शनिवार, 30 नवंबर 2013

Goal of Arjun.... लक्ष्य

द्रुपद के माथे की लकीरें निरंतर गहराने लगीं थी.कहीं अपने अपमान का बदला लेने की जिद में उन्होंने द्रौपदी के स्वयंवर की परीक्षा इतनी कठिन तो नहीं रख दी जो अब द्रौपदी के भविष्य के साथ साथ स्वयं उनके सम्मान को भी आहत करने वाली थी. न जाने क्यों अचानक द्रुपद को आज राजा जनक का स्मरण हो रहा है.क्या अपनी पुत्री के लिए उपयुक्त वर की आकांक्षा रखना पिता के लिए गलत है.अब क्या होगा.एक एक कर संसार के अनेक धनुर्धारी परीक्षा में असफल होकर अपने स्थानों पर मुंह लटकाए बैठे हैं,व परीक्षा प्रांगण में छत पर घूमती मछली मानो अब भी मुस्कुराते हुए उन्हें मुंह चिढ़ा रही है.त्रेता में तो जनक का संताप
मिटाने स्वयं राम अवतरित हुए थे.यहाँ कौन है,जो द्रुपद को आस बंधाये?
                      सभा मौन है,सभी के चेहरों पर निराशा और संशय के बादल हैं.द्रौपदी ने आहिस्ता से अपनी सखी के हाथ को अपने हाथ से हटाया और कृष्ण की और देखा.जिस दिन कृष्ण ने द्रुपद को स्वयंवर का सुझाव दिया था तो ये भरोसा दिलाया था की इस के द्वारा द्रौपदी आर्यव्रत के सर्वश्रेष्ट धनुर्धारी को अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करेगी.कृष्ण अभी भी उसी प्रकार मंद मुस्कान अपने अधरों पर धारण किये हैं जो जो उनकी चिर संगिनी है.अपने शैशव काल से,( जिस किसी ने भी कृष्ण के जीवन का परिचय पाया है ,उसे भली भाँती ज्ञात है कि ) कृष्ण कभी सामान्य जीवन नहीं जी पाए.हर समय कोई न कोई विपदा -समस्या से सदा उनका चोली-दामन का साथ रहा है,व कुछ भी परिस्थितियां रही हों किन्तु इस मुस्कराहट ने कभी अधरों का त्याग नहीं किया.कृष्ण की इसी मुस्कराहट का भेद जानने वाला हर कोई
उन्हें ईश्वर मानता है और उसका ह्रदय भली भाँती जानता है की जब तक भगवान् के अधरों पर ये मुस्कान है तब तक संसार की कोई शक्ति उसका अहित करने का सामर्थ्य नहीं रखती.
          कृष्ण मुस्कुरा रहे थे,अर्थात अभी कुछ सामने आना बाकी है.संसार साक्षी है कि कालिया नाग व इंद्र तक का घमंड चूर करने वाले यशोदानंदन ने अपने वचन का निर्वाह करने,उन पर भरोसा रखने वाले के सम्मान की रक्षा के लिए कई बार प्रकृति के नियमों को भी लांघने का साहस किया है.भक्त की लाज के लिए अपने चरित्र के विरलतम लक्षणों का प्रदर्शन संसार के सम्मुख भविष्य में कई बार उन्होंने किया  पाठक वृन्द भली भाँती  इससे परिचित हैं.
