बुधवार, 9 जनवरी 2013

कैसी होगी जीवन संगिनी

पिछली पोस्ट में हमने मेष लग्न की कन्या के होने वाले जीवन साथी के बारे में बात की थी।आज हम देखने का प्रयास करते हैं की मेष लग्न के पुरुष के होने वाले जीवनसाथी के बारे में भला ज्योतिष शाष्त्र क्या संकेत करते हैं ?  
                       मेष लग्न के पुरुष के सप्तम भाव में कन्या के ही समान तुला राशि का अधिकार होता है अतः स्वाभाविक रूप से जीवनसंगिनी सुन्दर, मांसल देह ,लम्बे बाल,धार्मिक ,पतिव्रता ,व बातों द्वारा काम निकलवाने में माहिर होती है।यहाँ यदि सप्तमेश शुक्र स्वयं इस भाव में हो या उसकी दृष्टी इस भाव पर हो तो इन गुणों में वृद्धि हो जाती है।किन्तु यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की स्वयं जातक को अपनी आदतों( बिंदास स्वाभाव ) पर लगाम लगा लेनी चाहिए ,वरना विवाह पश्चात समस्या हो सकती है।
--  वृष -मकर या कुम्भ में यदि शुक्र देव विराजमान हों तो स्त्री जातक के लिए भाग्योदय लेकर आती है ,किन्तु यदि यहाँ शुक्र के साथ राहु या शनि महाराज भी हों तो जातक को संघर्ष थोडा अधिक करना पड़ता है जिसमें भी स्त्री पूरा सहयोग देती है।
-- सप्तमेश अपनी उच्च राशि मीन में विराजमान हों तो भले ही पैत्रिक धन सम्पदा जातक को न मिले किन्तु अपनी स्त्री के भाग्य से उसे धन की कोई कमी नहीं रहती व जीवन के सारे सुख वह प्राप्त करता है।
--यदि शुक्र अष्ठम भाव में हो तो जातक को स्वयं मूत्र स्थान से सम्बंधित किसी प्रकार के रोग से दो चार होना पड़ सकता है,व उसके इसी योग के कारण जीवनसंगिनी का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है अततः कुंडली मिलान के समय कन्या के लग्न व लग्नेश का मजबूत में होना भविष्य में सहायक रहता है।
-- शुक्र यदि 6 वें भाव में हो तो कई बार स्त्री जातक को अपने से कम आंक कर उसकी अवेहलना कर सकती है .इस कारण पारिवारिक जीवन तबाह तक हो जाता है। 
-- सप्तम भाव में यदि पाप ग्रह हो तो यह दो विवाह की संभावनाओं को बताते हैं।कारण कुछ भी हो सकता है।
-- शुक्र के साथ यदि मंगल हो तो जातक के स्वयं थोडा सा अग्रेसिव होने की संभावनाएं होती हैं।जिस कारण उस के बारे में धारणाएं बन सकती हैं .  -- सप्तमेश के साथ राहु या शनि की युति 3-6-8 वें भाव में  होने से कई बार बेमेल विवाह भी होते देखे जाते हैं। ऐसा जातक अमूमन(यदि किसी शुभ ग्रह का प्रभाव न हो तो) उचित अनुचित की परवाह नहीं करता।दाम्पत्य जीवन न होने जैसा होता है।.
 --अन्य ग्रहों की दशा -स्थिति योगों में परिवर्तन कर सकती है .
             यदि इस क्रम में पाठकों की जिज्ञासाएं प्राप्त हुई तो इसे हम एक पूरी सीरीज के रूप में आगे चलाने का प्रयास करेंगे।

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

कैसा होगा जीवन साथी ?

