मंगलवार, 20 मई 2014

बालारिष्ट : नवजात (नए जन्मे )जातक हेतु सूत्र

 बालारिष्ट शब्द आप सभी ने अवश्य सुना होगा। आइये आज इस विषय पर कुछ चर्चा की जाय।
          जैसा की नाम से ही स्पष्ट हो जाता है ,बालारिष्ट अर्थात बालपन (बचपन ) में ही अरिष्ट की संभावनाएं। ये शब्द किसी एक योग का नाम नहीं है अपितु कई प्रकार  के आयु ,स्वास्थ्य सम्बन्धी दुर्योगों (बुरे योगों ) को बालारिष्ट की श्रेणी में रखा जा सकता है। आइये देखते हैं की शाष्त्र व विद्वान गुरुजनो का इस पर क्या कहना है    
 "चन्द्रसूर्यगृहे  राहुश्चन्द्रसूर्ययुतो यदि
सौरि भौमेक्षतम लग्न पक्षमेकं न जीवति "
   अर्थात किसी नए जन्मे बच्चे के कर्क या सिंह राशि में ग्रहण योग की पुष्टि होती हो (राहु कर्क में चन्द्र या सिंह में सूर्य के साथ हो ) व ऐसे में शनि तथा मंगल की दृष्टि भी लग्न पर होती हो तो बालारिष्ट समझना चाहिए। कहते हैं की ऐसे जातक के लिए एक पक्ष (१५ दिन )भी निकालने भारी हो जाते हैं।
 
       "जातकस्य विलगनस्था:शुक्रसूर्यशनैश्चरा:
       द्वादस्थो गुरुश्चेव पञ्चमासं न जीवति "
   बालक के जन्म के समय लग्न में शुक्र-सूर्य-शनि हों व ऐसे में देवगुरु भी द्वादस्थ हो रहे हों तो शुरूआती पांच मॉस बालक के लिए भारी होते हैं।
    

"लग्ने भाष्कर पुत्रश्चनिधने भूमिनन्दनः
 षष्ठे यदि भवेज्जीवो द्विमासनिम्रयते    "
    भाष्कर के पुत्र अर्थात शनि यदि लग्न में हों ,व भूमि नंदन अर्थात मंगल यदि अष्ठम में हों व ऐसी अवस्था में जीव अर्थात देवगुरु षष्ठम में विराजमान हो जाएँ दो शुरूआती दो माह भी जातक के लिए अशुभ हो जाते हैं।     


"पक्षेसिते भवति जन्म यदि क्षपायम
 कृष्णे त्वथा हानि शुभाशुभ दृष्टमूर्ति:
 तं चन्द्रमा रिपुविनाशगतोपि यत्ननाद
आपस्तु रक्षति पितेव शिशुम् न हन्ति "  
   शुक्ल पक्ष में रात्रि का जन्म हो अथवा कृष्ण पक्ष में दिन का  जन्म हो तो शत्रु अथवा मृत्यु घर में भी चन्द्रमा बैठा हो तो भी वह चन्द्रमा पिता के समान बालक की रक्षा करता है। पाठकों व अन्य ज्योतिषी बंधुओं से आग्रह  है कि बालारिष्ट कहते समय इस सूत्र को अवश्य ध्यान रखा जाय।
      चन्द्रमा के पक्ष बल का बड़ा महत्त्व है। शुभ ग्रहों की चन्द्रमा पर दृष्टि अथवा चन्द्रमा जिस भी राशि में हो ,(भले ही वो पाप ग्रह की राशि हो) उस राशि स्वामी से देखा जाता हो,या उससे युति करता हो , तो वह शुभ फल प्रदाता ही होता है ,अर्थात ऐसे में स्वास्थ्य परेशानियां भले ही हो जाएँ किन्तु बालक का अरिष्ट नहीं होता ……। यथा ……
    "स्थितः शशि क्रूरखगस्य राशौ राशीश्वरणापि विलोकितश्य
     तद्वर्गगोवा यदि तेन युक्तं कुर्यादलम्  मंगलमेव नान्यत "        
बालारिष्ट की अवस्था में शीघ्र योग्य ब्राह्मणो द्वारा महामृत्यंजय का पाठ जातक के निमित करा लेना चाहिए। कुछ अन्य उपायों के रूप में माता की पहनी हुआ चांदी किसी भी प्रकार से बालक के शरीर के संपर्क में रखनी चाहिए। चन्द्रमा के लिए नानी द्वारा खीर बनाकर शिव को अर्पित करनी चाहिए।
         इसके अलावा अन्य कई प्रकार की युतियां भी बालारिष्ट की श्रेणी में रखी जा सकती हैं,स्थानाभाव के कारण जिनका जिक्र यहाँ नहीं किया जा रहा है।भविष्य में उनका जिक्र करेंगे। तब तक विदा ………
लेख के प्रति आपकी अमूल्य राय अवश्य दें ....... जय श्री राम         

















 

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