ने लगता है.पूर्व दिशा उसके लिए शुभ समाचारों को बाधित कर देती है .पिता से उसका मतभेद बढने लगता है .स्वयं को लाख साबित करने की कोशिश भी उसे परिवार की निगाह में सम्मान का हक़दार नहीं होने देती .घर बाहर दोनों जगह उसकी विश्वसनीयता पर आंच आने लगती है .वहीँ दूसरी और केतु (जिस के पास सिर नहीं है ) से सूर्य की युति होने पर  जातक बिना सोचे समझे कार्य करने लगता है .यहां वहां मारा मारा फिरता है .बिना लाभ हानि की गणना किये कामों में स्वयं को उलझा देता है .लोगों के बहकावे में तुरंत आ जाता है . मित्र ही उसका बेवक़ूफ़ बनाने लगते हैं 
                     इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय  कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं . चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी  राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी ख़ास नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है. ध्यान दीजिये की राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण  ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है .ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकार की दुश्वारियों का कारण बनता है . अतः एक ज्योतिषी की जिम्मेदारी है की जब भी किसी कुंडली का अवलोकन करे तो इस दोष पर लापरवाही ना करे .उचित मार्गदर्शन द्वारा क्लाइंट को इस के उपचारों से परिचित कराये .किस दोष के कारण जातक को सदा जीवन में किन किन स्थितियों में क्या क्या सावधानियां रखनी हैं ताकि इस का बुरा प्रभाव कम से कम हो , इन बातों से परिचित कराये . कोशिश करूँगा की कभी भविष्य में इन योगों को कुंडलियों का उदाहरण देकर बताऊँ .....आशा है लेख आपको पसंद आएगा ..... नमस्कार ....   
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