मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

Ram...... राम की मृत्यु या आत्महत्या

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__हाँ_ राम सीता ने की थी आत्महत्या....Image result for wall paper maataa seetaa dharti....:::: समाज में आज हम इसे सीता के पृथ्वी में समा जाने अथवा निराश होकर राम के जल समाधि लेने के रूप में जानते हैं किन्तु इस वास्तविकता को नकार पाना असंभव है कि समाज की रूढ़ियों से त्रस्त हो अंत में दैवीय गुण लेकर भी ये दोनों महान आत्माएं स्वयं अपना जीवन समाप्त कर बैठीं..उस समय काल के अनुसार राम को वानप्रस्थ लेना चाहिए था ..किन्तु सीता को अपनाने पर तथाकथित कुलीन समाज हाथ धो कर उनके पीछे पड़ गया था..कालान्तर में कई हाथों से गुजरे रामायण के लेखों में अपने अपने अनुसार लेखको ने कई बदलाव किये..कुलीन समाज द्वारा कसे तंज को धोबी की गलती बताया गया..इसी प्रकार प्रबुद्ध पाठक जानते हैं कि वाल्मीकि रामायण में सीता स्वयंवर का जिक्र नहीं है..यहाँ विश्वामित्र जी के साथ दोनों भाइयों के मिथिला आगमन पर विश्वामित्र स्वयं जनक से शिव धनुष राम लक्ष्मण को दिखाने का आग्रह कर रहे हैं ..जहाँ राम के धनुष निरिक्षण के दौरान वो स्वतः ही टूट गया और अपने प्रण के अनुसार कि जो शिव धनुष भंग करेगा, सीता का वरण वही करेगा,जनक ने सीता राम को ब्याह दी..मानस में तुलसीदास जी ने इस प्रसंग को बकायदा इमोशन्स का छौंक मार कर इस सीन की TRP बढ़ा दी..Image result for wall paper maataa seetaa dharti अपनी वेब साईट व ब्लॉग से प्राप्त कई प्रश्नो के संयुक्त उत्तर में बताना चाहूँगा कि चतुर्थ में शनि का अकेले होना शुभ नहीं माना जाता..जिसकी कुंडली में ये योग होता है उसके परिवार का कोई सदस्य मेडिकल क्षेत्र से अवश्य जुड़ता है किन्तु उसका अपना बुढ़ापा स्वयं काफी तकलीफों से बीतता है..राम स्पष्ट मांगलिक थे..आप लग्न के गुरु की उपस्थिति से उनके सप्तम के मंगल को दोषमुक्त करने का सूत्र यहाँ नहीं लगा सकते..कारण एक तो स्वयं मकर गुरु की नीच राशि है व गुरु षष्टेश हैं ....ऐसे में गुरु मंगल के दोष को बैलेंस करने।के अधिकारी यहाँ नहीं हो सकते..फिर कर्क में शनि को परम मारक माना गया है..ऐसे में मारकेश को चतुर्थ में उच्च होकर बलवान करने से क्या भला हो सकता था..परिणाम स्वयं पाठक बंधू जानते हैं.. कर्क लग्न पर विराजमान चन्द्र पर शत्रु शनि की दृष्टि व मंगल का नीच राशि को देखना वस्तुतः दो पाप ग्रहों का लग्न व चन्द्र दोनों को प्रभावित करना अंततः डिप्रेशन की भूमिका में राम के लिए घातक कदम उठाने का कारक बने।Image result for wall paper maataa seetaa dharti    धरती से उत्पन्न सीता धरती में समा गईं व समुद्र के देव होकर विष्णु वापस समुद्र में चले गए  . मारक न होकर भी मंगल के प्रभाव से सीता जी ने कितने कष्ट देखे...स्वयं राम की अवस्था पर गौर कीजिये.,..स्त्री पास नहीं..बुढ़ापे में हुई संतान तक का सुख नहीं...कुछ आंकड़ों के अनुसार २३५० ईसा पूर्व से १९५० ईसापूर्व का समय काल रघुकुल आर्यों के लिए दशरथ के शासन से राम के शासन का समय काल है ,ऐसे में यदि राम को पुष्य में गणना करने पर शनि की महादशा से आरम्भ करने पर हम लगभग ८० वर्ष की आयु में राहु में राहु के अंतर में राम के मृत्यु दिन की कल्पना कर सकते हैं। बाद में कुछ वर्षों तक रघुवंश के अन्य उत्तराधिकारियों के पश्चात यादव वंश द्वारा इश्वाकु वंश के साम्राज्य को प्राप्त कर लिया गया। तब द्वापर आ चुका था और यहीं  हम विश्व के श्रेष्ट नायकों में शामिल कृष्ण का जन्म पाते हैं। 
                           .सूर्य शनि का समसप्तक होना स्पष्ट पितृ दोष माना गया है..यही दशरथ मरण का कारक बन ,स्वयं को आजीवन अस्थिर करता रहा.,,अतः पाठकों को सलाह है कि यथासंभव चतुर्थ शनि का निवारण करा लेना ही हितकर होता है..

