मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

shani ......... शनि देव,, आठवां शनि ,,,कब होता है मारक

मनुष्य के मन में सदा से ये लालसा रही है कि किसी प्रकार उसे अपने आनेवाले कष्ट का कालखण्ड ज्ञात हो जाय तो समय रहते शात्रोक्त उपायों द्वारा उसका निवारण कर स्वयं हेतु एक रक्षाचक्र का निर्माण कर पाने में वो सक्षम हो जाय.....  .आइये आज आपको बताता हूँ कि कैसे आप स्वयं की कुंडली द्वारा अपने लिए भारी पड़ने वाले समय का अनुमान लगाकर समय रहते विशेष प्रयासों द्वारा स्वयं को व अपने परिवार को किसी अनिष्ट संकट से निजात दिला सकते  हैं। पाठकों को सूचित कर दूँ कि फलित ज्योतिष में कारक ग्रह द्वारा घटना को अंजाम दे देने के पश्चात किये  उपायों का बहुत कम उल्लेख मिलता है ,बल्कि कहूँ तो नहीं ही मिलता है.  सभी शाश्त्र दोष को पुर्वरेखांकित कर समय रहते उसका उपचार करा लेने पर बल देते हैं.……  घट चुके फल को वापस करने का सामर्थ्य किसी में नहीं.... you  can't unring a bell …बजी हुई घंटी को अनबजा नहीं किया जा सकता ....मजा  तब है जब घंटी को बजने ही न दिया जाय ,बजने से पूर्व ही उसे साइलेंट जोन में डाल दिया जाय ,यही बचाव कहलाता है ,यही उपाय कहलाता है …
                     ज्योतिष शाश्त्र के सिद्धांतानुसार शनि देव को अनिष्ट की सूचना देने वाला ग्रह कहा गया है …जिज्ञासु पाठक ध्यान दें कि शनि का काम अनिष्ट करना नहीं है (कई बार भावों की गलती से इनके सिर पर ऐसा इल्जाम लगा दिया जाता है )… ये मात्र उसके सूचक हैं … अब अगर आपको टेलीग्राम द्वारा किसी दुखद सूचना की प्राप्ति हो रही है तो भला इसमें टेलीग्राम लाने वाले पोस्टमैन का क्या दोष है भैय्या ?उसे क्यों अपने कोप का भाजन बना रहे हैं ,… क्यों बदनाम कर रहे हैं.…?फोन पर कोई दुखद समाचार मिल रहा है तो दूरसंचार विभाग को इसका कारण मान लेना कहाँ की समझदारी है ....ग्रहों को जब भी उनकी जिम्मेदारियों का बँटवारा हुआ तो शनिदेव को कष्टदायी समय की सूचना देने वाला विभाग सौंपा गया.…अब ऐसे में कहीं भी कुछ अशुभ समाचार प्राप्त होता तो शनिदेव वहां पहले से ही खड़े  दिखाई देते … धीरे धीरे ये सबकी आँख का काँटा बनने लगे … न तो शक्ल अच्छी (काले जो हैं हमारे शनि महाराज ) ऊपर से जब मुंह खोले तब बुरा बोले ....हो गया बंटाधार....अब कौन समझाए कि शनि स्वयं अपनी इच्छा से ऐसा नहीं कर रहे भाई ,ये विभाग है उनका ,जिम्मेदारी है उनकी … कष्टदायी समय के लिए मारक ग्रह ,मारक दशा ,ग्रहों का गोचर व स्वयं हमारे कर्म मिलकर समीकरण बनाते हैं.....इसमें आप से रक्त संबंध बनाने वाले लोग ,आपके द्वारा किये गए उपाय भी बहुत कुछ निर्धारित कर देते हैं ....बरसात को नहीं रोका जा सकता ,किन्तु समय रहते छाते की व्यवस्था की जा सकती है..... जहाँ भाला लगना होता है वहाँ सुई तक बात को सुलटाया जा सकता है ....बड़े बड़े राजाओं ,नेताओं ,व्यवसाइयों ने बुरा वक्त देखा है ....सामर्थ्यवान होकर भी उसकी चपेट से बच नहीं पाये ,काश उस समय का पूर्वानुमान हो जाता तो पहले ही एक प्रयास तो कम से कम किया जा सकता था ....खैर जाने दीजिये ....आइये ये बताता हूँ कि शनि की स्थिति देखकर कैसे भाव सम्बन्धी अनिष्ट  को ज्ञात किया जा सकता है .... फिर से सूचित कर दूँ कि शनि मात्र उस कालखण्ड का संकेत देते हैं। प्रभाव  इस पर निर्भर करता है कि भावपति ,मारकेश ,लग्नेश , दशाशेश ,ग्रह गोचर मिलकर कितना मौक़ा दे रहे हैं अथवा बचाव की मुद्रा में हैं.…
                कुछ स्वयंभू ज्योतिषियों द्वारा समय  समय पर समाज को अधकचरा ज्ञान सौंपने की परंपरा हमेशा  से चली आई है जिसका खामियाजा शाश्त्र को ही भुगतना पड़ा है। मेरा निवेदन है ऐसे ज्योतिषियों कि आप  पूजा पाठ ,भजन कीर्तन ,कथा भागवत ,वैदिक कर्म काण्ड ,जिस विधा में  स्वयं को सहज पाते हैं उस लाइन पर काम करें। किन्तु सूत्रों  की  गलत व्याख्याएं कर ,समाज  झूठा डर दिखलाकर ,  बरगलाने का प्रयास न करें ......                       
