कुंडली अध्ययन के समय या पंडित जी के मुंह से कई बार आपने दशा शब्द सुना
होगा.मसलन राहू की दशा चल रही है.शनि में केतु की दशा लगी है.सूर्य में
मंगल की अन्तर्दशा चल रही है आदि .तब कई बार ह्रदय में ये सवाल उमढ कर आता
है की आखिर ये दशाएं हैं क्या. ऋषियों द्वारा मनुष्य के जीवन को १२० वर्षों का मान कर इसे नवग्रहों के
आधिपत्य में अलग अलग बांटा गया है.हर ग्रह के हिस्से में कुछ वर्ष माने गए
हैं.अब जब जब जातक उस वर्ष में पहुँचता है तो माना जाता है की कुंडली में
अपने शुभ-अशुभ भाव के आधार पर ग्रह फल देने वाला है.
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हर ग्रह में सभी ग्रहों की अंतर दशाएं भी चलती हैं.ऐसा नहीं है की यदि कुंडली में ग्रह ख़राब अवस्था में है,तो उसकी सारी महादशा भी ख़राब ही होगी.इस अवधि के दौरान अलग अलग ग्रहों की अंतर दशाएं अलग अलग परिणाम प्रस्तुत करेंगी.
अश्वनी से रेवती तक इन्हें क्रमश: केतु,शुक्र ,सूर्य ,चन्द्र,मंगल राहू,गुरु,शनि,बुध, का अधिपत्य प्राप्त है, एक ग्रह के आधीन तीन नक्षत्र हैं.अब जातक का जन्म जिस भी नक्षत्र में होगा तो उसी के अनुसार उसके जीवन की महादशा मानी जाएगी.चार्ट द्वारा समझें. केतु : अश्विनी मघा मूल
अगर आपका जन्म अश्वनी नक्षत्र में हुआ है तो आपके जन्म समय में केतु की दशा
चल रही थी.अब आप केतु के चार चरणों में से किस चरण के हैं उस हिसाब से
केतु के सात दशा वर्षों में से दशा शेष रहेगी.ये थोडा गणितीय प्रक्रिया है
किन्तु समझाने के लिए इसे यूँ मान लीजिये की यदि आपका जन्म अश्वनी के दुसरे
चरण में हुआ है तो आप जन्म से पहले ही सात में से एक वर्ष व नौ महीने की
दशा तो भोग चुके हैं.(७ को ४ से भाग दिया तो १.९ हासिल होता है) अब आपने
लगभग पांच साल और तीन महीने की दशा केतु की भोगनी है ,फिर इसी क्रम में आप
शुक्र की २० वर्ष की दशा भोगेंगे. फिर सूर्य की, फिर चन्द्र की .इसी क्रम
में आपका जीवन सम्बंधित ग्रहों की महादशा के आधीन रहेगा.
एक अन्य उदाहरण देता हूँ.मान लीजिये आपका जन्म विशाखा नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ है तो चार्ट में देखिये विशाखा गुरु के सामने लिखा है .अर्थात जातक का जन्म गुरु की दशा में हुआ है,अब दो चरण का समय काल पहले ही पूरा हो चूका है.याने आप १६ में से आठ वर्ष की गुरु की दशा पहले ही काट चुके हैं.अब बचे आठ में से लगभग आठ वर्ष से कम ही दशा आप गुरु की भोगेंगे.(सटीक समय काल के लिए थोडा मेहनत करनी होगी,ये मैं आपको समझाने हेतु संभावित समय बता रहा हूँ) .आपके आठ वर्षायु के पश्चात आप के जीवन में शनि की १९ वर्ष की दशा शुरू हो जाएगी.
