रविवार, 27 मई 2018

अपना घर

***** अपना घर...क्यों नही हो रहा फलदायी ****
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      प्रत्येक मनुष्य का सबसे  प्रिय स्वप्न सदा से स्वयं का एक घर होना है,,,छोटा हो अथवा बड़ा,, किन्तु स्वयं के परिवार पर अपनी छत हो.....अनेकों बार देखने मे आता है  कि मनुष्य अपने सर्वस्व झोंक कर अपने सपनो की कुटिया बनाने का सामर्थ्य नही जुटा पाता......गृह निर्माण आरम्भ ही नही हो पाता,,,,,ऐसा संजोग ही नही जुड़ पाता..... किसी प्रकार गृह निर्माण आरम्भ हो भी जाता है तो किसी न किसी कारण इसके पूर्ण होने में अड़चन आने लगती है...सामान्यतः गृह निर्माण आरम्भ से पूर्व जातक यथासंभव जानकार विद्वान ब्राह्मणों से सलाह लेता ही है,,,,,,किन्तु सामान्य पंचांग में दिए गए ग्रह निर्माण के सूत्रों के इतर कुछ विषय और होते हैं,,,जिनका जिक्र स्थानाभाव के कारण पंचांग में करना संभव नही होता.....जिज्ञासु पाठकों व पेशेवर ज्योतिषियों हेतु कुछ सूत्र देने का प्रयास कर रहा हूँ,,,,,,आशा है पाठक व ज्योतिषी दोनो को लाभ मिलेगा......
            गृह आरम्भ करने से पूर्व कुछ बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है...पाठकों से निवेदन है कि जब भी अपने नए मकान का निर्माण आरम्भ करें..अपने ज्योतिषी से इस विषय में अवश्य जानकारी प्राप्त करें..क्योंकि निषेध समयकाल में आरम्भ किया गया मकान स्वयं मकान मालिक हेतु भी अशुभ फल उत्पन्न करने में सक्षम होता है...शाष्त्र कहता है कि सूर्य जिस नक्षत्र में हो ,उससे सात नक्षत्र आगे तक गृह निर्माण आरम्भ नहीं किया जाना चाहिए..इन सात नक्षत्रों के बाद आगे 11 नक्षत्र इस कार्य हेतु शुभ माने गए हैं..इससे आगे पुनः 10 नक्षत्र अशुभ माने गए हैं...अब अगर जिज्ञासु पाठक के मन में ये प्रश्न उठे कि इस क्रम में तो 7+10+11 तो 28 नक्षत्र हो रहे हैं जबकि सामान्यतः नक्षत्र 27 ही होते हैं तो सूचित कर दूँ कि इस गणना में अभिजीत को भी शामिल किये जाने का आदेश शाश्त्रों में है...इसी प्रकार गृह आरम्भ के समय यदि सूर्य नीच,अथवा निर्बल हो,अशुभ भावों में हो तो गृहस्वामी हेतु शुभ नहीं माना जाता....इसी क्रम में चंद्रमा को गृहस्वामिनी ,गुरु को सुख ,शुक्र को धन हेतु अशुभ माना जाना चाहिए...गृह निर्माण के आरम्भ में यदि सूर्य 3-6-11 भावों में हो तो शुभ माना गया है,8-12-2-4 में ये अशुभ फल प्रदाता है...केंद्र त्रिकोण में उच्च के गुरु-शुक्र मकान की आयु को बढ़ाने वाले कहे गए है...भविष्य में गृहनिर्माण सम्बन्धी विस्तृत लेख अपनी वेब साईट अथवा ब्लॉग पर देने का प्रयास करूंगा....
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राहु....

