बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

ग्रहों की नैसर्गिक मैत्री व उच्च - नीच का प्रभाव

बात जब भी ग्रहों की होती है तो अक्सर उनके मैत्री चक्र का भी जिक्र होता है.सामान्यतः ग्रह को अपने मित्र की राशि में उच्च व शत्रु की राशि में नीच होना चाहिए.किन्तु आप ध्यान दीजिये की वास्तव में ऐसा नहीं है. ग्रह का शत्रु राशि में होना उसे अपना नैसर्गिक हुनर ,अपना स्वाभाविक रूप दिखाने से रोकता है वहीँ मित्र राशि का ग्रह अपने स्वभावानुसार सरलता से अपने गुण प्रदर्शित कर लेता है.हर ग्रह के अपने अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के लक्षण होते हैं,गुण अवगुण दोनों होते हैं.मंगल का गुण युद्ध के मैदान में देखने को मिलता है,अवगुण हत्या लूटपाट के रूप में सामने आता है.चंद्रमा का गुण कला ,संगीत ,स्वाभाव की सौम्यता  के रूप में दिखता है,तो अवगुण मानसिक संताप,डर के तौर पर देखा जाता है.शुक्र का गुण स्टाइल ,नफासत ,हुनर के रूप में सामने आता है तो अवगुण छिछोरापन दिखाने वाला होता है.गुरु का गुण ज्ञान की भूख दिलाता है तो अवगुण अपने सीमित ज्ञान को भी दूसरों से श्रेष्ट का भुलावा देना है.इसी प्रकार ग्रहों के अपने अपने गुण अवगुण देखने को मिलते हैं.
                      शुक्र की दोनों राशियों में ब्रहस्पति को शत्रु राशि स्थित माना जाता है,किन्तु वहीँ दूसरी और अपने शत्रु की मीन राशि में आते ही दैत्यगुरु शुक्र उच्च का प्रभाव देने लगते हैं.कारण यह है की गुरु के घर में शुक्र अपनी शक्तियों को गुरु के शुभ प्रभाव से मिला देता है तो स्वयं किसी भी प्रकार के भटकाव से बचकर अपना गुण बेहतरीन रूप से प्रदर्शित करने वाला बन जाता है.इसीलिए मैं व्यक्तिगत रूप से मीन राशी के शुक्र से बनने वाले मालव्य योग को तुला व वृष के मालव्य योग से बेहतर मानता हूँ.यहाँ गुरु की सदबुद्धि जो शामिल होती है. जातक कम बोलने वाला व सभ्य होता है. वहीँ अपने परम मित्र बुध की कन्या राशि में इस शुक्र पर कोई लगाम नहीं रह पाती,अततः वह अपने अवगुणों को प्रदर्शित करने वाला माना जाता है.  भोग विलास ,दिखावे का यहाँ   चरम दिखाई पड़ता है.  
                                             परम मित्र होकर भी मंगल चंद्रमा के घर को अपनी नीचता द्वारा बिगाड़ने हेतु जाने जाते हैं वहीँ शत्रु शनि के घर पर  उच्च के हो जाते हैं.वास्तव में मंगल शूरता के कारक हैं.भला ठन्डे, सौम्य व स्वाभाविक शांत चंद्रमा के घर में उन्हें अपनी शूरता दिखाने का मौका कहाँ मिलने वाला था.इसके लिए अपने शत्रु की राशि मकर में आते ही ये अपने सारा हुनर दिखाने वाले बन जाते हैं. मकर में ये शारीरिक दक्षता की संभावनाएं दिखाते हैं तो कर्क में आकर अपनी उग्रता .शूरता को थामने हेतु मादक पदार्थों या अन्य किसी प्रकार का ऐब देने वाले बन जाते हैं.मकर में आदेश देने वाले होते हैं व कर्क में किसी का भी आदेश न मानने वाले.