अब आवश्यक नहीं की हर मनुष्य १२० वर्ष की आयु प्राप्त करे.अतः हर जातक के जीवन में हर ग्रह की दशा आना भी संभव नहीं होता.यदि कुंडली में किसी ग्रह द्वारा कोई दुर्योग बन रहा हो तो घबराने की आवश्यकता नहीं है,पहले ये जांच लें की सम्बंधित ग्रह की दशा आपके जीवन में आ रही है या नहीं.यदि आपके जीवन में उस ग्रह की दशा नहीं आनी है तो अपनी अन्तर्दशा में वह ग्रह बहुत मामूली रूप से आपको प्रभावित करेगा,व जिसका उपाय शास्त्रोसम्मत तरीके से सहज ही हो जाता है. यही सिद्धांत राज योगों पर भी लागू होता है.साधारणतया ज्योतिषी किसी भी कुंडली में किसी प्रकार का राज योग देखकर सीधे उसकी भविष्यवाणी कर देते हैं और जातक हैरान-परेशान रहता है की भला ये योग फलित क्यों नहीं हो रहे.सीधी सी बात है की राजयोग में मुख्य किरदार निभाने वाले ग्रह की दशा ही नहीं आ रही है. योगों के फलित होने का क्या समय होता है अथवा किस समय काल में कोई योग फलित होगा ये जानने का तरीका भी किसी ब्लॉग में बताने का प्रयास करूँगा.
किसी भी ग्रह की महादशा में पहली शुरूआती अन्तर्दशा एक निश्चित अवधी के लिए स्वयं उसी ग्रह की होती है,पश्चात विशोंतरी दशा के क्रम में ही अगले ग्रह की अन्तर्दशा आ जाती है.जैसे राहू की महादशा में पहले राहू ही की अन्तर्दशा आएगी,फिर गुरु की ,पश्चात शनि-बुध -केतु शुक्र-सूर्य-चन्द्र-मंगल .राहू से एकदम पहले वाले ग्रह पर आते ही राहू की दशा में अंतिम अन्तर्दशा होती है व उसके बाद गुरु की महादशा प्रारंभ होती है.सामान रूप से गुरु में पहली अन्तर्दशा गुरु की ही होगी,उसके पश्चात शनि की ,फिर बुध-केतु-शुक्र-सूर्य-चन्द्र-मंगल-राहू. राहू की अन्तर्दशा गुरु की महादशा में अंतिम अन्तर्दशा होगी,इसके उपरान्त शनि की महादशा प्रारंभ हो जाएगी.
बहुत ही सरल भाषा में मैंने आपको विशोंतरी महादशा के बारे में बताने का प्रयास किया है.आशा है की इससे आपको कुछ सहायता प्राप्त होगी अपनी कुंडली को समझने में.पूर्व में ऐसे ही उमा-महेश्वरी दशा का भी उपयोग होता था,किन्तु अब अपनी सटीकता के कारण सर्वत्र लगभग विशोंतरी दशा ही उपयोग में लायी जाती है.लेख के बारे में आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी.
( आपसे प्रार्थना है कि कृपया लेख में दिखने वाले विज्ञापन पर अवश्य क्लिक करें ,इससे प्राप्त आय मेरे द्वारा धर्मार्थ कार्यों पर ही खर्च होती है। अतः आप भी पुण्य के भागीदार बने )
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हर ग्रह में सभी ग्रहों की अंतर दशाएं भी चलती हैं.ऐसा नहीं है की यदि कुंडली में ग्रह ख़राब अवस्था में है,तो उसकी सारी महादशा भी ख़राब ही होगी.इस अवधि के दौरान अलग अलग ग्रहों की अंतर दशाएं अलग अलग परिणाम प्रस्तुत करेंगी.