*****राहु *********
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          राहु एक क्रिया का नाम है..इसे आप किसी रूप में खोजेंगे तो निराशा हाथ लगेगी...ये हर जगह है ,किन्तु कहीं नहीं है..आम का वो स्वाद जिसे आप परिभाषित नहीं कर सकते..राहु ही है..बहुत तेज प्यास के बाद पानी से जो तृप्ति प्राप्त हुई वो राहु है...किसी लाचार को देखकर जो दया आई वो राहु ही है...सचिन के सेंचुरी मारते हुए देखने पर जो आनंद प्राप्त हुआ वो राहु है...दवा का जो कड़वा स्वाद है वो राहु है...अतः ऐसा कुछ भी जिसकी कोई सीमा नहीं,कोई माप नहीं वो राहु है...शरीर में  आभास के रूप में   इसे खोजने का प्रयास करें तो इसके दो रूप हैं..एक विक्रम और एक बेताल...एक सकारात्मक और एक नकारात्मक....
            जातक के अंदर किसी भी कला के लिए जो तकनीक है वो राहु है..मशीन के  अंदर तकनीक राहु है...शरीर द्वारा बिना सोचे समझे किये गए कार्य राहु हैं...बिजली का तार छूते ही उसका बिना ये देखे कि बच्चा है या बूढ़ा या जवान,करंट का झटका देना राहु है...कुछ भी अप्रत्याशित होना राहु है...और जहाँ भी राहु को संतुलन देने का प्रयास किया जाता है,किसी भी प्रकार से,किसी के भी द्वारा..वो केतु है..बिजली का झटका आते ही ट्रिप हो जाना केतु है..सचिन की सेंचुरी के बाद भी भारत का हार जाना उस ,,,ख़ुशी को थामने का कार्य करेगा..ये केतु की श्रेणी में रखा जाएगा..राहु आकाश है अर्थात सिर है..केतु पाताल है अतः पैर है..दोनों का मेल है तो विक्रम बेताल है..वरना बिना ताल के यानी बेताल है..विक्रम है तो हर बात क्रम से है..सही है...इसलिए यदि विक्रम(विवेक)जीवित है तो  बेताल को भी ताल प्राप्त है..वो सुर में है...अतःक्रिया के संतुलन के रूप  में केतु की कीमत है..ज्योतिषियों को चाहिए कि जातक को उनके वास्तवकि राहु केतु से परिचित कराए,,न कि आकाशीय पिंड का हौवा बनाकर बेसिर की बातें उड़ाए....जागरूक ज्योतिषी को सीमाओं को लांघने हेतु तत्पर रहना चाहिए....घिसी पिटी लकीर पर चलकर वास्तविक ज्योतिष आपको समझ में आएगा,,इसमें संशय है..आशा है पाठक सहमत.. होंगे..

चतुर्थ माता,,दशम पिता

...कई बार मन मे ये प्रश्न जिज्ञासु ज्योतिषी भाइयों के आया होगा कि यदि चतुर्थ माँ का भाव है ,,तो इससे पूर्व तृतीय भाव भला सहज(भाई बहन) का भाव कैसे है ..आपने देखा होगा कि चतुर्थ माँ का भाव है,,,किन्तु तृतीय भाव को सहज(सहोदर) का भाव कहा गया है,,क्यों भला,,,,,क्या माँ पहले हासिल हुई अथवा सगे भाई बहन...कायदे से माँ का भाव पहले आना चाहिए,,तत्पश्चात सहज भाव की कल्पना होनी चाहिए,,,
                 किन्तु होता इसका उलट है......चतुर्थ माँ का आँचल है पाठक वृन्द,,,,किन्तु तृतीय माँ का गर्भ है,,,,,तृतीय में पला डिम्ब ही चतुर्थ में आकार पाता है,,माँ की कोख ही वह स्थान है जहां अपने सहोदरों के साथ जातक रहा है,,इसी कारण ये सहज भाव है,,,,किन्तु वास्तव में चतुर्थ के लिए भूमि है,,,चतुर्थ नामक वृक्ष इसी भूमि पर अंकुरित हुआ है,,,कोई भी भाव अपने से अगले भाव के लिए भूमि का आधार समान कार्य करता है,,,या कहें कोई भी भाव अपने से पिछले भाव का फल है....
           इसी प्रकार दशम पिता की गोद है,,किन्तु नवम पिता का वीर्य है,,,,नवम का अंकुरित बीज ही फल के रूप में दशम है...यूं समझिए कि एक पर्दे के पीछे का हिस्सा है व एक वो चलचित्र है जो सामने दिखाया जाता है...हर भाव के आपरेट करने के कई प्रकार होते हैं,,,,बीज- भूमि -फल...ये ही रिश्ता हर भाव का अपने आगे पीछे के भाव से राहत है....आशा है अपनी बात आप तक पहुंचा पाया ....प्रणाम

ज्योतिष को जानें..

