शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

मृत्यु की काट,,सप्तम भाव

--**रोग व मृत्यु के बीच खड़ी दीवार..आपकी अर्धांगनी --**
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"लेकर कर में पत्रिका
 हिय से लियो विचारी
 मृत्यु और शत्रु के
 बीच खड़ी है नारी.."
     सप्तम भाव पर बहुत कुछ कहा गया है...यह रोग भाव व मृत्यु भाव के मध्य खड़ी दीवार है....पुराणों में सत्यवान व सावित्री की कथा आपने सुनी होंगी....सत्यवान की अखंड मृत्यु को अपने सतीत्व के बल पर सावित्री ने परास्त किया,,ऐसा प्रमाण है.....कालिदास की सफलता के पीछे उसकी स्त्री ही खड़ी दिखाई देती हैं..इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने युद्ध लड़े गए,,उस सबके पीछे जऱ जोरू व जमीन ही रही है,,,इसी कारण सप्तम व द्वितीय मारक कहे गए हैं,,व कालपुरुष का आरम्भ करता मंगल,,चतुर्थ में नीच फल देने लगता है...कितनी हैरानी है कि भूमि का कारक होकर भौम अर्थात मंगल,,भूमि के भाव मे ही नीच हो जाता है,,,,कभी सोचा है आपने क्यों??...सोचिये...इसी कारण ये भाव झगड़े की जड़ है,,,
                  सैकड़ों प्रमाण हैं कि किसी जातक की स्त्री ने अपनी सेवा द्वारा अपने जीवन साथी के बड़े बड़े रोगों को ठीक किया है..कालपुरुष में देखें तो यह आय का नवम भाव है,,अर्थात पुरुष की आय को भाग्य देने का स्थान...इसलिए पुराने लोग विवाह के बाद घर पर लक्ष्मी का आगमन होना कहा करते थे.. जिस पुरुष ने अपने जीवनसाथी का महत्व पहचान लिया,,संसार मे उससे अधिक शक्तिशाली कोई नही...यह भाग्य की आय का भाव है..अर्थात भाग्य को बरकत तभी है जब सप्तम बलवान है..यह देवताओं के लिए तक पुण्य स्थान रहा है..कितना रोचक संयोग है कि सप्तम सदा लग्नेश का शत्रु ग्रह होता है,,व अपनी मूल त्रिकोण अथवा उच्च की राशि मे यदि ग्रह लग्न में विराजमान होता है तो सप्तम में स्वतः ही उसकी नीच राशि आ जाती है...हालांकि ये क्रम सभी भावों से बनता है,,किन्तु ध्यान रखने वाली बात है कि लग्न से ही अर्धनारीश्वर  का निर्माण माना गया है.…लग्न यदि संसार को विसध्वंश करने में सक्षम शिव का त्रिनेत्र है,,तो सप्तम संसार को प्राण देने वाली योनि है,गर्भ है..यह प्राणों की रक्षा का भाव है....अतः पाठकों को चाहिए कि यदि अकाल मृत्यु से बचना है,,,रोगों की काट करनी है,,तो अपने जीवन साथी के आगे नतमस्तक होना सीखिए..... लेख के बारे में आपकी अमूल्य राय से अवश्य अवगत कराइये..

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