             कृष्ण की मुस्कराहट ने पांचाली को आश्वश्त किया. यही आश्वासन ब्राह्मण दीर्घा में बैठे सुगठित शरीर के उस युवक ने भी पाया,जिसकी भुजाएं अभी तक के घटनाक्रम का साक्षी बनने के बाद मानो स्वयं का परिचय देने हेतु नाड़ियों के प्रवाह को त्याग ,फट जाने को आतुर थी.एक एक प्रतियोगी के असफल होने के साथ साथ सभा की मायूसी उसके संयम की चरम परीक्षा थी.ओह फिर कोई चूका.नवयुवक उस प्रतियोगी के लक्ष्य भेदन से पूर्व ही ताड़ गया था की ये घूमती मछली की आँख को नीचे रखे जल से भरे कुंड में निहारकर भेदने का सामर्थ्य नहीं रखता.भला जो सही प्रकार से धनुष को सीधा थामना  नहीं जान सका हो वो उसके संचालन में किस प्रकार निपुण हो सकता है.युवक का संयम छूट रहा है.एक मौका मिले तो वह क्षण भर में इस सभा को बता सकता है की धनुष विद्या किसे कहा जाता है व लक्ष्य कैसे भेदे जाते हैं.
               किन्तु अभी तक कृष्ण का संकेत युवक की नहीं मिला है.न जाने क्या सोच रहे हैं कृष्ण?क्या है उनके मन में? अपनी उत्कंठाओं को दबाये बैठा युवक जानता है की सफलता ने सदा उन्ही वीरों के चरणों में शीश नवाया है ,जिन्होंने संयम की कला सीखी है.अपने भावों  को ,अपने वेग को ,अपने ज्ञान को जो वीर शांत भाव से प्रदर्शित करने की कला में निपुण हो पाया है ,उसी के आदेश की दासी सदा सफलता की देवी बनी है .अतः संयम रे मन ,संयम.
             अचानक युवक को लगा की कृष्ण की भृकुटी ने हलचल की है.युवक को उसका बहु प्रतीक्षित संकेत प्राप्त हुआ ,मानो प्राण मिले.वर्षों से मन में पल रहा संयम आज स्वयं को समस्त संसार के सम्मुख प्रदर्शित कर देना चाहता है.स्वयं पर व अपने परिवार पर आज तक होते आये अत्याचार ,भेदभाव का विरोध आज खुल कर करने का समय है.आज विश्व को अपनी भुजाओं का हुनर,अपनी आँखों का सामर्थ्य अपने कौशल का परिचय देने का समय है.कुरुवंश के साथ ही समस्त राज्यों के परम योद्धा यहाँ आज उपस्थित हैं.आज नहीं तो कभी नहीं.
                    सभा ने एक और प्रतियोगी को जल कुंड की ओर बढ़ते देखा.किन्तु यह सामान्य प्रतिभागियों से भिन्न है.इसका शरीर मानो अग्नि में तपा कुंदन है,इसकी एक एक शिरा अपने पर किये परिश्रम की कथा खुद कहती है.इसकी चाल में आत्मविश्वास झलकता है.क्या यह वीर राजा  द्रुपद की असंभव सी प्रतीत हो रही इस प्रतिज्ञा की अग्नि में अपने कौशल का प्रदर्शन कर इसका मान रख पायेगा?
                  युवक ने जलकुंड की ओर कदम बढ़ाये.चलते चलते शीघ्र दृष्टी से पांचाली की ओर देखा.आज इतिहास बनने वाला था.संशय सभा के मन में हो सकता है,युवक के ह्रदय में किंचित भी नहीं.उसने सदा गुरु की बताई बातें ह्रदय से ग्रहण की हैं..अपने अभ्यास में रात दिन की परवाह नहीं की है.परीक्षा कठिन जरुर प्रतीत हो रही है किन्तु युवक के लिए यह कौतुहल से अधिक कुछ नहीं.विद्या पर अपने कौशल पर उसे उतना ही अटल विश्वास है जितना इस बात पर की समग्र ब्रह्माण्ड की गतियाँ योगेश्वर कृष्ण की तर्जनी से संचालित हैं.फिर वो कोई साधारण मनुष्य तो स्वयं भी नहीं है.वो अपनी माता को देवताओं के राजा  इंद्र के वरदान से प्राप्त हुआ है.आर्यव्रत के सर्वश्रेष्ट गुरु आचार्य द्रोण का वह सर्वश्रेष्ट शिष्य है.बचपन सी ही उसकी दृष्टि ने लक्ष्य के सिवा अन्य कुछ भी न देखने का अभ्यास किया है.उसे कृष्ण के रूप में सर्वोत्तम मित्र की प्राप्ति है. वह उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में जन्मा सूर्य का सा प्रताप लिए पार्थ है, धनञ्जय है.वो जग को जीतने का सामर्थ्य रखने वाला अर्जुन है.