                 लग्न आप स्वयं हैं ,लग्न से आठवां भाव स्वयं के लिए कष्टदायी भाव माना गया है … अब ये किस प्रकार से कष्टदायी होगा ये अष्टमेश के व्यवहार पर निर्भर करता है .... अपनी लग्न कुंडली से सम्बंधित अष्टमेश को लग्न कुंडली की नवमांश कुंडली में देखिये (अब आपको संभवतः अर्थ पता चले कि अपने पूर्व के लेखों में नवमांश कुंडली को इतना महत्व देने का आग्रह मैं क्यों करता रहा हूँ ) नवमांश कुंडली में जिस राशि व जिस भाव में लग्न कुंडली का अष्टमेश होगा ,उसी राशि या भाव में जब भी गोचर का शनि विचरण करेगा ,आपके स्वयं के लिए पूर्व उल्लेखित कारकों (मारकेश ,लग्नेश , दशाशेश)  के अनुपात में कष्टकारी समय का आगाज होगा  ....
                                           इसी प्रकार द्वितीय भाव सम्बन्ध के मामले में पिता के मामा का भाव है ,आपके  पैतृक धन सम्पदा का भाव है ,इस भाव का अष्टमेश लग्न कुंडली के नवमेश को माना जाता है (द्वितीय भाव से आठवां भावपति )…अब नवमांश कुंडली में नवमेश की स्थिति देखिये … गोचर में जब इसी राशि अथवा इसी शनि का आगमन होगा वो काल खंड आपके पिता के मामा एवं आपकी पैतृक धनसम्पदा सम्बन्धी दुश्वारियों के लिए जाना जाएगा …
                                 तृतीय भाव छोटे भाई बहनो ,सौतेली माता एवं पराक्रम का भाव है … तीसरे से आठवां भाव अर्थात जन्मकुंडली के दशमेश को नवमांश कुंडली में देखें ....जिस राशि अथवा भाव में दशमेश होगा ,गोचर के शनि देव का वहाँ आगमन इनके लिए भारी समय माना जाएगा ....
                                 चतुर्थ भाव माता व मकान जमीन आदि से सम्बंधित सुख का भाव है ,ऐसे में एकादशेश की नवमांश में जिस राशि में  उपस्थिति होगी वहां गोचर का शनि कष्टदायी होगा.
                   पंचम भाव संतान व दादा का भाव है  (पितृ दोष सम्बन्धी अपने पिछले लेख में मैंने क्यों पंचम भाव से पितृ दोष ज्ञात करने को अधिक महत्वपूर्ण कहा था ,संभवतः आप इसे अब उचित प्रकार से समझें। ये आपकी संतान एवं दादा का भाव है। पोता इसीलिए सदा दादा का रूप ही माना गया है ,साथ ही आपके पिता भाव नवम का ये पिता भाव है ,पितृ दोष आपके जन्म से पहले का दोष होता है अर्थात आपके पिता ,दादा आदि से सम्बंधित,इसीलिए पंचम मेरी गणनाओं में सदा से महत्वपूर्ण रहा है.… विषय से भटक गया मैं ,वापस लाइन पर आता हूँ )  ……  इसे बड़े साले ,जीजा व भाभी का भाव भी माना गया है.. इस भाव का अष्टमेश होने का रोल आपके द्वादशेश को निभाना होता है .... नवमांश कुंडली में द्वादशेश की स्थिति , कुंडली में उस भाव में शनि के गोचर पर इस भाव के लिए परेशानियों का सूचक बनेगी (इसे कारण न माना जाय )
                         इसी प्रकार छठा भाव मामा ,चाचा आदि से सम्बंधित भाव है ,इसका अष्टमेश लग्नेश माना गया है.…नवमांश में लग्नेश की राशि पर गोचर में शनि जी का आगमन  कष्ट का सूचक है..... 
                          सप्तम भाव आपके जीवनसाथी ,नानी (चतुर्थ माँ की माँ )ताऊ (नवम पिता से एकादश ) आदि से सम्बंधित भाव है ,ऐसे में इसके अष्टमेश के रूप में द्वितीय भावेश, नवमांश में स्थित अपनी राशि में शनि का गोचर से  संकेत करेगा कि आपको कुछ समस्याएं इन कारकों की ओर से देखने में आ सकती हैं.…
                   अष्ठम भाव से बड़े भाई बहनो की सास व ताई का सम्बन्ध भी माना गया है,……
    नवम से पिता , मामी, छोटे भाई बहनो के पति- पत्नी(आपके छोटे भाई बहनो से सम्बंधित तीसरे भाव से सातवां भाव )माना गया है           
                      दशम से सास,रोजगार आदि को देखा जाता है ,इसके अष्ठम के रूप में पसंचमेश को  नवमांश में देखा जाना  चाहिए …
       एकादश  के  स्वयं के बड़े भाई बहन ,पिता के छोटे भाई बहन तथा द्वादश से मौसा ,चाची आदि का परिचय  ज्ञात किया जाता है …
                                       उपाय की चर्चा अगली पोस्ट में करेंगे। लेख के प्रति आपकी बहुमूल्य राय की  प्रतीक्षा में , अक्षय तृतिया  की शुभकामनाओं सहित ,सदैव  आपके शुभ का अभिलाषी .......

