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सोमवार, 24 सितंबर 2018

जटायु...

******* जटायु******
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              आंखों के किनारों पर सिमटते अंधेरे ने आभास दिया,,कि ये जीवन की अंतिम सांझ बेला है,,,अब संभवतः  अपने पित्रों के सम्मुख जाने का समय नजदीक है....किन्तु एक कसक रह जायेगी,,,अपनी अंतिम यात्रा वो उस सम्मान के साथ पूर्ण नही कर सका,,जिस सम्मान का वाहक सदा से उसका कुल रहा है..निरंतर मंद होती स्वास की गति अब मानो निर्वाण यात्रा को कूच करने का स्मरण बार बार करा रही है..अपने कुल को कलंक लगा गया मैं,, अपना कर्तव्य नही निभा सका...क्या अब कभी इतिहास में उसका वंश  सम्मान का भागी नही रहेगा,,पूर्वजों की ख्याति क्या उसके इस असफल प्रयास से धूमिल हो जाएगी.....
              भाग्य की विडंबना रही है कि अपनी मुख्य उड़ानों में वो हर बार असफल ही रहा है...वर्षों पहले सूर्य तक पहुंचने की उसकी जिद का हश्र ,,अंत मे उसके ज्येष्ठ भ्राता सम्पाती के पंख जलकर पूर्ण हुआ..अपने अनुज के प्राणों की रक्षा के लिए ,,सम्पाती ने उसे सूर्य के प्रचंड ताप से बचाने हेतु अपने पंखों में छिपा लिया...उसके प्राण तो बच गए,,पर भाई पंख विहीन हो गया..अनुज को पश्चाताप करते देख सम्पाती ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कितने स्नेह से कहा था कि ,,,अब तू ही मेरी उड़ान है,,,कालांतर में तेरा ही प्रयास मुझे विष्णु के कार्य का भागी बना मोक्ष प्रदान करेगा....
                     बड़ा भाई अभी भी समुद्र के किनारे कंदराओं में मोक्ष की राह ताकता होगा,,,अपने छोटे भ्राता पर उसका अखंड विश्वास रहा है...जाते समय राम भी किंतने विश्वास से सीता का चौकसी करने का भार उसके ऊपर डाल गए थे,,,,नही,,नही,,,वो यूं सबके विश्वास का हनन कदापि नही कर सकता....वो अपने ज्येष्ठ के बलिदान को यूं निरर्थक नही बना सकता....अभी भाई जीवित है,,इसका सीधा अर्थ है कि अभी अंतिम उड़ान बाकी है...नही अभी मेरे प्राण नही निकल सकते...अभी कर्तव्य का निर्वाह  होना शेष है ..अपने कुल के मान को अपने बूढे पंखों पर अपनी अंतिम सांस तक ढोना है..और अभी प्राण शेष हैं....गिद्ध ने प्राण देना सीखा है,,सम्मान देना नही..
               कर्तव्य के भान ने मानो जटायु के शरीर मे चेतना का संचार किया...कालांतर में जितना बल दसग्रीव के बाहुबलियों ने अंगद के पैर को डिगाने के प्रयास में लगाया होगा,,,,उससे सहस्त्र कोटि अधिक बल जटायु को अपने नेत्र खोलने में लगाना पड़ा...पलकों के कोने से आते प्रकाश ने ,,,विचारों को अधिक जागृत किया....हे प्रभु.....पता नही अभी कितने पल बीत गए जटायु को चेतनाहीन हुए..किस दिशा में वो असुर भगवती सीता को ले गया,,कुछ ज्ञात नही....दाहिने पंख में हुए घातक वार ने जटायु को क्षण भर के लिए चेतना शून्य किया ही था कि सीने के ठीक मध्य में रावण की कटार का गहरा वार मानो प्राणों का अंत ही कर गया था....
                   सीता भय से चीखती होंगी....जटायु को धरती पर गिरते गिरते भगवती सीता की अंतिम चीख मानो पुनः स्मरण हो आई..सीता के श्वसुर दशरथ जटायु के परम मित्रों में रहे हैं..इसी कारण सीता सदा उन्हें पिता तुल्य सम्मान देती आई हैं...आज पुत्री विपदा में है और जटायु को प्राणों का मोह हो रहा है,,,,धिक्कार है इस जीवन पर....आत्मसम्मान ने आगे बढ़कर मानो प्राणों पर थूका हो.......
       नही नही,,प्राणों का मोह नही,,,,जटायु की आत्मा त्राहि कर उठी,,प्राणों का मोह जटायु को कभी नही रहा.. ये यम की फांस है जो निरंतर उसे जकड़ती जा रही है.....किन्तु अभी बहुत से दायित्वों का निर्वाह बाकी है....नही ,,,,,यम के रथ को रुकना ही होगा....गिद्ध ने अपनी समस्त इच्छाशक्ति को अपने पंखों पर हस्तांतरित किया.....अभी अंतिम उड़ान शेष थी,,,,,,,वो उड़ान शेष थी,, जो इतिहास में जटायु का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित करने वाली थी.......वो उड़ान शेष थी जो भाई सम्पाती को राम कार्य का भागीदार बना,, मोक्ष का अधिकारी बनाने वाली थी...अभी कुल का सम्मान शेष था,,.....................अभी जटायु शेष था....
                            एक झटके के साथ गिद्ध ने अपने घायल वृद्ध शरीर को हरकत में पाया..पंखों ने मानो फड़फड़ाकर अपने अस्तित्व के अंतिम युद्ध हेतु हुंकार भरी..जटायु ने धरती का स्पर्श कर प्रण लिया,,"हे वसुन्धरे,,,,अब यदि तुम्हारी पुत्री को साथ ला पाया तो ही जीवित अवस्था मे तुम्हारा स्पर्श करूँ,, अन्यथा मेरी देह सदा तुम्हारी ऋणी रहेगी.."