******* ज्योतिष को जानें****
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           .     ज्योतिष के विद्यार्थियों व शोधार्थियों को पुस्तकों में लिखे सूत्रों के साथ साथ ,,,अन्य कारकों पर भी समग्र दृष्टि रखनी चाहिए...गुरु अवश्य धारण करना चाहिए..बिना गुरु,,पुस्तकों के सूत्र मात्र किताबी आखर के समान व्यवहार करने लगते हैं..राहु भारी है,,शनि मारक है,,मंगल बिगड़ गया है,,,,,इन शब्दों ,,इन विचारों से ऊपर दृष्टि जाना असंभव हो जाता है,,,बिना गुरु के सानिध्य के.....
                   ज्योतिष आकाश से लेकर पाताल,,और पहाड़ों से लेकर समुद्र तक फैला पड़ा है...वृक्षों से लेकर कीट पतंगों पर इसका अधिकार है...कुछ सूत्रों को प्रदर्शित करने के लिए ,,पुरानी मान्यताओं का आधार भी ज्योतिषी को लेना पड़ सकता है....ज्योतिष व्यवहार से भी प्रदर्शित होता है,,व आंकड़ों से भी...बिल्ली के रास्ता काटने में भी ज्योतिष है,,,व घर के ऊपर से निकला परिंदा भी ज्योतिष के सूत्र बताता है....अतः एक ज्योतिषी को गणित,,इतिहास,,भूगोल,,,प्राणी विज्ञान,,,मनोविज्ञान,,वनस्पतिशास्त्र आदि की जानकारी रखना उतना ही आवश्यक है,,जितना एक वाहन चालक के लिए,,गेर,,ब्रेक,,एक्सेल,,तेल,,,हॉर्न,,, पंचर,,, स्पार्क प्लग की जानकारी होना....मात्र कुछ पुस्तक विशेष में पढ़कर बिना गुरु के ज्योतिषी बनना उस ड्राइवर के समान है ,,जो वाहन का ज्ञान मात्र चाबी लगाकर उसे स्टार्ट करने तक जानता है...इसके बाद के उपक्रमो की जानकारी के अभाव में,,वो वाहन को सड़क पर तो ला सकता है,,किन्तु इससे सड़क पर चल रहे अन्य लोगों के प्राणों पर कितना रिस्क है,,ये हमे भलीभांति ज्ञात है...इसी प्रकार नौ ग्रह और बारह भाव की कहानी सुनकर जो ज्योतिष की गाड़ी लेकर मैदान में उतर आते हैं,,वे कितने लोगों को कुचलेंगे,,इसका अंदाजा नही लगाया जा सकता...
                  अब मुख्य प्रश्न ये उठता है कि गुरु कौन है....सर्वप्रथम आपकी अंतरात्मा आपकी गुरु है...हृदय पर हाथ रखकर अपनी आत्मा से प्रश्न किया जाय,,कि क्या मैं वाकई ज्योतिषी होने के लायक हूँ,,, क्या मेरा अनुभव,,मेरा ज्ञान वाकई मुझे उस सीमा तक ले आया है,,जहां से मैं किसी जिज्ञासु को कोई सलाह देने की हालत में हूँ....
           दूसरा गुरु आपका विवेक है....क्या मैं वास्तव में ज्योतिष की उस रहस्यमय भाषा को ताड़ना सीख गया हूँ,,जिन गूढ़ चिन्हों में देवताओं ने इस शास्त्र को परिभाषित किया है....क्या कारण है कि ब्लड रिपोर्ट एक भाषा विशेष में प्रकाशित की जाती है,,,क्या कारण है कि कंप्यूटर को चलाने वाली भाषाएं जावा आदि विशेष चिन्हों द्वारा दिखाई गई हैं...क्या कारण है कि हवाई जहाज,, अथवा पानी के जहाज से संबंधी विज्ञान,,सामान्य से इतर अपनी एक अलग ही लिपि पर चलता है......क्या कारण है कि न्यायालय में बात को सीधे न कहकर,,दफ़ा 302,,दफ़ा 420,,,दफ़ा 512 आदि कोड वर्ड में की जाती है.....साधारण सा उत्तर है ,,कि आशा की जाती है कि भविष्य में इन क्षेत्रों में जिन लोगों द्वारा इस भाषा का उपयोग जन हित में किया जाय,,वो सामान्य ज्ञान से ऊपर का ज्ञान रखने वाले लोग हों...हर किसी की पहुंच से इसे दूर रखा जाय..मात्र वे ही इसका उपयोग कर पाएं ,,जो विषय विशेष में एक निर्धारित मापदंड का स्पर्श कर चुके हों.....अन्यथा खुद देखिये कि आठवीं -नवीं- दसवीं में पढ़ाए गए गणित के सूत्रों साइन थीटा,, कॉस थीटा,,,,,अथवा फिजिक्स में पढ़े न्यूटन के सिद्धांत,,आज हममे से किंतने लोग,,कहाँ उपयोग में लाते हैं.....
