बुधवार, 23 अप्रैल 2014

Cancer Ascendent ...Kark Lagna कर्क लग्न: आशीर्वाद या अभिशाप

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भ्रमण चक्र का चतुर्थ लग्न कर्क, विप्र वर्ण, स्त्री लिंगी ,जल तत्वीय एक शुभ लग्न है.ज्योतिष शास्त्र में इसे राजयोग लग्न माना गया है.हो भी क्यों नहीं चारों केंद्र स्थानों में किसी न किसी ग्रह की उच्च राशि है.और सबसे बड़ी बात ये की ये मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्म लग्न है.धरती के सर्वाधिक निकट व सर्वाधिक प्रभावित करने वाले चंद्रमा के आधिपत्य का लग्न है ये.अधिकतर राजनीति में उच्च स्थानों पर सुशोभित नेताओं का भी यही लग्न देखा गया है ये लग्न.उदाहरण के लिए इंदिरा जी,जवाहर जी ,वर्तमान में सोनिया जी आदि कई नेता हैं.
      कर्क लग्न का सारा हिसाब किताब लगभग चंद्रमा व भूमि पुत्र मंगल के इर्द गिर्द घूमता है.कैसी विडंबना है की इस लग्न में राजयोग बनाने वाले मंगल की ही ये नीच राशि मानी गयी है.तमाम सिद्धांतों के बाद भी लग्न में मंगल नीच ही तो माना जाता है वो भी मित्र होकर,इससे नजर फेरना संभव नहीं.अपने दैनिक जीवन में राम की ही भांति कर्क लग्न के जातकों को मैंने 90%बार वनवास काटते देखा है.अब आप ये न कहें कि पंडित जी अब तो वन ही नहीं रहे.वनवास का भावार्थ कई रूपों में देखा जा सकता है.
         यदि कर्क पर राम का प्रभाव मान लिया जाय तो ये भी मानना होगा की बिना हनुमान के कैसे राम.राम के जीवन में हनुमान ही संकटमोचन थे,स्वाभाविक रूप से कर्क में मंगल ही योगकारक होता है.किन्तु हनुमान तो शापित थे,बिना गुरु (जामवंत)के उन्हें अपनी शक्तियों का ध्यान कहाँ?ठीक अंदाजा लगाया आपने.जिस लग्न में मंगल नीच,देवगुरु वहां उच्च.लग्न का गुरु उच्च होकर हँसक योग व केंद्र त्रिकोण योग बनाता है.
       सामान्यतः मंगल की दशा का इन्तजार तो इस लग्न को करना ही होता है.इस बीच जो अपने हनुमान को पहले ही ढून्ढ पाए ,वो पहले सीता(सफलता) को ढूँढ लेते हैं.हनुमान अर्थात हनु+मान,जिसने अपने मान का हनन करना सीखा.हाँ जी,.....आम जनों के मुकाबले इन जातकों में एटिटीयूड कुछ अधिक होता है.खुद को अधिक समझदार मानने का गुण.भावनाओं की अधिकता.तभी तो मंगल मित्र होकर भी कर्क में नीच है.भला भावनाओं में भरा हुआ जोश शुभ रिसल्ट कैसे दे सकता है.भावनाओं को तो विवेक चाहिए,जो सोच समझ कर उचित निर्णय कर सके.तभी तो गुरु उच्च हैं यहाँ पर.
      योगकारक मंगल यदि उच्च होता है तो दाम्पत्य पर दोष करता है।रुचक योग बनाता है तो पंचम शिक्षा से षडास्टक बनाता है.शिक्षा का किसी अन्य विषय में और जीवन  में रोजगार का प्रयास अन्य क्षेत्र में.संघर्ष बढता ही जाता है..इसीलिए तो शापित लग्न मानता हूँ इसे.इस लग्न में कार्य भाव का अधिपति भौम ,आय का शुक्र ,धन का सूर्य व भाग्य का अधिपति देव गुरु होते हैं। यहाँ शुक्र को छोड़कर बाकी तीनो ग्रह आपस में मित्र हैं तो ऐसे में जो भी ग्रह अधिक शक्तिशाली हो ,उससे सम्बंधित कार्य व्यवसाय उचित फल प्रदान करता है। मंगल का प्रभाव दशम भाव पर जातक को पावर देता है ,इसी समीकरण में यदि सूर्य व गुरु भी दशम को बल दे रहे हों तो जातक सरकारी क्षेत्र में उच्च पदस्थ हो सकता है। शनि या राहु दशम भाव या दशमेश को प्रभावित कर दें तो नौकरी आदि का स्तर कुछ हल्का हो जाता है  
       दक्षिण की यात्राएँ यहाँ सहायक होती हैं.दक्षिण बार बार संकेत करता है.जो समझ गया वो आगे बढ़ता जाता है.राम को दक्षिण की यात्राओं ने ही राम बनाया,वरना मात्र अवध के नायक थे.जरा से योग अन्य भी सहायक हों तो विदेश यात्राओं के सर्वाधिक योग इसी लग्न में बनते हैं.