                          भावनाओं ,व कला के कारक चन्द्र को  वृष के रूप में जब मोहक अदाएं व स्वयं को नफासत से प्रदर्शित करने वाले शुक्र (शत्रु ही सही) का साथ मिल जाता है तो गन्धर्व जैसे योगों का निर्माण होता है.चन्द्र के गुण यहाँ खुल कर सामने आने लगते हैं .उनकी कला को विस्तार प्राप्त होने लगता है. अपनी राशि में चन्द्र प्रबल भावनात्मक असर देने वाले हैं,तो मंगल की नाकारात्मक राशि में मित्र के घर होते हुए भी अपनी नैसर्गिक सौम्यता त्यागकर कुटिल चालें चलने,व भावनाओं को अन्दर ही अन्दर दबाने के लिए कोशिश करने वाले ग्रह के रूप में देखे जाते हैं.
                         पात्र -कुपात्र के चक्र से दूर रहकर गुरु का काम सबको शिक्षा,ज्ञान व संयम का दान देना है.शांत रहकर गुरु कर्क राशि में अपना ये दायित्व बेहतर तरीके से निभाते देखे जाते हैं. मांगने पर उचित सलाह देते हैं (ध्यान दें की आजकल मैनेजमेंट आदि से सम्बंधित सभी कार्य वास्तव में गुरु की देन हैं.) वहीँ शनि (जिनका काम चीजों को पृथक करना है, न्याय  अन्याय की बात करते हुए हालत का विचार करना है,दूध का दूध पानी का पानी करना है )की मकर राशि में आते ही स्वयं को असहाय पाते हैं.क्योंकि वो भेद भाव नहीं कर सकते.चीजों को ,जातकों को अलग अलग नहीं कर सकते (गुरु होने के नाते )  .ऐसी अवस्था में ये नीच मान लिए जाते हैं तो क्या अचम्भा है?यहाँ ये बिना मांगे सलाहें देते फिरते हैं.अपने ज्ञान के प्रदर्शन के लिए हर जगह अपनी टांग फंसाते दिखते हैं.भाषा के स्तर पर दूसरों का ह्रदय दुखाते हैं .
                                     इसी प्रकार सूर्य के सर्वाधिक निकट के ग्रह बुध महाराज ,सबसे जल्दी अस्त व बार बार वक्री होते हैं.अततः उच्च के रूप में इन्हें स्वयं की  कन्या राशि ही भाती है.अपनी बार बार बदलती अवस्था के कारण ये खुद के घर में स्वयं को अधिक सहज पाते हैं. बोलने की क्षमताओं के कारण शत्रु गुरु की मीन राशि पर आते ही इनकी बोली को ज्ञान का छौंका लग जाता है तो फिर भला क्यों ये किसी की सुनने वाले .नेतागिरी या बेधड़क बोलने के कामों में ,किसी को नीचा दिखाने वाली बातों में इनका कोई सानी नहीं रहता.किन्तु अपनी उच्च राशि में ये सारगर्भित बातें ,सटीक बातें करने वाले बन जाते है,
                                         इसी प्रकार हम अन्य ग्रहों का उदाहरण भी समझ सकते हैं.अततः जहाँ तक समझ में आता है ,ज्योतिषियों को शत्रु राशि में बैठे ग्रह व नीच के ग्रहों में अंतर कर ही कुंडली का कथन करना चाहिए.दोनों स्थितियां भिन्न हैं ,व रिसल्ट भी भिन्न ही देती हैं.    प्रस्तुत लेख पर आपकी अमूल्य टिपण्णी की  बाट जोहूँगा तथा तभी आगे  ग्रहों के बारे में कुछ और रोचक बताने का प्रयास करूँगा,  प्रणाम ...