             सबको ज्ञान है कि बुखार में पैरासिटामोल खाया जाता है,,सिर दर्द के लिए डिस्प्रिन कारगर दवा है...किन्तु इतना ज्ञान होने से हम स्वयं को उस चिकित्सक के समकक्ष नही मान सकते,,जो इस विद्या को विधिवत गुरुओं द्वारा प्राप्त कर आज इस मुकाम पर है... अपनी गाड़ी का स्पार्क प्लग निकाल कर ,,साफ करके उसे वापस लगा देने की अपनी क्षमता के बल पर ,,,यदि हम स्वयं को एक मेकैनिकल इंजीनियर के बराबर उस विषय का जानकार मान बैठे हैं,, तो हम हंसी का पात्र हैं...कंपास,, एल्टीट्यूड ,,,ग्रेविटी,,,लैंड,,टेक ऑफ,, आदि कुछ शब्दों की जानकारी जैसे हमे पायलट नही बना सकती,, उसी प्रकार 9 ग्रह व 12 भाव और 27 नक्षत्र की रटन विद्या किसी को ज्योतिषी नही बना सकती.....
                    ... बिना गुरु के ज्ञान मात्र एकलव्य को प्राप्त हो सकता है,,सभी इस श्रेणी में नही आते...अतः गुरु आवश्यक हो जाता है,,अनिवार्य हो जाता है...तीसरा गुरु प्रकृति होती है..
                       हर धर्म,,जाति,,, सम्प्रदाय विशेष के अपने रिवाज़ होते हैं,,,अपनी अवधारणाएं होती हैं...अपने सिद्धांत होते हैं...इनका सीधा संबंध ज्योतिष से होता है..इन्हें जाने बगैर,,या कहें इनका अध्ययन किये बिना,,इन्हें नकारना,,इनका विरोध करना,,मनुष्य को उस बालक के समकक्ष खड़ा कर देता है जिसने "अ" से अनार का ज्ञान ही अभी प्राप्त किया होता है..."अ" से अविराम,,अवधूत,, अंजुमन,,,अवरोध बताते ही वह गलत गलत चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लेता है....उस मनुष्य के समान घोषित कर देता है,,जिसने कभी मोबाइल नही देखा था,,,अथवा जिसने अमेरिका के बारे में नही सुना था,,,या कहें जिसने आज तक  पानी को icecream का रूप लेते नही देखा हो.....
                         .बिल्ली का रास्ता काटना आपके लिए अंधविश्वास है क्योंकि आप प्राणीशास्त्र नही पढ़े हैं...जानवरो के व्यवहार के प्रति आप अज्ञानी हैं,,अतः कोई दूसरा यदि इस विषय पर बात कर रहा है तो वह आपकी दृष्टि में अज्ञानी है....बिल्ली आमतौर पर एक सुस्त प्राणी है,,,,कुछ समय विशेष के अलावा वह सामान्यतः एक कोने में पड़ा रहना पसंद करती है..यदि कभी वह आपके सामने से तेजी से निकल रही है,,तो बहुत संभव है वह सांप आदि किसी हानिकारक जीव जंतु के पीछे लगी हो,,,,ऐसे में वहां अन्य हानिकारक जंतुओं की उपस्थिति से इनकार नही किया जा सकता,,,अतः आपसे आशा की जाती है,,कि तनिक क्षण रुककर देख लें कि आपकी राह आपके व आपके बच्चों के लिए साफ है,,कोई विषैला जीव तो अचानक आपके पैरों से नही टकराने वाला....गाय व अन्य जानवर धरती के नीचे के कंपन को तीव्रता से भांपते हैं,,,,कहीं ऐसा तो नही कि वे अकारण,,असमय  रंभाकर,,भौंककर आपको कोई संदेश देने के प्रयासरत हैं....