                       अर्जुन ने जल कुंड के निकट रखे धनुष को निहारा कुछ हलके स्तर का प्रतीत हो रहा है,किन्तु कोई समस्या नहीं.समग्र दृष्टि से उसने सभा को देखा,व अंत में घुमते हुए लक्ष्य को देखा .अर्जुन नें मन ही मन गुरु को प्रणाम किया,वो आज जो कुछ भी है अपने गुरु के ही तो आशीर्वाद से है.घुटनों के बल बैठ कर धनुष को हाथ में लिया.हाँ अब ठीक है,अर्जुन का प्रिय अस्त्र उसके हाथ में है.धनुष हाथ में आते ही सदा से अर्जुन का आत्मबल आकाश को लांघने लगता है.कुछ भी असंभव नहीं रहता.
                      अर्जुन ने लक्ष्य साधा,अपने ध्यान को मात्र मछली की आँख पर केन्द्रित किया.इतिहास साक्षी है सदा से की जिन वीरों ने लक्ष्य से सम्बन्ध रखा है ,उन्होंने सदा उसे प्राप्त किया है.क्षण भर में समस्त ब्रह्माण्ड की शक्ति उसने अपनी भुजाओं में महसूस की,सभा सांस रोके खड़ी थी,धनञ्जय ने भी अपने श्वास की गति को नियंत्रित किया,क्षण भर में  बाज की सी चतुर दृष्टि से  लक्ष्य से अपनी दूरी को सटीकता से भांपा .अब मात्र ऊपर घूमती आँख का प्रतिबिम्ब जल में दिख रहा था.अर्जुन से क्षण की महत्ता को समझा व तीर छोड़ दिया.पलक झपकते ही बाण अपने लक्ष्य को भेद चूका था.पुष्पों की वर्षा अर्जुन पर होने लगी थी.समस्त विश्व उसके बल की ,उसके कौशल की थाह पा चूका था.वह अपना सम्मान वापस प्राप्त कर चुका था.वह संसार का सर्वश्रेष्ट धनुर्धर था.उसकी जय जयकार से सभा आनंद में डूब चुकी थी.पांचाली ने कृष्ण की और देखा.उन्होंने अपना वचन निभाया था .भगवान् मंद मंद मुस्कुरा रहे थे. 

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

सीता की अग्नि परीक्षा

सभी पाठकों को सादर नमस्कार। आज बहुत दिनों बाद आप सब से मुलाकात का सौभाग्य मिला। आशा है प्रभु की कृपा आप सभी पर होगी ।कई बार जिज्ञासुओं व आम सामान्य जन के मन में भी ये प्रश्न आता है की आखिर सीता जी की अग्नि परीक्षा का क्या कारण था और सदा अपने चरित्र के द्वारा मनुष्य मात्र को मर्यादाओं का पाठ पढ़ाने वाले अवध के राजा,ब्रह्माण्ड नायक प्रभु राम भला इस के द्वारा क्या सन्देश आम जन को देना चाह रहे थे?राम के अस्तित्व व राम के चरित्र की व्याख्या करने वाले भी कई बार इस प्रश्न पर उलझते दिखाई देते हैं ।
  प्रश्न सर्वप्रथम ये उठता है की हम सीता जी के विषय में कितना जानते हैं ।कई स्थानों पर तलाशने के बावजूद कहीं भी सीता जी की जन्म तिथि का अंदाजा नहीं हो पाता। रामायण के कई रूप उपलब्ध हैं ।कहा भी  गया है "नाना नाना भांति राम अवतारा -रामायण सतकोटि अपारा" कई किस्से हैं ,कई लोकोक्तियाँ हैं ,कई ग्रन्थ हैं जो इस महानतम ग्रन्थ का बखान करते हैं ।