    ( आपसे प्रार्थना है कि  कृपया लेख में दिखने वाले विज्ञापन पर अवश्य क्लिक करें ,इससे प्राप्त आय मेरे द्वारा धर्मार्थ कार्यों पर ही खर्च होती है। अतः आप भी पुण्य के भागीदार बने   )                .

8 टिप्‍पणियां:

  1. aapse ek anurodh hi jab v yese koi post daale to usme kundli ke maadhyam se samjaane ki kosis kre agr aapko shai lagta ho to....

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  2. नमस्कार पंडित जी!आप ने शनि देव के बारे में जो विस्तार से समझाया है,वो बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक लगा।मैं तो सिर्फ राशि या कुंडली में इस की स्थिति को देखा करती थी।आज आप से बहुत ही महत्वपूर्ण पहलु को जानने का मौका मिला।आप के मार्ग दर्शन के लिए आभार।

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    1. आभार आपका ,आप सभी का प्रोत्साहन ही आगे बढ़ने का सम्बल देता।

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  3. प्रियतम वर्मा20 जुलाई 2016 को 11:26 am

    नमस्कार पंडित जी! इस अद्भुत लेख के लिए बधाई !
    इसमें एक चीज़ ये समझ नहीं आ रही कि यदि किसी भाव का अष्टमेश नवमांश कुंडली में धनु राशि और पंचम भाव में स्थित है,तो कष्ट का समय शनि के धनु राशि में गोचर और लग्न कुंडली के पंचम भाव में गोचर दोनों से ही लिया जायेगा ?

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  4. यहाँ शनि के धनु गोचर को सम्बंधित भाव के लिए भारी माना जा सकता है...लेख पसंद कर प्रोत्साहित करने हेतु सादर आभार

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  5. गुरूवर नमन ।
    मेरी कुंडली में शनि की स्थिति अष्ठम भाव में सिंह राशि में है ।कृपया इसके बारे में बताने की कृपा करे और कुण्डलीनुसार कुछ उपाय बताने की कृपा करे। सादर नमन
    सोनू मालवीय 9/11/1978 पाली राजस्थान
    1:15 बजे दोपहर ।

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    1. मकर लग्न में शनि को अष्ठम में सिंह राशि का गोचर मिलता है.ऐसे में पिता पक्ष से कुछ गुप्त अथवा ऐसा धन, सम्पदा ,प्रॉपर्टी आदि की प्राप्ति होती है जिसकी सामान्यतः आस आपने न लगाई हो..

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    2. मकर लग्न में शनि को अष्ठम में सिंह राशि का गोचर मिलता है.ऐसे में पिता पक्ष से कुछ गुप्त अथवा ऐसा धन, सम्पदा ,प्रॉपर्टी आदि की प्राप्ति होती है जिसकी सामान्यतः आस आपने न लगाई हो..

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