आपके इलाके से,,आपके निकट से अचानक सभी परिंदों का पलायन करना कहीं आपको सूचित तो नही कर रहा कि शीघ्र आपको पानी के उचित साधनों की व्यव्यस्था कर लेनी चाहिए आपके परिवार के लिए,,क्योंकि आगे अकाल की संभावना है....घर से निकलते समय परिवार के किसी सदस्य का अचानक छींक देना,,,कहीं उसके बीमार होने का सूचक तो नही.....बच्चे,,बुजर्ग कब बीमार हो जाएं,,और पता चले,,हम समय पर उनकी सेवा के लिए उपलब्ध न हो पाएं,,,, उससे पहले तनिक रुकिए,,जरा उस छींक को जांच लीजिये,,कोई बीमार तो नही घर मे....ये सब ज्योतिष के सहायक विषय हैं......
                                 प्रदेशों के ,,,जातियों के ,,,इलाकों के अलग अलग रिवाज हैं,,,अपनी अपनी सीमाओं के दायरे में....अपनी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कुछ नियम हैं,,,,ये सब ज्योतिष के नियमो के सहायक हैं.....गढ़वालो में जब दूर दूर बसे होने से,व यातायात के साधनों का अभाव होने से ,,,किसी विवाह,,,अथवा किसी भी भोज में कहीं निमंत्रण मिलता तो ,,गुड़ का बना मीठा भात पहले परोसा जाता....किन्तु आपके यहाँ तो मीठा अंत मे परोसा जाता है,,तो मीठा भात पहले परोसने वाले आपकी निगाह में देहाती गंवार हो जाते हैं......मीठा सदा खाने की तृप्ति प्रदान करता है....तीखे भोजन को पचाने के लिए शरीर को अधिक आराम की आवश्यकता होती है..अतः पहले मीठा परोस दिया जाता है ताकि आपकी भूख नियंत्रित हो जाय....आप बाद में मिलने वाला तीखा भोजन कम खाएं,,,,जिस कारण आपको असमय नींद का सहारा न लेना पड़े....आप दूर के अपने गंतव्य के लिए सही समय पर प्रस्थान कर सकें..वहीं विलासिता से भरे जीवन मे भोजन से पूर्व तीखा सूप आदि परोसने का रिवाज है,,,ताकि आपकी भूख खुल जाय,, आप डटकर भोजन करें,,व पश्चात तृप्ति के लिए कुछ मीठा खाएं,,,,,अब नींद भी बेहतर आएगी,,,,गलत कोई नही,,अकारण कुछ  नही..बस अपनी अपनी आवश्यकताएं,,,अपनी अपनी जरूरतें...
                                  इसी प्रकार अलग अलग स्थानों में बलि प्रथा संबंधी अपनी अपनी आवश्यकताओं के कारण अपने अपने रिवाज रचे गए......जिन जिन जानवरों की क्षेत्र में अधिकता व दैनिक जीवन में उनका कोई इनका कोई उपयोग न होकर,,,उल्टे समस्याएं ही उत्पन करना,,,उनकी बलि की व्यवस्था का कारण बनता गया.... क्योंकि आपके यहाँ ऐसे जानवर नही रहे,,और आपने उनके द्वारा अपना खेत चौपट होते नही देखा,,,तो बलि प्रथा आपके लिए गलत हो जाती है....अपने अपने स्थान विशेष की अपनी आवश्यकताएं होती हैं,,,उन्हें बिना महसूस किए,,बिना जाने विरोध करना ,,,,अक्लमंदी के दायरे में नही आ सकता..
                               आकाश से गुजरते पंछी,,आपके घर पर पड़ती आकाशीय नाकारात्मक ऊर्जाओं को विखंडित करने में सहायक होते हैं...आपको ज्ञात ही नही कि किंतने परिंदे ,,कब कब आकर उन नकारात्मक ऊर्जाओं को बाधित कर गए आपके लिए.....इसलिए छत पर आपको बाजरा,,,अनाज,,,दाने डालने की सलाह आपके ज्योतिषी द्वारा दी जाती है....अनाज की उपलब्धता परिंदों को आपके छत के ऊपर से निकलने को आमंत्रित करती है,,,,परिंदे आमंत्रित होते हैं तो छोटे मोटे कीट पतंगों ही नही अपितु कई बार बीमारियां फैलाने वाले चूहों व विषैले सर्प तक को अपना आहार बना लेते हैं.... ये सब ज्योतिष के विषय हैं....ज्योतिष आपकी दैनिक जीवनचर्या के साथ चलने वाला एक सिद्धांत है.....अलौकिक बातों से इसका कोई सरोकार नही...अब आपको इसका अर्थ नही पता तो आपके पंडित जी दकियानूसी,,और पाखंडी हो गए आपकी दृष्टि में....