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

राम जन्म का नक्षत्र क्या था,पुनर्वशु या पुष्य


        एक पाठिका के इस प्रश्न ने कि आप राम के जन्म नक्षत्र को पुष्य क्यों कह रहे हैं जबकि सामान्यतः इसे कई ज्ञानियों द्वारा पुनर्वशु बताया गया है ,मुझे इस विषय पर कलम घसीटने को विवश कर दिया ....काफी समय से विद्वानो में ये मतभेद रहा है कि राम का वास्तविक जन्म नक्षत्र व तिथि क्या थी। आज तक मुख्य मतभेद पुष्य व पुनर्वशु को लेकर है। तुलसीदास जी कहते हैं   ..........
       नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
       मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा।।   
               तथा वाल्मीकि रामायण में आता है
"ततो य्रूो समाप्ते तु ऋतुना षट् समत्युय: ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ॥
नक्षत्रेsदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह॥
प्रोद्यमाने जनन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौसल्याजयद् रामं दिव्यलक्षसंयुतम् "॥
                     हम जानते  हैं कि पुनर्वशु नक्षत्र तालिका में सातवें क्रम में आता है ,जिसपर देवगुरु  का आधिपत्य है  जिसके प्रथम तीन चरणो को भोगने का अधिकार मिथुन व चतुर्थ का कर्क को हासिल है। पाठक जानते हैं कि एक नक्षत्र १३ अंश २० कला का होकर ०३ अंश २० कला के चार चरणो से निर्मित है।वहीँ दूसरी ओर एक तिथि सूर्य व चन्द्र की दैनिक गतियों व दूरी के परिणामस्वरूप १२ अंश  की मानी जाती है।ऐसे में हम रामनवमी चैत की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाते हैं .कई विद्वान इस बात पर भी संशय में आते हैं कि चैत्र मॉस में सूर्य मीन राशि में विचरण करते हैं जबकि राम की कुंडली में सूर्य सहित पांच ग्रह उच्च थे। ... मेष सूर्य की उच्च राशि है... .चन्द्र स्वयं  की राशि कर्क में होकर उच्च के देवगुरु के साथ ज्योतिष शाश्त्र के श्रेष्ठं गजकेसरी योग का निर्माण कर रहे थे। मंगल सप्तम में मकर में पंचमहापुरुष में से रूचक व शनि चतुर्थ में शश योग बनाते हुए दशम में उच्च के सूर्य के समसप्तक होकर पितृ दोष का निर्माण भी कर रहे थे।तकनीकी रूप से बुध व शुक्र में से एक बार में एक ही ग्रह उच्च हो सकते हैं व चैत्र -बैशाख में बुध का उच्च होना असंभव है, तो भाग्य भाव में दैत्याचार्य ही अपनी उच्च राशि मीन में गोचर कर रहे थे।जैसा आज भी प्रचलन है ,कि हमारे उत्तर पूर्वी राज्यों में सूर्य माह की अपेक्षा चन्द्र मॉस की प्रधानता है ,अतः सौर्य  गणना के अनुसार भले ही सूर्य मेष में उच्च हो चुके थे किन्तु यहाँ जिक्र तिथि का हुआ है न कि गते का। जैसा कि हम जानते हैं तिथि निर्धारित करने का अधिकार चन्द्रमा के पास है व  राम जन्म सन्दर्भ में अभी पूर्णिमा आनी बाकी थी(जहाँ मास बदला जाना अभी बाकी था )। जिस कारण चन्द्र चैत्र मॉस ही चल रहा था  भले ही सूर्य, बैशाख की घोषणा कर चुका था।साधारण गणना  आधार पर ही देखें तो पुनर्वशु ८० अंश से ९३ अंश २० कला तक विस्तार लिए हुए है., वहीँ दूसरी ओर नवमी तिथि ९६ अंश से १०८ अंश मध्य प्रभावी है ....कर्क में अपने चतुर्थ चरण के दौरान पुनर्वशु ९० अंश से ९३ अंश २० कला तक अस्तित्व में है। ऐसे में अभिजीत काल दिन के लगभग मध्य में ४५ मिनट का माना गया है।  ९३ अंश २० कला में समाप्त हो रहा  पुनर्वशु नक्षत्र भला कैसे ९६ अंश से आरम्भ हो रही नवमी तिथि में अपनी भागेदारी कर  सकता है। नहीं कर सकता। ..... अतः स्पष्ट रूप से ९३ अंश २० कला के बाद आरम्भ हो रहा पुष्य नक्षत्र अपने विस्तार १०६ अंश ४० कला के अधिकार क्षेत्र में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को पाने का अधिकारी है। आशा है प्रबुद्ध पाठक सहमत होंगे। ....