मेरा जीवन साथी भला कैसा होगा ,क्या करता होगा ,ये सवाल कभी न कभी हर किसी कन्या के दिमाग में अवश्य आता होगा।आइये देखते हैं की शाश्त्र भला इस विषय पर क्या कहता है।लग्न से सप्तम भाव को विवाह से सम्बंधित भाव कहा  जाता है।मैं लग्न के हिसाब से आज ये बताने का प्रयास कर रहा हूँ की किस लग्न की कन्या का जीवन साथी क्या खूबियाँ लिए हुआ हो सकता है। हालांकि ग्रहों की अलग अलग अवस्थाओं की वजह से इसमें थोडा बहुत बदलाव संभव होता है ,किन्तु फिर भी मूल सिद्धांत एक सामान ही होते हैं।
1.  मेष लग्न की कन्या के सातवें भाव में शुक्र की वृष राशि होती है।अततः सामन्यतः कन्या का होने वाला जीवनसाथी हलके रंग ,थोड़ी लम्बी नाक,भारी शरीर,सुंदर आँखों का स्वामी व थोडा सा आराम तलब होता है।इसी के साथ यदि सप्तमेश की उपस्थिति दूसरे या बारहवें भाव में होती है तो वह कन्या से कम रूपवान किन्तु धनी हो सकता है। पारिवारिक जीवन सामान्य रहता है।
--शुक्र यदि 6 वें भाव में होता है तो पति कन्या को प्रयाप्त समय नहीं दे पाता है,परिणामस्वरूप दाम्पत्य जीवन बहुत अधिक सुखी नहीं हो पाता .
--शुक्र यदि 8 वें भाव मे हो तो जीवन साथी किसी ख़ास समस्या से ग्रस्त हो सकता है,दोनों में से किसी एक को किसी प्रकार का योन रोग हो सकता है।किन्तु से द्वितीय भाव में स्वराशी पर दृष्टी रखने के कारण जीवनसाथी धनवान अवश्य होता है।
--किसी भी त्रिकोण में शुक्र की उपस्थिति दाम्पत्य जीवन को मधुर बना देती है।
--सप्तमेश यदि शनि के साथ हो तो जीवन साथी रोगी या आयु में अधिक बढ़ा होना संभव होता है।अततः दांपत्य जीवन बहुत अधिक मधुर नहीं कहा जा सकता।किन्तु इस लग्न में शनि को दशमेश व आएश का दर्जा होता है अततः धन की कमी यहाँ देखने में नहीं आती।
--भाग्येश गुरु ,सूर्य या चन्द्र के साथ सप्तमेश शुक्र की युति होने से जीवन साथी सदाचारी व चरित्रवान होता है,अगर यह युति आठवें भाव में हो तो कन्या का अपने जीवन साथी पर पूर्ण अधिकार रहता है।
-- 6-7-8 वें भाव में यदि पाप ग्रह  हों तो दाम्पत्य जीवन में  बिखराव की स्थिति आने के संकेत मिलते हैं,अततः ऐसे में आवश्यक है की विवाह पूर्व कुंडली मिलान सही प्रकार से हो व विवाह के बाद भी आपसी तालमेल ठीक  रखा जाय।
--कन्या के सातवें भाव में यदि केतु हों या गुरु के साथ कहीं भी केतु की युति हो तो विवाह के बाद कन्या को चाहिए की अपने पूर्व के किसी भी पुरुष मित्र से संपर्क न रखे।न ही घर में किसी के आने जाने का सिलसिला बने,क्योंकि ऐसे में जीवनसाथी को बेवजह शक शुबहा होता है व आपसी  सम्बन्ध कमजोर हो जाता है। अततः किसी भी प्रकार की गैरजिम्मेदाराना हरकत से बचना शुभ रहता है।
-- लग्न ,दशम या एकादश भाव में शुक्र के होने से जीवनसाथी अच्छे व्यवसाय का मालिक होता है।कन्या का भाग्योदय विवाह के बाद ही होता है किन्तु ऐसी अवस्था में कन्या को पति के बहुत अधिक सानिध्य की आस नहीं करनी चाहिए।
--इसके अलावा किसी भी कुंडली में कन्या के लिए गुरु की स्थिति भी सही होना आवश्यक होता है।वहीँ 8 वें भाव के स्वामी पर भी नजर डालना आवश्यक है।सातवां भाव जहाँ पति के सुख का भाव होता है वहीँ आठवां भाव पति से सुख के रूप में देखा जाता है।
     समय की सीमाओं के कारण आज इतना ही।व्यस्तताओं के कारण नियमित ब्लॉग नहीं लिख पा रहा हूँ।किन्तु फिर भी ब्लॉग के जरिये पूछे जाने वाले सवालों का जवाब तुरंत ही देने का प्रयास करता हूँ।अपने ब्लॉग के नियमित पाठकों व सदस्यों के लिए मेरी सेवाएं सदा हाजिर हैं .भविष्य में कोशिश करूँगा की इसी क्रम में वृष लग्न से सम्बंधित बातों पर प्रकाश डालें।    