             छत में कुत्ते का बांधना,, और उसका जोर जोर से रोना और भौंकना,,उन पंछियों की दिशा को बाधित करता है,,,इसी कारण आपका ज्योतिषी आपको बताता है कि कुत्ता राहु है व इसे अपने सिर पर न रखें,,अर्थात छत पर बंधा कुत्ता राहु की नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त करने में बाधक हैं.....आजमा के देख लीजिए पाठक वृंद,,, जहां जहां ऐसा होगा वहां वहां विपदाओं का आगमन होगा...पचासों बार आजमाया सूत्र है मेरा......उस घर का कोई सदस्य बड़ी बीमारियों,,चोटादि की चपेट में शीघ्र आते हैं..रोजगार व्यवसाय में अचानक हानि देखनी होती है .....जहां कुत्ता घर के भीतर रखा जाता है,,वहां रहने वाले स्त्री पुरुष जातकों के विवाह देर से होते हैं...कुछ का दामपत्य उचित नही रह पाता...भैरव ,,,मंदिर से बाहर के रक्षक देवता हैं,,,इन्हें आप भीतर नही रख सकते..
                 बहुत सी ऐसी बातें हैं,,जो अनुभव की कमी से हमें व्यर्थ प्रतीत होती हैं....भारत सामान्यतः एक गर्म देश है..नाभकीय कक्षाओं से सूर्य का भ्रमण अधिकतर दक्षिणी कोण से यहां होता है.....अतः मकान बनाते समय यथासंभव दक्षिण मुखी मकानों से परहेज रखा जाता है...ताकि दिनभर के सूर्य के ताप से बचाव हो सके......ये जियोग्राफी( भूगोल )के अंतर्गत आने वाला विषय है....अब अगर आपने जॉग्रफी का अध्ययन नही किया है ,, तो आपको यह सलाह देने वाला गणक मूर्ख है आपकी दृष्टि में......
                               अगर आप फिजिक्स (भौतिक) के विद्यार्थी रहे हैं तो नाभकीय विद्युत ऊर्जा से होने वाले नुकसान के विषय मे आपने अवश्य पढ़ा होगा.....बड़ी बड़ी इमारतों में सिविल इंजीनियर  ताडिचालक द्वारा अर्थिंग का कनेक्शन जमीन के भीतर डालते हुए आपने अवश्य देखे होंगे...अब संभवतः आपको आपके पंडित जी द्वारा मकान के वास्तु के रूप में चांदी के नाग,,और तांबे का लोटा ,,बुनियाद के एक कोने में दबाने का अर्थ ज्ञात हो रहा हो....ये अर्थिंग है भैया उस समयकाल की...
                         ज्योतिष में पारंगत होने के लिए एक भाषा विशेष की कुछ पंक्तियां रटने की आवश्यकता नही है मित्रों......रोजमर्रा के जीवन मे घटित होने वाली घटनाओं पर समग्र दृष्टि रखने से,,,,प्रत्येक घटना को अपना गुरु मानने से,,व नित एक जिज्ञासु छात्र बने रहने से ,,आप इस विद्या पर नियंत्रण पाते हैं...अतः निरंतर कुछ नया सीखने हेतु तत्पर रहें....नही ज्ञात इसलिए किसी बात का विरोध करना ही बुद्धिमत्ता नही कहलाती मित्र.....
               आशा है पाठक सहमत होंगे...एक लेख के लिए,,, लेखक अपने सारे कार्य त्याग इस लालच में अपना समय लगाता है कि अपने पाठक से वाहवाही प्राप्त करे....पाठक की तालियां सुबह से खाली पेट बैठे आपके लेखक के लिए अमृत रस समान हैं...आपकी टिप्पणी रूपी अमृत बूंदें मुझमें भी प्राण संचार करेंगी...इसी आशा मे .............आपका अपना.........