               धन की बात करें तो धनेश उच्च होगा तो अपने भाग्य भाव में होगा,आयेश उच्च होगा तो अपने से आय भाव में होगा..यानि दोनों ओर से मजबूत.तभी तो राजाओं का लग्न कहा गया है.बुध द्वादश व पराक्रम भाव का अधिपति है.सूत्र कहता है की ऐसे में बुध जरा भू मजबूत हो तो जातक के पराक्रम का लाभ बाहरी लोग लेते हैं.वहीँ भाग्येश उच्च होगा तो अपनी मूलत्रिकोण राशि से अष्टम में होगा..स्वाभाविक रूप से अपना भला न सोच कर दूसरों के हित में अपना सर्वस्व होम करना.इन्ही गुणों ने राम को पूज्य बनाया,किन्तु आज के परिवेश में यही गुण दुःख का कारण बनते हैं.सोच के देखें.बड़ा रोचक लग्न है व मुझे स्वयं विश्लेषण हेतु कर्क सर्वाधिक प्रिय लग्न है.एक बात और बताऊँ?????...मानेगे....? खूब आजमाया है मैंने.....कहूँ?90% मामलों में ऐसे जातकों का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं होता.10% को अपवाद स्वरुप छोड़ देता हूँ किन्तु पाठक खुद सोचें की 90%आंकड़ा बहुत अधिक होता है.शनि यदि किसी भी प्रकार से दशम भाव को प्रभावित कर रहे हों तो सामान्यतः स्थिति संसार की दृष्टि में तो आदर्श रहती है किन्तु भीतर ही भीतर जातक दुखी रहता है। स्त्री स्वभाव की थोड़ा तेज हो सकती है किन्तु जातक उसके भाग्य से बहुत कुछ प्राप्त करता है इसमें कोई संशय नही. शनि के साथ मंगल अथवा गुरु की युति इस मामले में थोड़ा राहत देती है। अकेले  देव गुरु यदि सप्तम में हो जाएँ तो दाम्पत्य भाव बिखरने लगता है। शनि के साथ बुध की युति शारीरिक दुर्बलता उत्पन्न करती है और अगर ये युति अष्टम भाव में हो तो हालात अधिक चिंता जनक होते हैं। ये लग्न वैसे भी अल्प संतान का कारक है अतः ऐसे में कुंडली मिलान के समय संतान भाव पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
                               स्त्री की कुंडली में यदि शनि पंचम भाव में हो तो उसका जीवनसाथी अध्यात्म व दर्शन की और अधिक ध्यान देता है जिस कारण परिवार के लिए समय काम देता है. अकेला शनि अष्टम भाव में पति को दीर्घायु किन्तु रोगी शरीर का स्वामी कर सकता है। सप्तम भाव में अकेला गुरु दाम्पत्य भाव के लिए उलझने बढ़ाता है।          
       कुछ सामान्य से उपाय इस लग्न में काफी असरदार सिद्ध होते हैं.भविष्य में उन पर भी चर्चा करेंगे.लेख के प्रति आपकी अमूल्य राय की प्रतीक्षा में .....
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सोमवार, 17 मार्च 2014

सीता कि अग्नि परीक्षा भाग -२

श्रीखंड सम  पावक प्रबेश कियो सुमरि प्रभु मैथिलि
जय कोशलेश महेश बंदित चरण रीति अति निर्मली
प्रतिबिम्ब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे
प्रभु चरित कहूं न लखें  नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं  खरे   
            इन पंक्तियों के साथ ही इस कथा का अगला अध्याय आरम्भ होता है जिसे हमने भाग १  http://rightsunshineforu.blogspot.in/2013/09/blog-post_20.html में अधूरा छोड़ा था।सीता की  अग्नि परीक्षा के सन्दर्भ में उठने वाले प्रश्न के द्वारा श्री राम के चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाले   अज्ञानियों द्वारा हर समय ये संशय किया जाता रहा है कि मर्यादाओं कि रक्षा का प्रमाण प्रस्तुत करने वाले अवध नायक ने सीता को अग्नि परीक्षा के लिए कह कर सभ्य समाज में स्त्रियों की भूमिका को ,उनके महत्त्व को कम किया है। ऊपर कही पंक्तियों में तुलसीदास जी यही कह रहे हैं कि प्रभु के इस चरित्र (खेल)को किसी ने नहीं जाना। नहीं समझा।
                            वनवास के अंतिम वर्षों में राम कुछ अजीब सी संधिग्ध परछाइयों का अनुभव आश्रम के आस पास कर रहे थे। वनवास काल में अब वे बहुत कुछ राक्षसों के विषय में जानने समझने लगे थे। ऐसे में जब सुपर्णखा वाला हादसा हो चुका था ,राम सीता जी कि सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित थे। अपने विश्वस्त सूत्रों से राम को मालूम हुआ था कि राक्षस सीता जी को हानि पहुँचाने का प्रयास कर सकते हैं।