          किस ओर गया होगा पापी..गिद्ध की उड़ान में एक कमी सदा रही है कि काग की भांति वो तीव्रता से नही उड़ सकता..किन्तु उड़ान में ऊंचाइयों को प्राप्त करने में गिद्ध दक्ष है...ब्रह्मांड में कोई भी जटायु के समान आकाश का स्पर्श नही कर सकता.... वृद्ध व घायल देह से यह कठिन अवश्य प्रतीत होता है,,किन्तु ऊंचाइयों का कोई भी लक्ष्य गिद्ध के लिए असंभव नही..बचपन मे वो सूर्य की परिधि को छूने हेतु सूर्य की कक्षा में तक प्रवेश कर चुका है,,वो सूर्य देव के सारथी अरुण का पुत्र है..वह विष्णु के वाहन,,,महान गरुड़ देव् की कुल परंपरा का ध्वजवाहक है...
                अपने समस्त कौशल,,अपने बल ,,अपने स्वाभिमान का परिचय संसार को देने का आज अंतिम अवसर है...जटायु ने उर्ध्वगामी उड़ान के लिए पंखों को शरीर के निकट खींचा....गिद्ध ने अपने  सर्वोत्तम हुनर का परिचय दिया......हां यहां इतनी ऊंचाई से अब चारों दिशाओं पर दृष्टि पहुंचती है......गिद्ध को दूरदृष्टि हासिल है.....बहुत दूर की वस्तु भी गिद्ध बड़ी आसानी से सहज देख सकता है....नही ,,,,,दूर दूर तक कुछ नही है.......क्या मुझे आने में विलंब हो गया,,,,रावण मेरी पहुंच से दूर चला गया...
              अचानक दृष्टि दक्षिण की ओर टिकती है......दक्षिण में पचास योजन की दूरी पर आकाश में एक बिंदु दिखाई देता है....हां वो रहा कुकर्मी......वो रही सीता.....गिद्ध ने अपने समस्त बल को अपने पंखों पर नियंत्रित किया,,और दक्षिण में गोता खाया...
                तेजी से जटायु रावण की दिशा में बढ़ा... गिद्ध लंबी उड़ान के पक्षी हैं..सहस्त्रों योजन की यात्रा वो बेहिचक कर सकते हैं,,,,किंतु  अन्य पक्षियों की भांति अचानक से गति बढ़ाना ,,गिद्ध के लिए कठिन है..  ..मुख से सफेद फेन निकलने लगा वृद्ध जटायु के....गला सूखने से कंठ भी अवरुद्ध हुआ जाता है....किन्तु तेज,,,, और तेज.....
                          दृष्टि धुँधलने सी लगी है...नही नही आयु दोष के कारण नही...गिद्ध दृष्टि कभी आयु की मोहताज नही रही....अपनी असफलता के भय से निरीह पक्षी की आंखें ,,आंसुओं से लबरेज हैं..जगहंसाई का भय ,,आंसुओं के रूप में जटायु की दृष्टि को बाधित कर रहा है....हालात जब भी नियंत्रण से बाहर जाने लगते हैं,,आंखें सदैव से इसकी सर्वप्रथम सूचक होती हैं..
                               अचानक रावण को अपने सिर पर किसी परछाई का आभास हुआ....जटायु के रूप में लंकेश ने यम को साक्षात अपने निकट पाया....विस्मय से रावण की आंखें फटी रह गईं.....जिसे मृत समझ पीछे छोड़ आया था वो यूं काल का दूत बना सिर पर कैसे खड़ा है,, ये विश्वास से परे है......
                           तीन नाखूनों को अपनी आंख के निकट भीतर  तक धंसता हुआ रावण ने स्पष्ट महसूस किया......सीता यान में बेसुध पड़ी हैं...जटायु अब किसी कीमत पर रावण को आगे बढ़ने नही देगा......यान के बाहरी पंख पर जटायु ने वज्र प्रहार किया.....यान बायीं ओर झुका......जटायु का शरीर निरंतर बहते रक्त के कारण अब कमजोर पड़ने लगा था.....रावण भी निरंतर हो रहे प्रहारों से अब निढाल सा होने लगा था,,,,,शरीर के कई हिस्से मानो गहरे तीरों से बिंधे हों..जटायु यदि अधिक देर तक यूं प्रहार करता रहा,,, तो रावण अथवा यान किसी को भी वह भूमि पर पटकने ही वाला है....ये आभास होते ही रावण ने जटायु को अपने से दूर रखने हेतु निरंतर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी.....एक के बाद एक तीर जटायु के शरीर को बींधते चले गए....अंतिम प्रहार के रूप में जटायु ने अपने गिरते शरीर को यान से टकराने का प्रयास किया........रावण इस वार के लिए तैयार था..तुरंत अपनी तलवार से उसने जटायु के दाहिने पंख को उसके शरीर से अलग कर दिया......जटायु कटे वृक्ष की भांति जमीन पर गिरा.....पृथ्वी को दी अपनी सौगंध की लाज उसने रखी......यान नजरों से ओझल हो गया....... इतिहास में जटायु सदा के लिए अमर हो गया..
                  रामायण में वर्णित पात्रों में जटायु की अंतिम क्रिया हम स्वयं चक्रपाणी के अवतार राम के हाथों होता देखते हैं...जो सौभाग्य पिता होकर भी दशरथ को प्राप्त न हुआ,,,वह सौभाग्य भक्त होकर जटायु महाराज ने सहज ही हासिल किया...बैकुंठ की प्राप्ति जटायु को हुई......भक्तवत्सल प्रभु राम की जय......

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