गुरुवार, 30 मार्च 2017

shani...sani....neelam शनि..नीलम... वक्री....मार्गी..

हर विषय की तरह ज्योतिष शास्त्र व ज्योतिषी भी परंपरागत लकीर को लांघने में खौफ सा खाते दिखाई देते हैं.. दूध को दूध और पानी को पानी कहने वाले कई मिल सकते हैं...किन्तु पानी मिले दूध को पानी बताने के लिए कलेजा चाहिए..पीछे से चली आ रही लकीर को पीटने की प्रथा का अनुगामी जो ज्योतिषी होगा,वो नए सूत्र,नया विजन नहीं दे सकता...जो वर्जनाओं को नहीं त्याग सकता वो आकाश में नहीं उड़ सकता...
      कमोबेश यही स्थिति शनि को लेकर चली आ रही है..और यही स्थिति है शनि से सम्बंधित रत्न माने जाने वाले नीलम की...परंपरागत रूप से ज्योतिषी भाई बंधु नीलम को शनि का रत्न बताते आये हैं,,,अपने अध्ययन के दौरान सामान्यतः हर गणक ऐसा ही पढता है,या समझाया जाता है...रत्नों के बारे में साधारण सी समझ रखने वाले पाठक भी ये बात तो जानते ही होंगे कि रत्न सम्बंधित ग्रह के मूल रंग को धारण करता हूं..उसकी आभा को परिभाषित करता हूं...सफ़ेद चंद्र के लिए सफ़ेद मोती का प्रावधान है,,लाल मंगल के लिए ऐसी ही आभा लिया मूंगा तय है.....हरे बुध के लिए हरा पन्ना तय किया गया है....पीले बृहस्पति के लिए पीला पुखराज शास्त्रोक्त है...ताम्बई सूर्य के लिए वैसी ही आभा वाला माणिक उपयुक्त माना जाता है....तो इस क्रम में भला परिवर्तन शनि को लेकर क्यों हो जाता है...
   नीलम,, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है,,नीली आभा लिए एक रत्न है..जिसका सम्बन्ध शनि से जोड़ दिया गया है...पाठक भलीभांति अवगत हैं कि शनि का रंग काला है..तो इसका रत्न नीला कैसे हो सकता है...नीला राहु का रंग है मित्रों....ऊपर डिसकस किये सूत्र के अनुसार यर राहु का रत्न होना चाहिए....
         अब शनि की शिफ़्त की तरफ ध्यान दीजिए..मार्गी शनि स्वयं के शरीर से काम लेता है तो वक्री अपनी बुद्धि व दूसरों के शरीर से काम लेता है...मार्गी शनि को एक मजदूर समझ लीजिए,,जो अपने दो हाथों से जितना काम करेगा,,उतना लाभ पायेगा....वक्री शनि को ठेकेदार समझ लीजिए,जो कई मजदूरों से काम करवा कर उनकी मेहनत का लाभ ले रहा है......आप मज़दूर व ठेकेदार दोनों को भला नीलम कैसे धारण करवा सकते हैं ....यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि  वक्री शनि जहाँ भी होगा,वहाँ से लाभ के समीकरण बनाने का प्रयास करेगा...वक्री शनि ,कारक हो या अकारक,दोनों किरदारों में लाभ का ही फल उत्पन्न करता है..
       नीलम धारण करवाने से आप मजदूर को उसकी प्रतिभा के विपरीत अधिक उकसा रहे हैं,जहाँ आगे हानि ही स्पष्ट दृष्टिगोचर है....वक्री शनि(ठेकेदार) को आप नीलम धारण करवा रहे हैं तो उसे निराशा के अंधकार में ले जा रहे हैं....जो व्यक्ति अच्छा भला दस मजदूरों से काम करवा ,लाभ प्राप्त कर रहा था,,वो अब अपने दोनों हाथों पर आश्रित हो गया है...
          रत्न वास्तव में लग्न ,पंचम व नवम की मिश्रित आभा को पूरा करता हो तो ही अधिक लाभप्रद माना गया है...किन्तु नौशिखिये ज्योतिषियों के साथ यहाँ से ही  समस्या आरम्भ हो जाती है,, अनुभव की कमी उन्हें सही निर्णय तक नहीं पहुँचने देती.......लग्न अगर खाली है तो आपको लग्नेश के आश्रित स्थान को लग्न बनाना पड़ता है,,तब जाकर आप सही निर्णय लेने की अवस्था में पहुँचते हैं....
       उदहारण के लिए मान लीजिए कोई जातक वृश्चिक लग्न से सम्बंधित है....ऐसे में बुध यहाँ मारक हो जाता है,,...किन्तु लग्न कुंडली में यदि हम लग्न को रिक्त पा रहे हैं वे लग्नेश की पोजीशन एकादश भाव में बुध की कन्या राशि पर है,,,तो जातक को रत्न संबंधी सलाह देने के लिए हमें कन्या राशि को ही लग्न की तरह ट्रीट करना पड़ेगा..ऐसी अवस्था में सहज ही पन्ना धारण कराया जा सकता है.....अपनी दशा में बुध वृश्चिक लग्न के लिए मारकेश का कार्य ही करने वाला होगा,इसमें कोई संशय नहीं.....किन्तु पन्ना यहाँ आमदनी के साधनों को शीघ्र मजबूत करेगा इसमें भी कोई संशय नहीं....किताबी सूत्रों की तुलना में स्वयं के परिभाषित किये सूत्र ज्योतिषी को अधिक सहायक रहते हैं ,ऐसा मेरा व्यक्तिगत विश्वास है.....ज्योतिष किसी आसमानी चिड़िया का नाम नहीं है मित्रों....इसके लिए आपको संस्कृत घोटने की कतई आवश्यकता नहीं है....न ही मन्त्रों में आपका पारंगत न होना आपके ज्योतिषि बनने की राह में कोई रोड़ा है....बेसिक अध्ययन के बाद अपने आस पास तार्किक व विवेचनात्मक दृष्टिकोण रखना,, व पुराने सूत्रों को नए लिबास में देखने का हुनर ही आपको ज्योतिष की राह में आगे ले जाएगा,,ऐसा मेरा विश्वास है.....अतः आप भी अपने वातावरण पर समग्र दृष्टि रखें,,प्रकृति के परिवर्तनों को समझने का प्रयास करें,अपनी छठी इंद्री को जागृत करने का अभ्यास करें.....आपकी ज्योतिषी बनने की राह स्वतः ही सुगम हो जाती है....लेख के विषय में आपकी अमूल्य राय का इंतजार करूँगा....प्रणाम...

