बुधवार, 18 जुलाई 2012

सीता स्वयंवर ,धनुष ,जनक और राम

वैदेह राज्य की राजधानी थी मिथिला.मिथिला का राजा था  कुशध्वज. आज के बिहार - नेपाल  के राजा थे कुशध्वज .वैदेह के राजाओं को जनक कहा जाता था.जिस जनक को हम सीता जी के पिता के रूप में जानते हैं वो एकीसवें जनक थे और उन्ही का नाम कुशध्वज था.सीता को वैदेह के नाम पर ही वैदेही और मिथिला की राजकुमारी होने के कारण मिथिला कुमारी भी कहा जाता था.जनक की पुत्री होने के कारण जानकी तो वे थी हीं.
               राजा जनक बहुत प्रभावी राजा थे जिनका शासन बहुत बड़े भूभाग पर था.चार पुत्रियों के पिता जनक का कोई पुत्र नहीं था.राजा बूढ़ा होता जा रहा था और अब दूर के इलाकों पर उसकी पकड़ कमजोर होती जा रही थी.उत्तर-पूर्व दिशाओं से चलने वाले उसके व्यापार को वहां के कुछ संगठित डाकुओं,व कुछ छोटे क्षत्रिय राजाओं के द्वारा (जो की अपने पूर्वजों के सम्मान की भी परवाह नहीं करते थे )लूटा जाने लगा था.चारों  तरफ अराजकता फैलने लगी थी.इसी अराजकता को कम करने के लिए फरसुराम कई बार इनका संहार कर चुके थे.लेकिन ये लोग फिर से उसी ढर्रे पर लौट आते थे. फरसुराम राजा जनक के कुल गुरु थे  व फरसुराम स्वयं अब अधिक आयु के होने लगे थे.जनक की चिंता बढती जा रही थी.राज्य का व्यापार बहुत प्रभावित होने लगा था,मेरे बाद मेरे राज्य व मेरी प्रजा का क्या होगा ये प्रश्न जनक को खाए जा रहा था.उपायस्वरूप सीता का स्वयंबर रखा गया.जिस क्षेत्र से लूट पाट की धटनाएं हो रही थी उसका भौगोलिक आकर एक धनुष की तरह था और वहां के निवासी शिव के परम भक्त थे.आज भी आप नेपाल के नक़्शे में तलाशने  का प्रयास करेंगे तो वो जगह धनुष नाम के जिले से  आज भी मौजूद है.  अपने  आकार  के नाम से ही उसका नाम है.
                     सीता के स्वयंवर में शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की शर्त यही थी .सांकेतिक रूप से जनक ने ऐलान किया था की जो भी राजा शिव के भक्तों के बाहुल्य वाले इस क्षेत्र को नियंत्रित करने का वचन देता है तो जनक के राज्य के साथ साथ सीता को पाने का अधिकारी बनेगा.राम अयोध्या के भावी राजा थे.धनुष उनके राज्य से बहुत दूर नहीं था.वे सक्षम थे वहां हो रहे उपद्रवों पर लगाम लगाने पर.अततः उन्होंने यह शर्त सहर्ष स्वीकार की.बावजूद इसके की अपने स्तर के अनुकूल न मान कर जनक ने अयोध्या को स्वयंवर का निमंत्रण भी नहीं भेजा था.विश्वामित्र जनक के कुलगुरु भी थे.वे स्वयं वैदेह को लेकर चिंतित थे.जनक की मृत्यु के पश्चात कोई भी मिथिला पर आक्रमण करने का साहस कर सकता था.दक्षिण भारत के अनार्यों का प्रभाव भी इस क्षेत्र पर बढता जा रहा था,जिनसे रक्षा हेतु वे अवध के राजकुमारों को अपने साथ वन में लाये थे.वन में वो राम की दिव्य शक्तियों से परिचित हो चुके थे.जनक के राज्य के लिए  राम से बेहतर उत्तराधिकारी कोई नहीं हो सकता था. अततः वे स्वयं वन से दोनों भाइयों को लेकर मिथिला पधारे.
                           फरसुराम ने जब ये बात सुनी की राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की सहमती दे दी है तो क्षत्रियों से सहज रूप से दुश्मनी रखने वाले ऋषि स्वयं मिथिला पहुँच गए.अपने परम भक्त जनक के प्रति उनकी चिंता उन्हें वहां खींच लायी.वहां विश्वामित्र के समझाने व स्वयं राम को परख लेने के पश्चात उन्हें विश्वास हो गया की ये कुलीन क्षत्रिय अवश्य उन उपद्रवियों को परास्त कर धर्म की पताका फहराएगा.
                 वास्तविक किस्सा तो मेरी क्षुद्र बुद्धि में यही आता है साहब.बाकि प्रभु की लीला है वो ही जाने.मैं तो आज तक यह ही नहीं जान पाया की मुझे रच कर भला उन्होंने कौन सी लीला रची है.भला संसार  का ऐसा कौन सा काम है जो मेरे  जन्म न लेने से रुक जाता.इस विराट संसार में भला किस लिए भेजा है उन्होंने मुझे?

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें