ज्योतिष शाश्त्र के सिद्धांत में हमें सामान्यतः चार केंद्र व दो त्रिकोण भाव की जानकारी दी गई है एवं एकादश व द्वितीय भाव धन को आपरेट करने वाले भाव कहे गए हैं। किन्तु कई बार मन में संशय आता है कि केंद्र को शुभ स्थान कहते हुए भी सप्तम को अथवा सप्तमेश को मारक क्यों कहा गया है ? सोचने वाली बात है…… सोचिये …
आठवां भाव आयु का भाव कहा गया है व इस समीकरण में सप्तम भाव अष्ठम भाव के लिए व्यय अर्थात बारहवें भाव का रोल निभाता है ,आयु की यात्रा का अंतिम पड़ाव है ,इसलिए मारक है .... यानि आयु के लिए मारक है …किन्तु ये तो दाम्पत्य भाव है व केंद्र होने से शुभ भाव है ....फिर मारक क्यों ?चक्कर क्या है ?तो ये शुभ भाव है …किन्तु मारक माना गया है....... तो असल में शुभ होकर अशुभ है …… नहीं नहीं अशुभ होकर शुभ है ....... अब आप कह रहे होंगे पंडित जी आप उलझा रहे हैं …… यकीन करें पाठकवृंद मैं स्वयं उलझ जाता था पहले इस प्रश्न पर (अब आपको उलझता पाकर भाव खा रहा हूँ..... @@@@$$%#**@@ )
प्रकृति एक सीधे से सिद्धांत पर चलती है , बुरा न बनने के सिद्धांत पर..... ब्रह्माण्ड अपने सिर पर किसी भी प्रकार का दोष लेने से कतराता है ....तो फिर हम ही भला क्यों बुरा बने ,ग्रह भी यही सोच रखते हैं.…… अंत में हर बुरी बात का ठीकरा स्वयं जातक के सिर पर फोड़ने का समझौता इन सब के बीच हो गया और यजुर्वेद में जातक को सूचित भी कर दिया गया " रोगं शोकं दुःखं बन्धनम् व्यस्नानी च ,आत्मापराध वृक्षस्य् फलनेतानी तेहिनाम् "……अर्थात आज हम जो भी रोग ,शोक,दुःख बंधन आदि भुगत रहे हैं ये हमारे ही लगाये गए वृक्ष के फल हैं ....चाहे किसी जन्म में लगाया हो ये वृक्ष हमने …अर्थात ब्रह्माण्ड सबके लिए न्यूट्रल रहकर काम करता है...... भाव व भावेश को अच्छा -बुरा बनाना हमारे ही हाथ में है..... कैसे ?? आइये समझाता हूँ ....
आदिकाल से ही धन सम्पदा (भले ही वह किसी भी रूप में रही जो )मनुष्य जीवन के लिए परमावश्यक मानी गई है, अभाव से भरा जीवन मृत्यु के ही समान है .......हम जानते हैं कि नवां भाव भाग्य का भाव है व एकादश भाव लाभ व आय का भाव है …सातवां भाव जीवन साथी का ,साझेदारी का भाव कहा गया है ....भाग्य से गणना करने पर सप्तम भाव भाग्य का लाभ है ...भाग्य जो लाभ देने वाला है उसे वह सप्तम की सहायता से प्रस्तुत करता है …आय भाव(एकादश ) अपने लाभ के लिए नवम का मुंह ताकता है (आय भाव को आय नवम से प्राप्त होती है ) किन्तु नवम तो स्वयं सप्तम पर निर्भर है ,ऐसे में एकादश भाव को भाग्य के सहारे रहना होता है (पता नहीं नवम का आय भाव उसे क्या देने वाला है जिससे आय भाव को नवम के द्वारा भविष्य में आय पर्याप्त होनी है )……सीधा सा समीकरण है..... किन्तु इस समीकरण में आय भाव यह भूल जाता है कि नवम से जिस आय के लिए वो गिड़गिड़ा रहा है ,और आगे नवम अपनी आय के लिए जिस के द्वार पर टकटकी लगा रहा है वो सप्तम भाव है व एकादश का स्वयं का भाग्य भाव है.अब सारे जीवन भर आंखमिचौली चलती है कि एकादश खुद अपने भाग्य (सप्तम ) को कैसा बनाता है,जिससे प्राप्त कर नवम ने भविष्य में एकादश को देना है …… ऐसे में नवम स्वयं एकादश के भाग्य पर निर्भर है ,कि भैय्या जैसा तू अपना भाग्य रखेगा वैसा मुझ से प्राप्त करेगा ,क्योंकि मैं तो मात्र जरिया बनूँगा तुझ तक तेरा भाग्य पहुंचाने का …
ब्रह्माण्ड इसे केंद्र के शुभ रूप में ही प्रदान करता है ,अब ये हमारे ऊपर होता है कि हम इसे शुभ केंद्र बना रहने दें अथवा अपने कर्मों द्वारा इसे आयु के व्यय के रूप में दोष पूर्ण बना लें .... अंग्रेज तक ये बात जानते हैं व मानते हैं.. तभी तो प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ कहते हैं..... जिस का घर सुखी ... ,जिस की घरवाली प्रसन्न ,जिसने अपने जीवन साथी का सम्मान करना सीखा वो बुलंदियां चढ़ा …सफलता की देवी ने उसका आलिंगन किया … यकीन न हो तो अपने आस पास नजर दौड़ाएं …सारे सफल सज्जन पुरुष आपको जोरू के गुलाम नजर आते होंगे … ऐसा नहीं है भैय्या वो जोरू के गुलाम नहीं है ,बस उन्होंने अपनी गृहलक्ष्मी का जलवा पहचान लिया है .... वो समझ चुके हैं कि सप्तम प्रसन्न तो स्वाभाविक रूप से एकादश व नवम प्रसन्न ....