    श्रेष्ट ब्राह्मण व महान क्षत्रिय के सम्मिलित रूप को अगर एक साथ लें तो रावण का किरदार एक सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में प्राप्त होता है ।जैसा की विदित है उस समय विशेष में सुरों व असुरों में युद्ध होते रहते थे ।समय के साथ साथ रावण अपनीं विद्या के प्रयोगों द्वारा नए नए अविष्कार करने लगा तथा इस प्रकार शक्तियां प्राप्त करते करते आखिरकार वो देवताओं से  बली हो गया व समस्त ब्रह्मांड को अपने अधिकार में करने के प्रयास करने लगा ।यहाँ रावण का उदय एक महान वैज्ञानिक के रूप में हमारे सामने आता है। ब्रह्माण्ड विजय के अपने सपने को पूरा करने हेतु रावण को आवश्यकता थी की संसार की सात्विक शक्तियों पर भी उसका नियंत्रण हो ।फलस्वरूप अपने उदेश्य की पूर्ति के लिए उसने एक प्रयोगशाला का निर्माण किया ,जहाँ वह अपने सगे भाई कुम्भकर्ण की सहायता से सात्विक मनुष्यों के रक्त से   ऐसे मनुष्यों के निर्माण हेतु प्रयासरत हो गया जो पूर्ण रूप से सात्विक प्राण हों किन्तु रावण की रचना होने के कारण उन पर अधिकार मात्र रावण का ही हो ।कुम्भकर्ण ,जैसा की नाम से ही ज्ञात हो जाता है  अपने समय का कुम्भ यानी घड़े आदि  के  द्वारा नए अविष्कारों के लिए
विख्यात था ।इन घडो कुम्भों को आज हम परखनलियों टेस्ट ट्यूबों आदि प्रयोगशालाओं में उपयोग होने वाले उपकरणों के रूप में जानते हैं ।धरती पर एक अज्ञात स्थान पर बनी इस प्रयोगशाला में कुम्भकर्ण देवताओं की नजर से बच कर लगभग 6 महीने अपने प्रयोगों में व्यस्त रहता था ,जिसे जानकारी के अभाव में हम उसका शयन काल मानते आए हैं ।
                 रावण के भेजे सैनिक इस प्रयोग हेतु दूर उत्तर दिशाओं की तरफ तपस्याओं में लिप्त साधुओं का रक्त जमा कर लाते थे ।संभवतः इस प्रयोग में उनके शरीर की अणु या कुछ अन्य हिस्सों का उपयोग भी होता हो ,जिसे शरीर विज्ञानं से जुड़े लोग बेहतर परिभाषित कर सकते हैं ।
             इंद्र आदि सभी देवताओं को आभास तो होने लगा था की रावण किसी ऐसे आविष्कार में जुटा हुआ है जिससे उसकी शक्ति अपराजित हो जायेगी। किन्तु उसका यह आविष्कार हो कहाँ रहा है ,अथवा उसकी प्रयोगशाला धरती पर कहाँ है इस पर अभी तक भी संशय था ।इसी बीच संसार के महान वैज्ञानिक। द्वारा अपनी महानतम खोज हो चुकी थी ।रावण अपनी प्रतिभा की सीमाओं का परिचय खुद को तो दे ही चूका था और अब संसार उसके अविष्कार से अचंभित होने वाला था ।
     ऋषि मुनियों के शरीर से प्राप्त उर्जाओं से रावण अपनी गुप्त प्रयोगशाला में एक ऐसे परखनली शिशु का निर्माण कर चुका था जिसका बाद में हम जन्म घड़े से हुआ सुनते आये हैं। सुबुद्ध पाठक ताड़ गए होंगे की मेरा संकेत किधर जा रहा है ।यहाँ चाहें तो अपनीं कल्पना को थोड़ी छूट देकर आप इसमें कुम्भकरण का रोल तय कर सकते हैं ।यही कारण है की खोज कर भी सीता की जन्म तिथि प्राप्त नहीं होती व अधिकतर कथाकारों ने इस विषय पर चतुराई भरा रास्ता तय किया ।