                वो विद्या जिसका जनक स्वयं रावण था और अब अपने वनवास काल में ऋषियों के  सहयोग  से राम स्वयं इसमें निपुण हो चुके थे ,(जिसे आज हम क्लोन आदि के रूप में जानते हैं ) ये बात अपने सूत्रों से रावण को ज्ञात हो चुकी थी 
                                       कालान्तर में  सीता जी का अपहरण रावण के द्वारा किया गया।  सीता का अपहरण कर रावण जब सुरक्षित अपने क्षेत्र में प्रवेश कर गया तब उसे सीता पर कुछ संदेह हुआ।  रावण दुविधा में था ,जल्दबाजी में कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गयी उससे ? ऐसे में जैसे ही रावण ने ये आभास किया कि कहीं राम ने भी तो छल  द्वारा उसे दूसरे ही क्लोन का अपहरण करने का मौका तो नहीं दिया जान बूझ कर।  तो अब सीता को अपने साथ अपने महल में ले जाने का रिस्क लेना उचित नहीं था। ये शत्रु की किसी साजिश का हिस्सा हो सकता था। जब तक सीता के बारे में रावण आश्वश्त नहीं हो जाता तब तक उसे कहीं किसी और ठिकाने पर रखना उचित था।जब से मेघनाथ ने इंद्र को पराजित किया था तब से ही देवता इस मौके की प्रतीक्षा में थे कि कैसे रावण का दर्प चूर किया जाय। दशरथ कि देवताओं से निकट मित्रता रही थी और पूर्व में भी देवासुर संग्राम में दशरथ देवताओं की ओर से युद्ध में भाग ले चुके थे। ऐसे में राम का देवताओं से जाहिर तौर पर मित्रता के सम्बन्ध थे। अब बहुत सम्भव था कि देवताओं द्वारा रावण के खिलाफ किसी प्रकार के अभियान में राम भी उस षड्यंत्र का हिस्सा हों। ये बात दिमाग में आते ही रावण का मन संशय में डूब गया। पता नहीं क्या होने जा रहा है ,विभीषण द्वारा गुप्त रूप से रावण के खिलाफ प्रजा को भड़काया जा रहा है ऐसा समाचार भी उसे प्राप्त था ,मेघनाद के बढ़ते वर्चस्व से उसके अन्य पुत्र अब रावण से  मतभेद  रखने लगे थे ,और जब से मेघनाद ने इंद्र को पराजित किया है तब  मंदोदरी भी रावण की हर नाजायज हरकत का खुलकर  विरोध करने लगी है। अपने पिता से अधिक इंद्रजीत पर अपनी माँ का प्रभाव है। ऐसे में सीता को सीधे महल में ले जाने  का साहस रावण का नहीं हुआ। अशोक वाटिका पर अभी पूरी तरह से रावण का ही प्रभाव था ,उसके विश्वास पात्र सैनिक ही वहाँ स्थापित थे ,अतः सीता के लिए फिलहाल वहाँ से सुरक्षित स्थान कोई नहीं है ,ऐसा विचार कर उसने सीता को लेकर अशोक वाटिका का रुख किया। 
             पाठक वृंद जानते हैं कि रावण विजय के पश्चात राम ने जब सीता को अग्नि परीक्षा के लिए कहा तो उसका वास्तविक अर्थ आग में बैठ कर जलना नहीं था ,असल में उस समय के अनुसार अग्नि देव उन शक्तियों से सुसज्जित थे जिसके द्वारा किसी के असल नक़ल का पूर्ण विश्लेषण वे कर सकते थे। संसार को ये साबित करने के लिए कि कहीं रावण ने असली सीता का वध कर उसके बदले अशोक वाटिका में नकली सीता तो स्थापित नहीं कर दी थी ,राम ने सीता कि अग्नि परीक्षा करा लेने उचित समझा।रावण कि खुरापाती खोपडी का कोई भरोसा नहीं था। अतः मजबूरन राम को अग्नि की सहायता लेनी ही पड़ी। 
                                 अग्नि देव ने अपनी विद्या के द्वारा ये साबित किया कि ये वो ही  पहले की सीता है। ये परीक्षण सीता जी के अस्तित्व को लेकर हुआ था न कि उनके चरित्र को लेकर।मज़बूरी में उठाये गए इस कदम को बाद में इतिहासकारों  ने  दूसरे ही रूप में प्रस्तुत कर राम के चरित्र पर ही  दाग लगा दिया।
                  आशा है आप लोग सहमत होंगे। भविष्य में इसी कड़ी को आगे जोड़कर बताने का प्रयास करूँगा कि सीता जी को बाद में वाल्मीकि के आश्रम में क्यों  भेजना पड़ा ,और दोष राम व धोबी के सर पर आया। आप लोगों कि प्रतिक्रिया ही आगे लिखने का सम्बल प्रदान करेगी। होली कि शुभकामनाओं के साथ। … www.astrologerindehradun.com