किन्तु ये छोटी से बात समझने में ही अच्छे अच्छे ज्ञानियों के जीवन निकल गए ,सत्य की खोज …सफलता का रहस्य ......इसी खोज में सारा जीवन कट गया किन्तु सत्य नामक चिड़िया के दर्शन ही नहीं हुए … क्यों भला ???? अरे भाई सप्तमेश व लग्नेश कभी मित्र नहीं हो पाये रे बंधू …बुद्धि ने कभी सप्तम के जलवे को सहज रूप से स्वीकार ही नहीं किया .... हाँ सदा लग्न का मित्र रहने वाले भाग्य (नवम ) के द्वार पर आस लगा के रखी ,किन्तु भाग्य से तो कभी आय प्राप्त हो ही नहीं सकी …क्यों भला ??? क्योंकि नवमेश व आयेश कभी मित्र हुए ही नहीं ....ऊपर से तमाशा ये कि आयेश कभी लग्नेश साथ दोस्ती नहीं निभा सकता .... तो आय का सुख लग्न को क्यों दूँ ??तो कोई आय भाव से (लाभ से) ये प्रश्न करे कि भैय्या जब लग्नेश को नहीं दूंगा ,भाग्येश को नहीं दूंगा,तो ये गठरी क्यों सिर पे लिए घूम रहा है ?? किसके लिए घूम रहा है ????…लाभ भाव मुस्कुराता है ,भाव खाने लगता है ,मानो किसी को कभी ये भेद नहीं दूंगा ,किसी को नहीं बताऊंगा … ....हमें भी नहीं पूछना …क्यों भला ,क्यों नहीं पूछना ??? …इसलिए नहीं पूछना क्योंकि मेरे प्रबुद्ध पाठक स्वयं इस पहेली का जवाब जान गए हैं ..... पाठकवृन्द मैं गलत तो नहीं कह रहा ??? आप पहेली का उत्तर जानते हैं न ??किसके लिए आय भाव ,आयेश अपने खजाने का मुंह खोलता है ?? किस पर मेहरबान होना चाहता है ??
कौन है वो ?????
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अरे सीधा सा जवाब है
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दो दूनी चार है …………………………
"सप्तमेश"...................... सप्तमेश जो आय भाव का..... लाभ भाव का.… भाग्य भी है ,सदा से परम मित्र रहा है.… आपकी धन की पोटली ,....आपका जीवनसाथी
(कल ही नॉएडा के हमारे मित्र और पाठक श्री देवेन्द्र जी का आदेश हुआ कि ललित जी काफी समय से कोई पोस्ट नहीं आई है,आज ही चिपकाइये …… लीजिये मित्र के आदेश पर मैं सिर के बल हाजिर …क्यों भला ?? उफ़ फिर से प्रश्न ....अरे कहा तो..... मित्र आपके लिए आय और लाभ लेकर घूम रहा होता है , मित्र को भला नाराज करने का जोखिम कौन ले )
लेख के प्रति आपकी अमूल्य राय की प्रतीक्षा में आपका ही मित्र …
( आपसे प्रार्थना है कि कृपया लेख में दिखने वाले विज्ञापन पर अवश्य क्लिक करें ,इससे प्राप्त आय मेरे द्वारा धर्मार्थ कार्यों पर ही खर्च होती है। अतः आप भी पुण्य के भागीदार बने