अश्वनी से रेवती तक इन्हें क्रमश: केतु,शुक्र ,सूर्य ,चन्द्र,मंगल राहू,गुरु,शनि,बुध, का अधिपत्य प्राप्त है, एक ग्रह के आधीन तीन नक्षत्र हैं.अब जातक का जन्म जिस भी नक्षत्र में होगा तो उसी के अनुसार उसके जीवन की महादशा मानी जाएगी.चार्ट द्वारा समझें. केतु : अश्विनी मघा मूल
शुक्र : भरणी पूर्वाफाल्गुनी पूर्वाषाडा
सूर्य : कृतिका उत्तराफाल्गुनी उत्तराषाडा
चन्द्र : रोहिणी हस्त श्रवण
मंगल : मृगशिरा चित्रा धनिष्ठा
राहू : आद्रा स्वाति शतभिषा
गुरु : पुनर्वसु विशाखा पूर्वाभाद्रपद
शनि : पुष्य अनुराधा उत्तराभाद्रपद
बुध : अश्लेषा ज्येष्ठा रेवती
एक अन्य उदाहरण देता हूँ.मान लीजिये आपका जन्म विशाखा नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ है तो चार्ट में देखिये विशाखा गुरु के सामने लिखा है .अर्थात जातक का जन्म गुरु की दशा में हुआ है,अब दो चरण का समय काल पहले ही पूरा हो चूका है.याने आप १६ में से आठ वर्ष की गुरु की दशा पहले ही काट चुके हैं.अब बचे आठ में से लगभग आठ वर्ष से कम ही दशा आप गुरु की भोगेंगे.(सटीक समय काल के लिए थोडा मेहनत करनी होगी,ये मैं आपको समझाने हेतु संभावित समय बता रहा हूँ) .आपके आठ वर्षायु के पश्चात आप के जीवन में शनि की १९ वर्ष की दशा शुरू हो जाएगी.
अब आवश्यक नहीं की हर मनुष्य १२० वर्ष की आयु प्राप्त करे.अतः हर जातक के जीवन में हर ग्रह की दशा आना भी संभव नहीं होता.यदि कुंडली में किसी ग्रह द्वारा कोई दुर्योग बन रहा हो तो घबराने की आवश्यकता नहीं है,पहले ये जांच लें की सम्बंधित ग्रह की दशा आपके जीवन में आ रही है या नहीं.यदि आपके जीवन में उस ग्रह की दशा नहीं आनी है तो अपनी अन्तर्दशा में वह ग्रह बहुत मामूली रूप से आपको प्रभावित करेगा,व जिसका उपाय शास्त्रोसम्मत तरीके से सहज ही हो जाता है. यही सिद्धांत राज योगों पर भी लागू होता है.साधारणतया ज्योतिषी किसी भी कुंडली में किसी प्रकार का राज योग देखकर सीधे उसकी भविष्यवाणी कर देते हैं और जातक हैरान-परेशान रहता है की भला ये योग फलित क्यों नहीं हो रहे.सीधी सी बात है की राजयोग में मुख्य किरदार निभाने वाले ग्रह की दशा ही नहीं आ रही है. योगों के फलित होने का क्या समय होता है अथवा किस समय काल में कोई योग फलित होगा ये जानने का तरीका भी किसी ब्लॉग में बताने का प्रयास करूँगा.
किसी भी ग्रह की महादशा में पहली शुरूआती अन्तर्दशा एक निश्चित अवधी के लिए स्वयं उसी ग्रह की होती है,पश्चात विशोंतरी दशा के क्रम में ही अगले ग्रह की अन्तर्दशा आ जाती है.जैसे राहू की महादशा में पहले राहू ही की अन्तर्दशा आएगी,फिर गुरु की ,पश्चात शनि-बुध -केतु शुक्र-सूर्य-चन्द्र-मंगल .राहू से एकदम पहले वाले ग्रह पर आते ही राहू की दशा में अंतिम अन्तर्दशा होती है व उसके बाद गुरु की महादशा प्रारंभ होती है.सामान रूप से गुरु में पहली अन्तर्दशा गुरु की ही होगी,उसके पश्चात शनि की ,फिर बुध-केतु-शुक्र-सूर्य-चन्द्र-मंगल-राहू. राहू की अन्तर्दशा गुरु की महादशा में अंतिम अन्तर्दशा होगी,इसके उपरान्त शनि की महादशा प्रारंभ हो जाएगी.
बहुत ही सरल भाषा में मैंने आपको विशोंतरी महादशा के बारे में बताने का प्रयास किया है.आशा है की इससे आपको कुछ सहायता प्राप्त होगी अपनी कुंडली को समझने में.पूर्व में ऐसे ही उमा-महेश्वरी दशा का भी उपयोग होता था,किन्तु अब अपनी सटीकता के कारण सर्वत्र लगभग विशोंतरी दशा ही उपयोग में लायी जाती है.लेख के बारे में आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी.
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