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

Love marriage... प्रेम विवाह

संसार का ऐसा विरला ही कोई कुंवारा या कुंवारी होगी जिसने यदि कभी किसी ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखाई हो और अपने प्रेम विवाह के विषय में सवाल न किया हो।सदियों से ये शब्द हर मनुष्य के मन को एक सुखद एहसास ,एक रूमानी दशा से दो चार करता आया है।तो आइये आज इसी विषय पर चर्चा करने का प्रयास करते हैं।
                                               आम बोलचाल की भाषा के प्रेम विवाह व ज्योतिष शास्त्रानुसार प्रेम विवाह में फर्क होता है,होना भी चाहिए और अधिक आवश्यक है की जातक व ज्योतिषी दोनों को इस फर्क का पता होना चाहिए।कालांतर में प्रेमविवाह के अर्थ बदलते रहे हैं।आज जो हो रहा है वो प्रेम विवाह नहीं है,आपसी समझौता है अपने जीवन को सुगम बनाने के लिए।आज से तीस चालीस साल पहले जब जाती प्रथा का ठीक ठाक बोलबाला था ,तब दूसरी कौम ,दूसरी जाति के रीति रिवाजों के प्रति आकर्षण ही प्रेम था।राजा राम के समय काल में स्वयंवर का मौका मिल जाना ही प्रेम विवाह के दायरे में आ जाता था।मुगलकालीन दौर में कई रानियों में से विशेष का दर्जा पा लेना भी प्रेम विवाह माना  जा सकता था.
                                       वास्तव में जब से ज्योतिष शाश्त्र की रचना हुई है तब से अब तक हालत बहुत बदल गए हैं।चीजों को देखने का नजरिया ,उनका होना ,उनका अर्थ सब के मायने बदल गए हैं। अब आप यदि अपने जीवन साथी के साथ प्रेम कर पा रहे हैं ,उसके ह्रदय का प्रेम पा रहे हैं तो यही प्रेम विवाह है। यह एक विस्तृत चर्चा का विषय है ,किन्तु यहाँ पर मैं शाश्त्रों में बताये गए कुछ योग जो कुंडली में आपकी पसंद के व्यक्ति विशेष को आपके जीवन साथी के रूप में पाने के आपके मौकों के बारे में बताते हैं उनका जिक्र कर रहा हूं।
     पंचम भाव कुंडली में प्रेम का भाव कहा गया है।वहीँ सप्तम भाव विवाह का भाव है।पंचम भाव जुआ ,सट्टा ,खेल और ऐसे सभी कामों का भाव भी है जिसके रिसल्ट के बारे में हम कुछ भी पक्का नहीं कह सकते।यहीं ध्यान देने वाली बात यह भी है की सप्तम भाव मारक भाव भी माना जाता है। व साझेदारी का भाव भी है।अब आप प्रेम विवाह को कुछ ऐसे भी मान सकते हैं की कोई ऐसी साझेदारी जिसमें आपसी प्रेम आपसी विचार सदा बने रहें।    
       कुंडली में सप्तमेश व पंचमेश दोनों का योग होना या किसी भी प्रकार से आपस में सम्बन्ध होना इस प्रकार की साझेदारियों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
              -पंचमेश ,सप्तमेश व शुक्र का की कुंडली में कहीं भी होना प्रेम विवाह की संभावनाओं को बताता है।
-शुक्र व सप्तमेश यदि पंचम भाव में हों तो जातक प्रेम विवाह की कोशिश करता देखा जा सकता है।
-पंचमेश व सप्तमेश का राशि परिवर्तन हो तो जातक चाहे प्रेम विवाह की संभावनाओं को बताता है .
-मंगल पर शुक्र की दृष्टि बार बार जातक को प्रेम करने को उकसाती है।वह कई बार जीवन में प्रेम करता है किन्तु विवाह हो या न हो इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
-पंचम या सप्तम भाव पर सूर्य की उपस्थिति भी कई विद्वानों द्वारा प्रेम विवाह का सूचक मानी जाती है।(किन्तु यह सूत्र आज तक मेरी समझ में आया नहीं )
देश ,काल पात्र या परिस्तिथियों में भिन्नता ही शायद प्रेम विवाह कही जाती हो।भविष्य में इस विषय को आगे बढाने का प्रयास करूँगा।

विशेष :प्रतीक जी का आभार।नयी पोस्ट के इंतजार के लिए।