   ( आपसे प्रार्थना है कि  कृपया लेख में दिखने वाले विज्ञापन पर अवश्य क्लिक करें ,इससे प्राप्त आय मेरे द्वारा धर्मार्थ कार्यों पर ही खर्च होती है। अतः आप भी पुण्य के भागीदार बने   ) ...........................          
                                                                   

21 टिप्‍पणियां:

  1. प्रणाम गुरुदेव ........
    बहुत अच्छी पोस्ट ...
    ज्योतिष जैसे गूढ़ विज्ञानं को इतनी सहजता से प्रस्तुत करने के लिए साधूवाद ............

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  2. shubh dipawali gurudev.....
    aapki mail id par mail dala he....

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  3. गुरुदेव .........
    सादर चरण स्पर्श .......

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  4. संतोष जी को दीपावली की बहुत शुभकामनाएं .
    प्रतीक साहब आपको भी हार्दिक शुभकामनाएं व आशीर्वाद ,की अगली दीवाली से पहले ही ईश्वर आपकी समस्त इच्छाओं की पूर्ती करे।
    आपकी मेल का यथा शीघ्र उत्तर देने का प्रयास करूँगा,पिछले पंद्रह दिनों से ब्लॉग की तरफ आना ही नहीं हुआ,किन्तु आप लोगों की याद सदा
    ह्रदय में रही।

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  5. नयी पोस्ट का बेसब्री से इन्जार हे गुरुदेव

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  6. kya baat he guruev..........koi nayi post he nhi.......
    mera mail mil gaya kya aapko.....

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  7. पंडित जी मेरी एक शंका का समाधान कीजिये आपकी कृपया बड़ी होगी. मेरी कुंडली में नवम भाव में (तुला) का योगकारी शुक्र त्रिकोण का मालिक हे इस पर भी मुझे इसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा हे. आथ्रिक रूप से भी में कमजोर हु. भाग्य भी कमजोर हे. क्या मेरी कुंडली में शुक्र निष्क्रिय हे या बाधक बने हुए हे. या मेरी भाग्य में इनकी महादशा न आने का कारन ये योग धरा रह जायेगा.

    भुवन कुमार डोब ०३/१२/१९७८ समय: १२.०० (दोपहर) स्थान डेल्ही

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    1. भुवन जी,ज्योतिष शाश्त्र के अनुसार कुंभ लग्न में दशम भाव में सूर्य -मंगल कि युति बेहतर परिणाम देने वाली मानी जाती है.ये योग जातक को सेना ,बिजली,दवाओं ,शिक्षा ,आदि क्षेत्रों में सफलता देने वाला माना जाता है.इसलिए नौकरी आदि कि समस्या नहीं होनी चाहिये थीं.हाँ धन के मामले में योग जरूर कम हो जाते हैं.धनेश -आयेश वक्री होकर उच्च हैं अर्थात नीच का प्रभाव देने लगेंगे. इस लग्न में गुरु का उच्च होना शुभ प्रभाव नहीं देता.साथ ही उल्लेख मिलता है कि यदि इस लग्न में बुध कहीं भी वक्री होकर विराजमान हो तो जीवन में अचानक धन कि हानि का कारण बनता है वा जातक को कर्ज़ कि तरफ धकेलता है.चंद्रमा -गुरु का परस्पर राशि परिवर्तन यहाँ हर समय कोइ ना कोई खर्चा लगा होने के रूप में देखा जां सकता है.आप को शुक्र के बारे में ना सोचकर पहले गुरु का उपचार करना चाहिए बाद में बुध का.वैसे आप 70 गर्म चने कि दल हर गुरुवार मंदिर में दीजिये .मई के बाद थोड़ा परिवर्तन जरूर महसूस होगा.