                  कारण कुछ भी रहा हो किन्तु आखिरकार देवताओं को  इस की खबर लग ही गयी व उन्होंने धरती पर इस प्रयोगशाला का पता लगा ही लिया ।जी हाँ पाठक वृंद आप बिलकुल सही अंदाजा लगा रहे हैं,यह कहीं  और नहीं अपितु राजा जनक की नगरी मिथिला में थी ।जनक जो स्वयं बड़े प्रतापी राजा थे व अवध नरेश दशरथ के विपरीत सुरों -असुरों के झगडे  में सम बने रहते थे ।दशरथ जी के विषय में तो कई बार प्रमाण मिलता है की वो देवताओं की तरफ से युद्ध हेतु जाते थे ।देवताओं ने जनक को बहुत कहा की रावण की इस प्रयोगशाला को नष्ट करें ,किन्तु जनक ने उनकी एक न सुनी । वर्षा रोककर इंद्र देव ने आखिरकार जनक को उनका कहा मानने के लिए मजबूर कर दिया ।तीन वर्षों तक अपनी प्रजा को पानी के लिए तरसता हुआ जनक न देख सके। उन्होने देवों को अपने राज्य में आकर रावण के सपने ,उसके मंसूबों पर आघात करने का मौका दे दिया किन्तु इस बीच रावण द्वारा किये गए उसके अविष्कार को समाप्त होने से बचा लिया ।जिसे बाद में धरती से प्राप्त होना बताया ।कालान्तर में पाठक अंदाजा लगा सकते हैं की क्यों आखिर सीता को धरती की गोद में समाना बताया गया ।जाहिर तौर पर वह सामान्य। मनुष्य नहीं थी तो सामान्य मृत्यु उन्हें प्राप्त नहीं थी ।सीता नाम से कुम्भ राशि का ही संकेत प्राप्त होता है (आखिर कुम्भ की ही तो संतान थीं वो )कुम्भ की होकर उन्होंने अपने लिए सप्तम दाम्पत्य भाव पर सूर्यवंश की राशी का चयन किया ,ऐसा प्रमाण स्पष्ट है ।
                        देवताओं ने रावण की प्रयोगशाला को नष्ट कर दिया व रावण स्वयं के अविष्कार को भी इसी में समाप्त मान चुका था ।वर्षों पश्चात जनकपुरी में स्वयंवर का आयोजन हुआ ।रावण भी मेहमान के रूप में इस आयोजन में उपस्थित था ।सीता को देखते ही रावण की ऑंखें सहसा इस दृश्य पर विश्वास न कर पाई।। भला कोई रचियता अपनी कृति को देखकर पहचानेगा नहीं ।ये धोखा था,उसका प्राण दिया हुआ जीवन आज कोई और कब्जाए बैठा था ।शायद कई बार पाठकों ने सीता को रावण की पुत्री के रूप में कथाओं में जाना होगा ।कृति का रचनाकार ही तो आखिर उसका वास्तविक जनक होता है ना ।
       यहीं से रावण ने प्रण किया की जैसे भी हो मुझे सीता वापस चाहिए ।जनक के सामने कुछ न कर पाया रावण सही मौके की तलाश में लग गया ।इस समय काल में अवध में राम के जन्म की दैवीय घटना घट चुकी थी ।कालान्तर में स्वयं राम इसी विद्या के पारंगत हो चुके थे जिस के द्वारा रावण ने सीता का निर्माण किया था ।इतिहास अभी बनना बाकी था ......
           शीर्षक को पूरा अगले भाग में किया जाये ऐसा प्रयास करूँगा ।किन्तु निर्भर पाठकों के रुझान पर ही है,ऐसा तय माने ।...फिलहाल इजाजत दें ।नमस्कार।
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