बुधवार, 29 मार्च 2017

fifth house... पंचम भाव....जन्म मृत्यु..प्रारब्ध

मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होने के पश्चात कहाँ जाता है,इस विषय पर बहुत से ग्रन्थ ,बहुत से विचार प्रस्तुत करते हैं..किन्तु जन्म लेने से पूर्व वो कहाँ से किस हालात से निकल कर आया है,ये जानकारी बहुत कम उपलब्ध होती है....ज्योतिष में इस विषय में बहुत रहस्यपूर्ण तरीके से आगे बढ़ा जाता है...पूर्व में हमारी वेब साइट www.astrologerindehradun.com में  मेरे पितृ दोष संबंधी लेख में  मैंने पाठकों के समक्ष ,,बड़ी शिद्दत से पंचम भाव का महत्व रखने का प्रयास किया था व पाठकों की खूब वाहवाही पाई थी...इसी सूत्र को आगे ले जाने का प्रयास आज कर रहा हूँ...
       लग्न व अष्ठम भाव से प्रभाव एक साथ एक दूसरे की ओर बढ़ता है..वो भी विपरीत कारक के साथ....कैसे???आइये समझते हैं...लग्न जातक का जन्म है तो अष्ठम मृत्यु...अब लग्न से अगला भाव अर्थात द्वितीय भाव ,,जन्म के पश्चात की पहली सांस है... इसके विपरीत अष्ठम से पहला अर्थात सप्तम भाव जीवन की अंतिम सांस है...एक तरफ से (लग्न से) प्रभाव आगे आने वाले कारकों के लिए बुनियाद तैयार कर रहा है,तो दूसरी ओर का प्रभाव ,अंतिम सत्य (अष्ठम मृत्यु ) से प्रारब्ध की बुनियाद तलाशने का प्रयास कर पीछे की यात्रा कर रहा है..
        द्वितीय सांस के बाद तृतीय उसका आकार है,,,भविष्य की जद्दोजहद से लड़ने के लिए मनोबल ,पुरुषार्थ है....तो सप्तम से पीछे छठा भाव उस अंतिम सांस(सप्तम) के लिए कारण पैदा करने वाला भाव है....तृतीय के बाद चतुर्थ माँ  की गोद है.. ..वहीँ षष्ठम भाव से पूर्व का पंचम भाव अंतिम सांस के कारण तय करने वाले भाव को उत्पन्न करने वाली भूमि है..यहाँ पाठक एक बात अवश्य गौर करें कि किसी भी भाव ,किसी भी ग्रह से सप्तम स्वतः ही उसके लिए अपोजिट प्रभाव उत्पन्न करने को मजबूर हो जाता है..अतः पंचम यदि प्रथम वस्त्र के रूप में माँ के आँचल के रूप में देखा जाता है तो एकादश इसी कारण अंतिम वस्त्र कफ़न का भाव है...लग्न को जातक माना जाय तो नवम उस भूमि का रूप है ,जिसपर ये पौधा उगा है,,,,,नवम पिता है तो नवम के पीछे पंचम उसका आधार है....इसी कारण स्पष्ट है कि जातक अपने अंश के रूप में  भविष्य में जो पंचम(संतान) उत्पादन करने वाला है,वास्तव में ये ही भाव लग्न के निर्माण वाली भूमि(नवम) का आधार भाव है....अतः ज्योतिषी को सभी भाव त्यागकर सर्वप्रथम पंचम भाव का विवेचन करना श्रेष्ठ निर्णय लेने में सहायक बनता है...पंचम आपके पूर्व जन्म के किस्सों का भाव है व गुरु इस भाव का यात्री है..इसी कारण तो अष्ठम मृत्यु के बाद कालपुरुष में पहला भाव नवम गुरु का भाव है...कालपुरुष में पंचम सूर्य का भाव है जो वंश परंपरा का घोतक है, आप असल में अपने पिता का ही डीएनए हैं..और पिता आपके दादा का डीएनए....तो असल में आप दादा का ही रूप हैं...आप पिता से अधिक अपने दादा के डीएनए हैं....इसीलिए सामान्यतः अनुवांशिक बीमारियां एक पीढ़ी छोड़कर अधिक प्रबल रूप से सामने आती है....पंचम भाव आपके लिए तय कर चुका होता है कि निकट भविष्य में क्या आपके लिए मारक प्रभाव लाने वाला है...अतः  मृत्यु कुंडली पंचम भाव को आधार रखकर करें तो बहुत से नए रहस्य सामने आते हैं.... ये षष्ठम रोग को व्यय करने वाला भाव है....अगर इसका रहस्य पकड़ आ गया तो शर्तिया जातक अटल मृत्यु को काटने की ताकत पा जाता है...आपने यूनानी कथाओं में फिनिक्स पक्षी का नाम सुना ही होगा...

मंगलवार, 28 मार्च 2017

सभी मित्रों को नववर्ष की शुभकामनाएं,,,,,,,खुश रहें मस्त रहें ,,,बस दुविधाग्रस्त न रहें,,,,लालसाओं की पूर्ति के लिए पस्त न रहें ,,,,,जीवन क्षणभंगुर है इसके अभ्यस्त न रहें ,,धर्म पर जो अडिग रहा वो ही पार पाया ,स्वार्थ पूर्ति में अपनी मदमस्त न रहें ,,,कौन मैं और क्या मेरा ,,क्या तू और क्या तेरा ,इस उधेड़बुन में तनावग्रस्त न रहें ,,,उड़ानें ऊँची हों तो अक्सर गिरने का कारण बन जाती हैं , भूल कर भी शाख अपनी पदभ्रष्ट न रहें ,,,,त्यागें न धरती अपनी ,अपने संस्कार न  भुलाएं ,,,,,,आइये इसी कामना के साथ नवरात्र मनाएं