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  8. mai bahut dino se apne rojgar ko lekar pareshan hu. abhi february me naukri chodhkar apna business start kiya but asafal raha. karjdar bhi ho gaya hu. pandit ji aap bataye mujhe kya karna chahiye. confuse hu naukri ya apna kam karu. achaa samay kab aayega.

    veenu kr dob: 03/12/1974 samay 05.20 ke aas pas place: bhind-muraina (MP)

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    1. वेणु जी ,लौह धातु से संबंधित कोई भी कार्य शुभ फल दे सकता है.अपना रोजगार शुरु कर आप ने एक ही महिने में स्वयम्‌ को पास -फेल मान लिया.रोजगार जमाने ने समय लगता है.किसी भी प्रकार का अन्य धातु संबंधित काम कीजिये .अभी समय संयम के साथ मेहनत माँग रहा है.अगले वर्ष की होली तक हालात आपके नियंत्रण में होंगे.गुरुवार का व्रत रखें वा एक नीली सवा पाँच रत्ती धारण करें.पीले वस्त्रों से दूर् रहें .मेरी शुभकामना......

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  9. bahut achha guruji .meri kundali me panchve bhav me kanya rashi h sury or budh virajman h lekin budh ast h .mene panna dharan kiya lekin parinam thik nahi aye kripya bataye

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  10. guruji agar saptmesh mangal neech ka hokar tritiya bhav me beth jaye to uska kya fal hoga ? kripya apna amulya samaya nikal kar bataven

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    1. बुध को नपुंसक ग्रह माना गया है कुंदन बाबु.सूर्य से युति कर ये अस्त हो जाता है किन्तु यहाँ ये अपना प्रभाव सूर्य में मिला देता है,जिसे बुधादित्य योग कहा जाता है.आगे निकले तो वक्री ,अर्थात अकेले नहीं जाना है ,सदा मेरे पास रहो ,और पास रहकर भी अपना अलग अस्तित्व मत रखो,अब भी मेरे जरिये ही कार्य करो.तुम्हारा दिल रखने के लिए मैं तुम्हे अस्त नहीं करूँगा( क्योंकि सदा तुम्हें साथ भी तो रखना है)बल्कि इसे योग की संज्ञा दूंगा.अब हर तीसरी कुंडली में बुधादित्य योग मौजूद होता है ,किन्तु भला कितना फलित होता है ,ये हमें भलीभांति ज्ञात है .क्योंकि आखिरकार बुध अस्त ही होता है न .ये सूर्य द्वारा दिया गया धोखा है कुंदन साहब ,जिसे बुध समझ नहीं पाता या पता नहीं समझना ही नहीं चाहता.तभी तो नपुंसक कहलाता है.ऐसी ही अवस्था जब मनुष्य के जीवन में आती है तो सचेत रहना हितकर होता है,अन्यथा आख़िरकार झूठे दिलासों से धोखा ही तो प्राप्त होता है. आशा है आप मेरा अर्थ भांप रहे होंगे .

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  12. pandit ji fir budh aditya yog ki mahtaa hi kya rah jati hai.

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  13. कुछ भी नहीं ,अस्सी प्रतिशत कुंडलियों में यह योग पाया जाता है। मात्र वृष व धनु लग्न में इसका प्रभाव देखा गया है वह भी इनके केंद्र त्रिकोण में होने से। कुछ ज्योतिषियों के द्वारा बुधादित्य योग को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया गया है ,जो निरर्थक है।

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  14. गुरु जी
    नमस्कार
    Dob15/05/1982 time 12:25am place narayangarh haryana ,बेरोजगार हु।शादी भी नही हुयी

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  15. Pranam Guruji..
    DOB:- 08/10/1983
    Time:- 15:40
    Place:- Mumbai
    Shani Mahadasha aur Sade Sati se pareshan ho chuka hu... Tan, Mann, Dhanse kab sampana banunga.....

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  16. Pranam Guruji,
    DOB :- 08/10/1983
    Time :- 15:40
    Place :- Mumbai
    Guruji Shani Mahadasha aur Sade Sati se pareshan ho chuka hu.. kripaya meri kundali ka vishleshan karke bataiye.. Tan, Man, Dhanse kab sampana banunga.....

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